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दरकते रिश्तों का गड़बड़झाला ‘साहब, बीवी और गैंगस्टर-3’

बांग्ला भाषा के यशस्वी साहित्यकार बिमल मित्र के 1953 में प्रकाशित उपन्यास पर श्वेत श्याम फिल्मो के युग में प्रबुद्ध फिल्मकार गुरुदत्त ने ‘साहब, बीवी और गुलाम’ (1962) बनाई थी. उनकी इस कृति को आज भी भारत की श्रेष्ठ फिल्मो में गिना जाता है. गुरुदत्त ‘साहब, बीवी और गुलाम’ के निर्माता थे और फिल्म का निर्देशन उन्होंने अबरार अल्वी से कराया था. चूँकि इससे पूर्व ‘कागज़ के फूल’ बॉक्स ऑफिस पर बिखर कर गुरुदत्त को निराशा में धकेल चुके थे अतः घाटे से उबरने के लिये उन्हें एक अदद हिट फिल्म की दरकार थी. रहमान, मीना कुमारी, गुरुदत्त और वहीदा रहमान की मंजी हुई अदाकारी, शकील बदायूँनी के गीतों और हेमंत कुमार के संगीत से सजी इस फिल्म ने यह कमाल कर दिखाया.

‘साहब, बीवी और गुलाम’ को न केवल व्यावसायिक सफलता मिली बल्कि सर्वोत्तम फीचर फिल्म के राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार समेत चार फिल्म फेयर पुरस्कार मिले. अबरार अल्वी को भी श्रेष्ठ निर्देशक का फिल्म फेयर पुरस्कार जरुर मिला पर फिल्म के वास्तविक निर्देशन को लेकर खूब सवाल उठे. फिल्म में साफ़ झलकती गुरुदत्त शैली के चलते यह भ्रम फैला कि फिल्म का निर्देशन वास्तव में अबरार अल्वी ने किया या खुद गुरुदत्त ने..! दोनों ने ही इस पर चुप्पी साधे रखी. कालांतर में पुष्टि हुई कि पूरी फिल्म नहीं बल्कि गीतों का निर्देशन गुरुदत्त ने किया था. अंततः फिल्म की कामयाबी फिल्म से इतर ‘साहब’ के खाते में दर्ज हुई और ‘गुलाम’ ठगा सा रह गया. विडम्बना देखिये कि अबरार अल्वी को ‘साहब, बीवी और गुलाम’ के पहले और बाद में आजीवन कोई और फिल्म निर्देशित करने का अवसर न मिला. 50 और 60 के दशक में गुरुदत्त की टीम के भरोसेमंद सदस्य रहे इस शख्स ने बाद में खुद को पटकथा व संवाद लेखन तक सीमित कर लिया था. प्रोफ़ेसर, बहारें फिर भी आएँगी, सूरज, संघर्ष, साथी, मनोरंजन, लैला मजनूं, बैराग, सबसे बड़ा रुपैया, हमारे तुम्हारे और बीवी ओ बीवी के लेखक ने इस फानी दुनिया को अलविदा कहने से पूर्व शिखर सितारे शाहरुख़ खान की घोर असफल फिल्म ‘गुड्डू’ की पटकथा और संवाद भी लिखे.

बहरहाल इस शुक्रवार प्रदर्शित निर्देशक तिग्मांशु धूलिया की ‘साहब बीवी और गैंगस्टर-3’ की समालोचना के पूर्व 56 साल पुरानी ‘साहब, बीवी और गुलाम’ का लम्बा चौड़ा लेखा जोखा पाठकों को थोड़ा अटपटा लग सकता है. पर इस पीठिका का अपना औचित्य है. ‘साहब, बीवी और गुलाम’ के निर्देशक को भले ही ज़िन्दगी में दुबारा कोई फिल्म निर्देशित करने को नहीं मिली पर इसके ठीक आधी सदी बाद वक़्त ने खुद को अजीबो गरीब ढंग से दोहराया. ‘साहब, बीवी और गुलाम’ के रिलीज़ होने के पांच साल बाद पैदा हुए प्रयोगधर्मी निर्देशक तिग्मांशु धूलिया ने 2011 में गैंगस्टर को गुलाम का स्थानापन्न बनाने का प्रयोग किया. उन्होंने ‘साहब, बीवी और गैंगस्टर’ नामक ऐसा रोमांटिक थ्रिलर ड्रामा रचा कि सात साल में उन्हें इसके दो और सीक्वल निर्देशित करने के अवसर मिले.

