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एफडीआई कहीं ईलाज की जगह बीमारी न बन जाए

भारत में पूंजी प्रवाह के सभी दरवाजों को खोल दिया गया है। व्यापक सुधारों के दूसरे चरण के तहत भारत ने उड्डयन, रक्षा, फर्मास्यूटिकल, एकल ब्रांड खुदरा और खाद्य प्रसंस्करण के अलवा पशुपालन और मधुमक्खी पालन के लिए एफडीआई के लिए दरवाजा खोल दिया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का कहना है कि एक क्रांतिकारी उदार एफडीआई व्यवस्था भारत को दुनिया में सर्वाधिक मुक्त अर्थव्यवस्था में बदल देगी, जो नौकरी एवं रोजगार सृजन को व्यापक प्रोत्साहन देगा।

चाहे पानी हो या अर्थव्यवस्था, दरवाजों के खुलने से भारी उछाल आता है। लेकिन बांध के दरवाजों (जहां बाढ़ का पानी पीछे नहीं लौटता) के खोले जाने के विपरीत एफडीआई के निर्बाध प्रवाह का मतलब यह नहीं होता कि यह केवल विदेशी पूंजी की बाढ़ लाएगा, बल्कि देश में निवेश किए गए हर डॉलर के बदले दो डॉलर की वापसी भी है। इसके अलावा, ऐसे वक्त में जब दुनिया भर में रोजगार विहीन विकास का दौर है, मैं नहीं जानता कि सरकार किस भरोसे पर कह रही है कि देश में एफडीआई के प्रवाह से रोजगार का सृजन होगा।

रोजगार सृजन के संदर्भ में हताशा स्पष्ट दिख रही है। श्रम ब्यूरो के मुताबिक, वर्ष 2015 में मात्र 1.35 लाख रोजगार सृजित किए गए, जो पिछले छह वर्षों में सबसे न्यूनतम है। ऐसे देश में, जहां हर वर्ष 1.25 करोड़ लोग रोजगार पाने की कतार में खड़े हो जाते हैं, वहां मात्र 1.35 लाख लोगों को रोजगार मिलना स्पष्ट दर्शाता है कि हमारा आर्थिक तंत्र रोजगार देने में अक्षम साबित हो रहा है। खैर, एक वर्ष के आंकड़े के आधार पर कोई निर्णय नहीं दिया जा सकता, लेकिन पिछले 12 वर्षों (वर्ष 2004 की शुरुआत से, जब डॉ. मनमोहन सिंह ने सत्ता संभाली थी) का रोजगार का ग्राफ उतना ही अंधकारमय बना हुआ है। पिछले 12 वर्षों में मात्र 1.6 करोड़ रोजगार का सृजन हुआ, जबकि 14.5 करोड़ लोगों को रोजगार की तलाश थी।

इसलिए रोजगार सृजन का दबाव स्पष्ट है। यही वह चीज है, जिसका हल तलाशने की कोशिश मनमोहन सिंह सरकार ने की थी, जब उसने और एफडीआई का रास्ता खोलने का प्रयास किया था। पांच दिसंबर, 2012 के एक ट्वीट में गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने लिखा था, ‘कांग्रेस विदेशियों के हाथों राष्ट्र को सौंप रही है। ज्यादातर राजनीतिक दल एफडीआई के विरोध में हैं, लेकिन अपने ऊपर सीबीआई की तलवार लटकती देख कुछ दलों ने वोट नहीं किया और कांग्रेस पिछले दरवाजे से जीत गई।’ जबकि विपक्ष में रहते हुए अरुण जेटली ने 2013 में कहा, ‘एफडीआई उपभोक्ताओं, किसानों, व्यापारियों, निर्माताओं और देश के हित में नहीं है। इसी वजह से हम इसका विरोध करते हैं और अंतिम सांस तक हम विरोध करते रहेंगे। हम इस देश के लोगों और व्यापारियों के साथ एकजुट खड़े हैं।’ तो पिछले चार वर्षों में ऐसा क्या हुआ कि राजग को अपने पुराने इरादे से पीछे हटना पड़ा। एफडीआई पर यू-टर्न बिल्कुल राजनीति है।

