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हर शहर में होता है एक बुध्दिजीवी

मारे देश के हर शहर और गाँव में सभी तरह के लोग पाए जाते हैं। हर गाँव में नेता, पत्रकार, गुंडे, असामाजिक तत्व, अवारा और छुटभैयों के अलावा बुध्दिजीवी भी होते हैं। बुध्दिजीवियों का रुतबा इन सबसे अलग होता है। यानी पूरा गाँव या शहर एक तरफ और बुध्दिजीवी एक तरफ। ये वर्ग विभाजन कोई नहीं करता, लेकिन अपने आप हो जाता है। बुध्दिजीवी शहर के हर कार्यक्रम में नेताओं, मंत्रियों के साथ ही लायंस क्लब, रोटरी क्लब के कार्यक्रमों में उपलब्ध रहते हैं। बुध्दिजीवी शहर के स्थानीय अखबार में पार्ट टाईम भी काम करते हैं इसलिए वो जिस किसी कार्यक्रम में उपस्थित होते हैं उसकी खबर अखबार में आसानी से छप जाती है। इन दिनों लोकल चैनलों के बढ़ते असर की वजह से चैनलों पर आने वाले बुध्दिजीवियों का भी एक अलग वर्ग तैयार हो गया है जो अखबारों में छपने वाले बुध्दिजीवियों को हीन प्राणी समझता है और अखबार वाले चैनल पर आने वालों को।

बुध्दिजीवी का प्रमुख कर्त्तव्य होता है व्यवस्था को कोसना और इसके साथ ही वह इसके लिए जिम्मेदार नेता, अफसरों और पत्रकारों के साथ ही मंच पर भी बैठता है और जब भी मौका लगता है उनके घर पर होने वाले मयखाने वाली गोष्ठी में भी हाजिर रहता है। बुध्दिजीवी होने के लिए ऐसे तो कोई खास डिग्री, योग्यता या प्रमाण पत्र की ज़रुरत नहीं होती लेकिन प्रायः शहर के अखबारों में कभी कभार कोई साहित्यिक लेख लिख देने और किसी काव्य गोष्ठी में कोई बगैर सिर पैर की कविता सुना देने या किसी साहित्यिक गोष्ठी में धाँसू प्रवचन देकर कोई भी व्यक्ति अपनी पहचान बुध्दिजीवी के रूप में बना सकता है। ऐसे तो कॉलेज में पढ़ाने वाले प्रोफेसर जन्मजात बुध्दिजीवी होते हैं और वे किसी स्कूल के मास्टर को बुध्दिजीवी नहीं मानते। स्कूल के मास्टर को अपने आपको बुध्दिजीवी के रूप में स्थापित करने के लिए बड़ा संघर्ष करना पड़ता है।

एक बात तो तय है कि बुध्दिजीवी के बगैर किसी शहर या गाँव में कोई कार्यक्रम सफल नहीं हो सकता। हर कार्यक्रम के हर मंच पर नेता, अफसर, समाजसेवा के लिये चंदा देने वाले ठेकेदार, व्यापारी और उद्योगपति के साथ एक बुध्दिजीवी ज़रुर होता है। बुध्दिजीवी को जब भी मंच पर बोलने का मौका मिलता है वह पूरी समाज व्यवस्था को कोसता है और समाज को ही समाज की दुर्दशा के लिए जिम्मेदार ठहराता है। बुध्दिजीवी मंच पर मौजूद हर नेता, अफसर और मंत्री विधायक से जुड़ा ऐसा संस्मरण जरुर सुनाता है कि लोग उसकी महानता के कायल हो जाएँ। इससे वह यह भी सिध्द करने की कोशिश करता है कि उसके इस मंत्री, नेता या अफसर से कितने निकट संबंध हैं।

बुध्दिजीवी का मानना होता है कि लोगों के नकारेपन की वजह से समाज में समस्याएं बढ़ रही है। अपराध से लेकर शहर में होने वाली गंदगी तक के लिए वह समाज को ही दोषी ठहराता है। साथ ही मंच पर बैठे अफसरों, नेताओँ और चंदा देने वाले समाज सेवियों की इस बात के लिए जी भरकर प्रशंसा करता है कि इनकी वजह से शहर में साहित्य, संस्कृति, कला और परंपराएँ जिंदा है। बुध्दिजीवी हर मंच से इनकी ऐसी तारीफ़ करता है कि सुनने वालों को कई बार लगता है कि अगर ये लोग नहीं होते तो हमारा शहर कितना पिछड़ा और गँवार समझा जाता। इस चक्कर में लोग यह भूल ही जाते हैं कि इन अफसरों, पत्रकारों, नेताओं और ठेकेदारों की मिलीभगत की वजह से शहर में अतिक्रमण और गंदगी से लेकर यातायात की समस्या बढ़ती जा रही है।

