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फिदेल कास्त्रो के रुप में एक किंवदंती का अंत

90 वर्ष की उम्र में फिदेल कास्त्रो के निधन के साथं विश्व इतिहास के एक युग का अंत हो गया है। आज की पीढ़ी के लिए फिदेल कास्त्रो भले रोमांच पैदा करने वाला नाम नहीं है, पर 60 और 70 के दशक में पूरी दुनिया में सशस्त्र विद्रोह और क्रांति से तख्ता पलटने का ख्वाब देखने वालों के लिए फिदेल कास्त्रो लेनिन और माओ से ज्यादा प्रेरणादायी नाम बन गया था। 1959 में क्यूबा के शासक फुल्गेन्शियो बतिस्ता के विरुद्ध उनके नेतृत्व में हुए संघर्ष और विजय की गाथायें बदलाव की चाहत रखने वालों के लिए रुस और चीन की क्रांति कथा से ज्यादा महत्वपूर्ण बन गईं थीं। अंतरराष्ट्रीय राजनीति में सोवियत संघ ने अमेरिका के समानांतर अपना खेमा विकसित किया तो चीन बिल्कुल अलग होकर राष्ट्र को मजबूत बनाने तक सिमट गया। सोवियत संघ का साथी बने रहते हुए भी फिदेल कास्त्रो का क्यूबा तीसरी दुनिया की आवाज बनने की भूमिका में आ गया। क्यूबा ने नेहरु, नासिर और टीटो के सामूहिक विचार से उत्पन्न निर्गुट का वरण किया। वे दो बार इसके अध्यक्ष बने।

आज से पांच वर्ष पहले उन्होंने स्वास्थ्य कारणो से सक्रिय राजनीति अपने को अलग किया था। उस समय मार्च 2011 में जब फिदेल क्यूबा की राजधानी हवाना में हो रहे क्युनिस्ट पार्टी के अधिवेशन में एक व्यक्ति का सहारा लेते हुए पहुंचे तो माहौल इतना भावुक हो गया कि कुछ क्षण के लिए अधिवेशन की कार्यवाही पर विराम लग गया। क्रांति के एक योद्धा को उम्र के पड़ाव ने मजबूर अवश्य कर दिया था, पर वह अधिवेशन के दौरान डॉक्टरों की सलाह के विपरीत घर में पड़े रहना गवारा न कर सका। जब क्यूबा का राष्ट्रगान आरंभ हुआ तो यह 84 वर्षीय व्यक्ति उसी प्रकार सीना ताने खड़ा रहा, जैसे अपनी जवानी के दिनों मेें रहता था।

यही वह जीजिविषा थी, जिसने फिदेल कास्त्रो को सात वर्षों तक सशस्त्र संघर्ष तथा उसके बाद पांच दशकों तक बिना बड़े विरोध के क्यूबा के शीर्ष पर बनाए रखा। बतिस्ता को पराजित कर क्यूबा के प्रधानमंत्री बनने से लेकर 1965 में कम्युनिस्ट पार्टी आफ क्यूबा के पहले सचिव के रुप में कास्त्रो ने क्यूबा का बिल्कुल राजनीतिक रुपांतरण कर दिया और वह एक पार्टी वाला सोशलिस्ट रिपब्लिक ऑफ क्यूबा बन गया। आप देख लीजिए, सोवियत संघ से साम्यवादी शासन के अंत के आसपास पूरी दुनिया में साम्यवादी सत्ताओं का ध्वंस हो गया, पर क्यूबा अविचल रहा। उसने चीन की तरह सम्पूर्ण पूंजीवादी अर्थव्यवस्था भी नहीं अपनाई। उसके सबसे प्रमुख साथी लातिनी अमेरिका के निकारागुआ से भी कम्युनिस्ट शासन समाप्त हो गया, लेकिन क्यूबा उसके प्रभाव से मुक्त रहा। सच कहा जाए तो यह फिदेल का ही प्रभाव था कि लातिनी अमेरिका के देश बोलिविया में अभी तक अर्धकम्युनिस्ट शासन विद्यमान है। दूसरे देश वेनेजुएला में ह्युगो शावेज को भी नैतिक ताकत देने में फिदेल की महत्वपूर्ण भूमिका थी।