‘साहब, बीवी और गैंगस्टर-3’ की कहानी पिछली कड़ियों का नीरस विस्तार है. आदित्य प्रताप सिंह (जिमी शेरगिल) और माधवी (माही गिल) के ख़राब रिश्तों की दास्तान सत्ता और षड्यंत्र के गलियारों से गुजरकर फिर एक नया मोड़ लेती है. इस बार कहानी में गैंगस्टर के रूप में बूंदीगढ़ के राज परिवार के लंदन से लौटे सदस्य उदय सिंह (संजय दत्त) का प्रवेश होता है. साहब को एक बार फिर हवेली से बाहर का रास्ता दिखाने के लिये माधवी उदय का सहारा लेती है जो खुद अपने घर के पारिवारिक विवादों में घिरा है. उदय का दिल सुहानी (चित्रांगदा सिंह) पर आशना है. पर सुहानी को उदय के परिवार के लोग यानि राजा हरिसिंह (कबीर बेदी) और भाई विजय सिंह (दीपक तिजोरी) नहीं सुहाते. नशाखोर बेटी रंजना की हरकतों से त्रस्त पिता के मन में भी साहब के प्रति पूर्वाग्रह है. कुल मिलाकर पुराने राजे रजवाड़ों के दंभ, परस्पर अविश्वास और साजिशों में उलझे रिश्तों की गड्डमड्ड का नाम है- ‘साहब, बीवी और गैंगस्टर-3’.तिग्मांशु धूलिया की ख़ास शैली फिल्म में नदारद है. लगता है लीक से बंधी सफलता को बार बार दोहराने का मोह और उसमे कुछ नया करने के चक्कर में खुद तिग्मांशु उलझ कर रह गए. कमजोर कहानी, पटकथा और संवाद ने संभवतः अब इस रोमांटिक ड्रामा थ्रिलर फ्रेंचाईजी की इतिश्री कर दी है. बॉक्स ऑफिस पर फिल्म की ओपनिंग के आंकड़े भी यही संकेत देते हैं. पहले दिन अनुमान से आधी यानि मात्र डेढ़ करोड़ रूपये की कमाई निराशाजनक है.

संजय दत्त जैसे विवादित शख्स की मौजूदगी फिल्म की साख नहीं बढ़ाती. जबकि उनकी बायोपिक संजू का जलवा बॉक्स ऑफिस पर अभी भी बना हुआ है. दरअसल संजय दत्त अब उम्र के उस पड़ाव पर पहुँच गये हैं जहाँ उन्हें नए रंग बिखेरते किरदार चुनने होंगे वर्ना मुन्नाभाई की छवि उनका पीछा नहीं छोड़ेगी. यही वजह है कि ‘साहब, बीवी और गैंगस्टर-3’ को कभी संजय दत्त के बेहतरीन अभिनय के लिये याद नहीं रखा जाएगा. बल्कि अभिनय की दृष्टि से पिछली दोनों कड़ियों की तरह इस बार भी बाज़ी जिमी शेरगिल ने मारी है. उनका शिद्दत से किया काम खाकसार जैसे उम्रदराज दर्शकों को सधे हुए गरिमामय अभिनय के लिये मशहूर रहे चरित्र अभिनेता रहमान की याद दिलाता है. माधवी के रोल में डूब चुकीं माही गिल भी असरदार हैं. सहायक भूमिकाओं में सोहा अली खान, चित्रांगदा सिंह, नफीसा अली, कबीर बेदी, दीपक तिजोरी, जाकिर हुसैन वगैरह ठीक ठाक ही हैं. फिल्म में अमलेंदु चौधरी की सिनेमाटोग्राफी जॉनर को उभारती अवश्य है पर समग्र प्रभाव लाने के लिये फिल्म एडिटर प्रवीन आंग्रे अपनी दक्षता का समुचित परिचय नहीं दे पाए. गीत संगीत भी उल्लेखनीय नहीं है.


(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं फिल्म समीक्षक हैं और मप्र में आकाशवाणी-दूरदर्शन के रीजनल न्यूज़ हेड रह चुके हैं)

ई-मेल: vinodnagar56@gmail.com मोबाइल: 9425437902



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