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किताब तो चोरी कर भी पढ़े तो भी कोई बात नहीं

मेरे प्रिय मित्रवर साहित्यकार पुरूषोतम पंचोली ने कोरोना महामारी से कोई छ माह पूर्व निकट के पार्क में सुबह के वक्त लोगों में पुस्तकें पढ़ने के प्रति रुचि जागृत करने के लिए एक ओपन पुस्तकालय खोल दिया। मित्रों और परिचितों से पुस्तकें और पत्रिकाएं एकत्रित की। पार्क में आने वाले अपनी पसंद की पुस्तक घर ले जाएं और पढ़ कर वापस रख जाएं।न कोई सदस्यता पंजीयन न कोई लिखत – पढ़त, सब कुछ स्व संचालित।

मुझे जब ज्ञात हुआ कि मेरे मित्र ने खुले पुस्तकालय का देश में एक अनूठा प्रयोग किया है तो जिज्ञासा वश मैं भी वर्षो से संकलित ढेरों पुस्तक और पत्रिकाएं ले कर पहुंच गया उनके पास। सोचा अच्छा मौका है कोई तो इन्हें पढ़ेगा।

लंबे समय बाद मिल पाने कि खुशी से हम गदगद हो उठे और गर्म जोशी से गले मिल कर एक – दूसरे का स्वागत किया। एक – दूसरे के हाल चाल पूछे, इधर – उधर की चर्चा हुई। जब मैंने उन्हें अपना साहित्य पुस्तकालय के लिए उन्हें देने की बात कही तो बोले इससे अच्छा काम दूसरा नहीं हो सकता। पुस्तकें घर में पड़ी धूल खाती रहें और साल में एक – दो बार धूल झाड़ कर फिर अलमारी में सजा दो। उन्होंने संकलित साहित्य को खंगाला और कहा बहुत उपयोगी है।

इस बीच मेड चाय नाश्ता ले कर आ गई। इतनी उम्दा चाय मैंने पहले कभी नहीं पी थी सो पूछ लिया भाई कहां की चाय है जो इतना स्वाद और अलग खुशबू है। बोले आपके लिए खास आसाम से मंगवाई हैं। बोले मुझे काफी समय उस अंचल में रहने का अवसर मिला तो वहीं से मित्रों के स्वागत के लिए ले आया था।

चाय पर चर्चा के दौरान प्रश्न किया आपने खुले पुस्तकालय का प्रयोग किया है, कोई किताब ले जा कर रखले और वापस नहीं करें तो आपको केसे पता चलेगा। हंसते हुए सवाल का जो जवाब मिला वह आज तक जहन में तैरता है। जवाब था ” पुस्तकें तो इतनी अनमोल होती है कि कोई चोरी कर भी पढ़े तो इस से बढ़िया बात नहीं हो सकती। एक अच्छी किताब का कोई अंत नहीं होता, जो भी पढ़े और कितनी ही बार पढ़े नई बात निकल कर आती हैं। पुस्तक के बारे में ज्ञान की सरिता मेरे मन को सदैव स्पंदित करती रहती हैं।

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