अमेरिका ने शीतयुद्धकाल में सोवियत खेमे का अंत करने के लिए अपनी पूरी ताकत लगा दी थी। क्यूबा कास्त्रो की विजय के साथ ही अमेरिका की आंखों की किरकिरी बना रहा, उस पर प्रतिबंध लगाया गया, सीआईए ने विद्रोह के लिए जितना संभव था, किया, पर फिदेल बने रहे। बेशक, कम्युनिस्ट पार्टी का एकाधिकार अपने-आपमें एक पार्टी तानाशाही का पर्याय होता है। फिदेल कास्त्रो कम्युनिस्ट शासन के स्वरुप के अनुसार राज्यांे की परिषद, मंत्रिपरिषद के अध्यक्ष एवं सेना के सर्वोच्च कमांडर बने रहे, पर क्यूबा का रुपांतरण इस तरह किया, जिसमें लोगों को विचार अभिव्यक्ति व कई प्रकार की आजादी प्राप्त हुई।

हालांकि उम्र और बीमारी ने उन्हें शासन चलाने लायक नही रहने दिया था। पश्चिमी मीडिया में उनके नजरबंद करने से लेकर उनके नाम पर शासन चलाने के षडयंत्र की भी झूठी खबरें आतीं रहीं। अटकलों को विराम देते हुए 19 फरबरी 2008 को उन्होंने घोषणा कर दिया था कि वे राष्ट्रपति या सेनापति का पद आगे स्वीकार नहीं करेंगे।उस समय उनके जनादेश का अंत होने में केवल पांच दिन शेष रह गए थे। कास्त्रो के विश्व भर में आलोचक भी हैं, जो उनके शासन को आज भी अवैध मानते हैं। वैसे भी पश्चिमी लोकतंत्र की अवधारणा में सशस्त्र विद्रोह करके शासन पर कब्जा करने को वैध नहीं माना जाता। किंतु सशस्त्र क्रांति कि समर्थकों के लिए तो सत्ता बदलने का यही उचित और मान्य रास्ता है। इसलिए हम इस विचार से तो असहमत हो सकते हैं, पर फिदेल का मूल्यांकन दूसरी विचारधाराओं के दायरे में करना उचित नहीं होगा।

वस्तुतः यह दृष्टिकोण एवं विचारधारा के मतभेद का मामला है। अमेरिका के प्रतिबंधों के बावजूद क्यूबा का इतने वर्षो तक फिदेल कास्त्रो के नेतृत्व में अविचल रहना साधारण बात नहीं है। उन्होेंने देश का केवल राजनीतिक रुपांतरण नहीं किया, उसका आर्थिक रुपांतरण भी किया। पूरी अर्थव्यवस्था को राज्य केन्द्रित करने के साथ भूमि सुधार, खेती के सामूहिकीकरण (कलेक्विाइजेशन) एवं कृषि का यांत्रिकीकरण करके ग्रामीण अर्थव्यवस्था का वर्णक्रम बदल दिया। स्वास्थ्य एवं शिक्षा की जिम्मेवारी राज्य के सिरे लेकर उन्होंने लोककल्याण का ऐसा स्वरुप दिया, जिसका उदाहरण दूसरे देशों में दिया जाता रहा है। वैश्विक संस्थाओं के आंकड़ों के अनुसार कास्त्रो के आलोचक यह साबित करने की कोशिश करते हैं कि क्यूबा का आर्थिक एवं सामाजिक विकास 1959 के बाद आगे नहीं बढ़ा है। फिदेल ने इन आंकड़ों को कभी महत्व नहीं दिया। उनके कुछ सूत्रवाक्य थे- जनता का कल्याण हो रहा है या नहीं, क्यूबा के लोग राज्य को अपना मान रहे हैं या नहीं, उन्हें शासन अपना हितैषी नजर आता है या नहीं।

