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उत्पादन बढ़ा फिर भी भूख से मौतें

राजनीति के विद्वान आचार्य चाण्कय ने कहा था, जिस दिन जनता के सोने के बाद बाद राजा सोएगा और जनता के खाने के बाद राजा खाऐगा, उस दिन देश में राम राज्य आ जाएगा। यही राजनेता चुनावों के दौरान अपनी राजनीति रैलियों में लंबे-लंबे भाषण देते है और देश में राम राज्य स्थापित करने की बात कहते है।

लेकिन दिल्ली में तीन बच्चियों के पेट में कई दिनों से अन्न का एक दाना भी नही गया, जिसके कारण तीनों बच्चियों की मौत हो गई। इन मौतों का जिम्मेदार जनता किसे माने उस क्षेत्र के प्रतिनिधि निगम पार्षद को, विधायक या फिर सांसद को।

जिम्मेदारी लेने के लिए कोई तैयार नही है और विपक्ष ने भी बच्चियों की भूख की समस्या को तो दूर नही किया बल्कि इस पर राजनीति शुरु कर दी।

दिल्ली में तीन बच्चियों की भूख से मौत हुई, दिल्ली में दो सरकारें है, एक दिल्ली के मुखिया अरविंद केजरीवाल की देखरेख में चलती है और दूसरी देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की देखरेख में।

हमारें राजनेता हर साल गेहूं के उत्पादन की रिकार्ड तोड़ पैदावार होने की बाते करके नए-नए आकड़े हर वर्ष जनता के सामनें प्रस्तुत करते है लेकिन उन बेटियों के लिए क्या सरकार एक मुट्ठी अनाज भी नही दे पाई ? जिससे उनका जीवन बच पाता।

देश की राजधानी दिल्ली के मंडावली में ये घटना घटी है। देश की राजधानी में भी क्या ऐसे हालात हो सकते हैं क्या ? भरोसा नही हुआ , इसलिए एक नहीं, दो पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट में यह पता लगाया गया, जिसमें पाया गया कि इन मौतों का असली कारण भूख थी…? हम दूनिया में विकसित देशों की पंक्ति में आग्रसर है, और विकास करना भी चाहिए। हमारा देश विकसित हो इसको देश का हर नागरिक चाहता है।

लेकिन जब देश के भविष्यों की मौत भूख हो उस समय हमारा विकास कही पीछे छूट जाता है।

क्या देश के अंदर गेहूं की बढ़ी उत्पादकता उन बेटियों के काम आई, जिन बेटियों के लिए सरकार ने योजना चला रखी है, बेटी पढ़ाओं बेटी बचाओं। क्या सरकार की इससे पहले की एक और योजना नही होनी चाहिए भूख मिटाओ-जीवन बचाओ ? गेहूं का उत्पादन बढ़ाना अच्छी बात है, लेकिन उस उत्पादन की बेहतरी उस बात में है, जब हमने भूख से मुक्ति पा ली हो ?

राजनेता इन मौतों पर अपनी राजनीति रोटी सेंकने का काम तो करेंगें ही और पक्ष-विपक्ष एक दूसरे पर आरोप- प्रत्यारोप लगाना शुरु करेगा। कोई इसका जिम्मा दिल्ली सरकार के मुखिया अरविंद केजरीवाल को देगा कोई नगर निगम को तो प्रधानसेवक नरेंद्र मोदी को पर क्या पक्ष और विपक्ष मिलकर इस तरह की मौते न हो उस ओर नही बढ़ना चाहिए ?

क्या दिल्ली के मुखिया, प्रधानसेवक और विपक्षी दलों को मिलकर भूख के खिलाफ एक आंदोलन नही करना चाहिए, जिससे आगे चलकर इस तरह का घटनाक्रम न घटे, इस पर सभी को मिलकर विश्लेषण करने की जरुरत है।

क्या कहती दावों और कोशिशों की रिपोर्ट

एक अन्य रिपोर्ट की मानें, तो भूख और ग़रीबी की वजह से रोज़ाना 25 हज़ार लोगों की मौत हो जाती है। 85 करोड़ 40 लाख लोगों के पास पर्याप्त भोजन नहीं है, जो कि संयुक्त राज्य अमेरिका, कनाडा और यूरोपियन संघ की जनसंख्या से ज़्यादा है। भुखमरी के शिकार लोगों में 60 फ़ीसद महिलाएं हैं। दुनियाभर में भुखमरी के शिकार लोगों में हर साल 40 लाख लोगों का इज़ाफ़ा हो रहा है। हर पांच सेकेंड में एक बच्चा भूख से दम तोड़ता है। 18 साल से कम उम्र के तक़रीबन 45 करोड़ बच्चे कुपोषित हैं। विकासशील देशों में हर साल पांच साल से कम उम्र के औसतन 10 करोड़ 90 लाख बच्चे मौत का शिकार बन जाते हैं। इनमें से ज़्यादातर मौतें कुपोषण और भुखमरी से जनित बीमारियों से होती हैं। कुपोषण संबंधी समस्याओं से निपटने के लिए सालाना राष्ट्रीय आर्थिक विकास व्यय 20 से 30 अरब डॉलर है। विकासशील देशों में चार में से एक बच्चा कम वज़न का है। यह संख्या तक़रीबन एक करोड़ 46 लाख है।

हमारे देश में ऐसे लोगों की कमी नहीं जो फ़सल काटे जाने के बाद खेत में बचे अनाज और बाज़ार में पड़ी गली-सड़ी सब्ज़ियां बटोर कर किसी तरह उससे अपनी भूख मिटाने की कोशिश करते हैं। महानगरों में भी भूख से बेहाल लोगों को कूड़ेदानों में से रोटी या ब्रेड के टुकड़ों को उठाते हुए देखा जा सकता है। रोज़गार की कमी और ग़रीबी की मार की वजह से कितने ही परिवार चावल के कुछ दानों को पानी में उबालकर पीने को मजबूर हैं। यह एक कड़वी सच्चाई है कि हमारे देश में आज़ादी के बाद से अब तक ग़रीबों की भलाई के लिए योजनाएं तो अनेक बनाई गईं, लेकिन लालफ़ीताशाही की वजह से वे महज़ काग़ज़ों तक ही सिमट कर रह गईं। एक तरफ़ गोदामों में लाखों टन अनाज सड़ता है, तो दूसरी तरफ़ भूख से लोग मर रहे होते हैं। ऐसी हालत के लिए क्या व्यवस्था सीधे तौर पर दोषी नहीं है?


ललित कौशिक सामाजिक व राजनीतिक विषयों पर लिखते हैं



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