वर्ष 2015-16 में भारत में 55.46 अरब डॉलर का प्रत्यक्ष विदेशी निवेश आया, जो अब तक का उच्चतम रिकॉर्ड है। हालांकि वाणिज्य मंत्री निर्मला सीतारमण ने साफ किया कि नीति में इस तरह से सुधार किया गया है कि इससे घरेलू रोजगार को नुकसान न पहुंचे, लेकिन राष्ट्रव्यापी चर्चा के बिना अचानक भारतीय अर्थव्यवस्था को खोलना कई सवाल उठाता है। उदाहरण के लिए, मधुमक्खी पालन में आखिर क्या समस्या थी कि एपीकल्चर में एफडीआई की अनुमति दी गई। मधुमक्खी पालन किसानों के लिए आय का एक पूरक साधन है, जो पहले से ही गंभीर संकट में हैं। अगर बड़े विदेशी व्यवसायियों के हित में बाजार पर नियंत्रण की कोशिश की गई, तो ये छोटे किसान इससे भी बाहर हो जाएंगे।

पश्चिमी देशों से उन्नत तकनीक आने के साथ घरेलू उद्योग का मानना है कि यह दुधारू पशुओं की नस्ल भी लाएगा और विदेशी अनुसंधान प्रयोगशालाओं द्वारा निवेश में बढ़ोतरी होगी। वास्तव में यह देसी नस्लों को बढ़ावा देने की राजग सरकार की नीति के खिलाफ है। जिस बात की अनदेखी की जा रही है, वह यह कि भारत को नए विदेशी नस्लों की जरूरत नहीं है, बल्कि इसे अपने देसी नस्ल को वापस लाने की जरूरत है, जो ब्राजील में बढ़िया उत्पादन कर रहे हैं। वर्षों से ब्राजील भारतीय नस्लों की गायों का बड़ा निर्यातक बन गया है। एक खालिस गिर गाय प्रतिदिन 73 लीटर दूध देती है।

यह विवाद तब और बढ़ेगा, जब बड़े बहुराष्ट्रीय डेयरी निगम डेयरी उद्योग के संचालन के लिए अपने पशुपालन केंद्रों की स्थापना करेंगे। भारत में दुग्ध सहकारी संस्थाएं आठ करोड़ दुग्ध उत्पादकों को आर्थिक मदद करती हैं, जिनमें ज्यादातर महिलाएं हैं। इन लघु दुग्ध उत्पादकों की आजीविका खतरे में पड़ जाएगी।

शुरू में एफडीआई को देश में उच्चतम तकनीकी लाने के लिए उचित ठहराया गया था। हालांकि रक्षा एवं उड्डयन के क्षेत्र में सौ फीसदी एफडीआई का रास्ता सरकारी मंजूरी के तहत खोला गया है, लेकिन यह अब स्पष्ट है कि निवेशक देश में उच्चतम तकनीक लाने का इरादा नहीं रखते हैं। इसी तरह एकल ब्रांड खुदरा के क्षेत्र में सरकार ने व्यावहारिक रूप से उस प्रावधान को हटा दिया है, जो तीस फीसदी स्थानीय स्रोत को सुनिश्चित करता है। एफडीआई का प्राथमिक लक्ष्य नई तकनीक प्रदान करना और घरेलू विनिर्माताओं को विदेशी कंपनियों के साथ जुड़कर लाभ हासिल करने में सक्षम बनाना था। घरेलू विनिर्माण क्षेत्र को दरकिनार कर निश्चित रूप से रोजगार सृजन नहीं होगा। दवा क्षेत्र के भी इससे सर्वाधिक प्रभावित होने की आशंका है। भारत को अब तक दुनिया में सस्ती दवा उपलब्ध कराने के लिए जाना जाता रहा है। ग्रीनफील्ड एवं ब्राउनफील्ड, दोनों परियोजनाओं में एफडीआई को मंजूरी देने से घरेलू उद्योग को नुकसान पहुंच सकता है। इससे औसत उपभोक्ताओं को जहां महंगाई का सामना करना पड़ेगा, वहीं स्वास्थ्य कार्यक्रमों पर भी असर पड़ेगा और रोजगार सृजन की संभावनाएं भी सीमित हो जाएंगी।

साभार- अमर उजाला से

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