फिदेल कास्त्रो की राजनीतिक जीवन यात्रा वास्तव में ज्ञान,निश्चय, दिलेरी और संकल्प की रोमांचकारी गाथा है। क्यूबा पर अमेरिकी प्रभाव के विरुद्ध विद्रोह का भाव उनके आरंभ से ही था और जब 1952 में फुल्गेनिको बतिस्ता ने चुनाव के पूर्व ही जबरन शासन पर कब्जा कर लिया तथा अमेरिका ने उसे क्यूबा के शासक के रुप में मान्यता दे दिया तो कास्त्रो ने इसके खिलाफ संघर्ष का ऐलान किया। वकील के नाते न्यायालय में उन्होंने कानूनी लड़ाई लड़ने का रास्ता चुना, लेकिन उनकी अर्जी ही अस्वीकृत हो गई। वहां से उन्होंने अपने भाई राउल एवं कुछ साथियों के साथ सशस्त्र विद्रोह की तैयारी आंरभ की। 26 जुलाई 1953 को बतिस्ता के किले मोन्काडा बैरक पर सशस्त्र हमला एक दुस्साहस था। उसमें 135 विद्रोही मार दिए गए। इसे 26 जुलाई क्रांति के नाम से जाना जाता है। बाद में वे भी गिरफ्तार हुए एवं उन्हें 15 साल की सजा हुई। मुकदमे की सुनवाई के दौरान कास्त्रो ने जो कहा वह युवकों एवं सरकार के खिलाफ विद्रोह करने वालों के लिए प्ररेक वाक्य बन गया। कास्त्रो ने कहा, ‘मैं आपको चेतावनी देता हूं, मैंने तो अभी शुरुआत की है! अगर आपके ह्दय में अपने देश के लिए थोड़ा भी प्यार है, मानवता से, न्याय से प्यार है तो ध्यान से सुनिए…. मैं जानता हूं कि शासन सच को सभी संभव उपायों से कुचलने की कोशिश करेगा, मैं जनता हूं कि मुझे गर्त में फेंक देने की साजिश होगी, पर मेरी आवाज को नहीं दबाया जा सकता, अगर मैं अकेला होऊंगा तब भी यह मेरे अंदर से निकलेगी, मेरा ह्दय इसके लिए पूरी ज्वाला देगी…जिसे निष्ठुर कायर नकारते हैं। आप मेरी निंदा करिए। इसका कोई मायने नहीं है। इतिहास मुझे माफ कर देगा।’

आम माफी में कास्त्रो को दो वर्ष बाद ही जेल से रिहा कर दिया गया। वे मैक्सिको चले गए और वहां 26 जुलाई मूवमेंट के नाम से सशस्त्र विद्रोहियों को संगठित करना आरंभ किया। वहीं कम्युनिस्ट क्रंाति के इतिहास की दूसरी किंवदंती चे ग्वेरा ने गुरील्ला युद्ध में कास्त्रो बंधु एवं अन्य विद्रोहियों को प्रशिक्षित किया। फिर 1956 मंे वे अपने साथियों के साथ क्यूबा पहुंचे और युद्ध किया। मान्जानिल्लो के पास युद्ध में उनके लोग या तो मार दिए गए, कैद किए गए या भगा दिए गए। फिदेल के अलावा ग्वेरा, राउल एवं कैमिलो सिएनफ्युगोस बचने वालों में शामिल थे। देहातों में लोगों का कास्त्रो को समर्थन मिलने लगा।

उन्होंने विद्रोहियों की भर्ती, प्रशिक्षण एवं संघर्ष का लंबा फासला तय किया। उसके बाद बतिसता की सेनाओं से युद्ध, विजय, पराजय की लंबी गाथा है। पराजय के बावजूद बतिसता सरकार को हथियारबंद लड़ाई से उखाड़ फेंकने के उनके दृढ़ संकल्प ने केवल देश में ही नहीं, विदेशों में भी उनको हीरो बना दिया। अमेरिका तक में फिदेल कास्त्रो के प्रति इतनी अभिरुचि बढ़ गई कि न्यूयॉर्क टाइम्स का एक पत्रकार हर्बर्ट मैथ्यूज क्यूबा में आकर उनका साक्षात्कार लिया और यह प्रथम पृष्ठ पर प्रकाशित हुआ। उसमें कास्त्रो को एक ऐसे रोमांटिक एवं क्रांतिकारी की छवि प्रस्तुत की गई जो सबको अपील करता था। उसके बाद एक टेलीविजन चैनल ने फिदेल एवं मैथ्यूज दोनों का साक्षात्कार लिया। फिदेल की दाढ़ी वाली तस्वीर उनकी पहचान बन गई। ऐसे व्यक्ति का विदा होना सामान्य घटना नहीं हो सकती।

(लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवँ स्तंभकार हैं )
संपर्क
अवधेश कुमार,ईः30, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः110092, दूरभाष 22483408, 9811027208



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