बुध्दिजीवी अपने हर भाषण में और वक्तव्य में किसी ऐसे विदेशी लेखक या दार्शनिक का उल्लेख कर देता है कि सभी लोग उसकी बात को सही मानने लगते हैं। सबको लगता है कि जब विदेश के किसी बड़े आदमी ने ऐसी कोई बात कही है तो सही ही होगी। कभी कभी वो रामायण की चौपाई और गीता के श्लोक का भी उल्लेख करके अपने भाषण में जान डाल देता है। बुध्दिजीवी की खासियत यही होती है कि वह किसी भी मंच से या किसी भी विषय पर बोले घुमा फिराकर वह वही बात बोलता है जो वह किसी भी विषय पर बोलता आया है। कई बार बुध्दिजीवी अपनी किसी विदेश यात्रा या फिर किसी बड़े शहर में होने वाले किसी साहित्यिक आयोजन का उल्लेख करके भी अपनी अतिरिक्त विद्वता का प्रदर्शन करता है। वह विदेश के लोगों के अनुशासन की जमकर तारीफ करता है और अपने देश के लोगों को इस बात के लिए कोसता है कि उनके अंदर समय की पाबंदी और अनुशासन नहीं है। समय की पाबंदी के मामले में बुध्दिजीवी का कोई मुकाबला नहीं, वह हर कार्यक्रम में समय से पहले पहुँच जाता है ताकि मंच पर उसकी जगह सुरक्षित हो सके और वहाँ आने वाले वीआईपी लोगों से मेल-मुलाकात हो जाए।

जो बुध्दिजीवी हो जाता है वह स्थानीय कवि को बुध्दिजीवी नहीं मानता जबकि कवि अपने आपको बुध्दिजीवी से कम नहीं समझता। कवि अपनी तुकबंदियों और वाट्सएप पर आने वाले बासी और उबाउ चुटकुलों के जरिये वही काम करता है जो बुध्दिजीवी अपने साहित्यिक प्रवचनों से करता है। कवियों और बुध्दिजीवियों में छत्तीस का आँकड़ा होता है क्योंकि दोनों ही अपने आपको बड़ा बुध्दिजीवी मानते हैं।

बुध्दिजीवी का एक और प्रमुख कार्य होता है शहर मे किसी भी नेता, अफसर मंत्री, विधायक या नेता का अभिनंदन होने पर सके लिए अभिनंदन पत्र लिखना। बुध्दिजीवी जिस किसी का भी अभिनंदन पत्र लिखता है उसकी खूबियों का वर्णन ऐसा करता है कि कई बार तो जिसका अभिनंदन होता है उसे शक होने लगता है कि ये अभिनंदन मेरा ही हो रहा है कि किसी और का। कई बार तो बुध्दिजीवी बड़ा पशोपेश में पड़ जाता है। वह एक ओर किसी का अभिनंदन पत्र लिखता है तो दूसरी ओर उसके विरोधी उसका अपमान पत्र लिखवाने के लिए भी बुध्दिजीवी के पास आते हैं। बुध्दिजीवी ये कार्य भी साहित्य सेवा समझकर पूरी निष्ठा से करता है।

बुध्दिजीवी की सबसे बड़ी ताकत ये होती है कि उसे कोई चुनौती नहीं दे सकता, वह खुद हर एक के आगे चुनौती बनकर खड़ा होता है।

जब अखबारों में और टीवी चैनलों पर चुनावों की चर्चा होती है और दलित, सवर्ण, मुसलमान, अगड़े-पिछड़े के वोट बैंक की चर्चा होती है तो उसमें कई बार बुध्दिजीवियों का उल्लेख अलग से होता है कि सबसं कम प्रतिशत वोट बुध्दिजीवियों के हैं, अगर बुध्दिजीवियों के वोट थोक में किसी एक को मिल जाएँ तो पासा पलट सकता है; लेकिन ये पासा कभी पलटता ही नहीं क्योंकि बुध्दिजीवी दूसरे लोगों को भले ही वोट न डालने पर कोसता रहे खुद वोट डालने कभी नहीं जाता।



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