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पाँच कविताएँ

1.
सांस्कृतिक सृजनकार!
मन के उपवन में
हरे भरे सपनों के बीच
प्रेम के धरातल पर खड़ा
कहीं एक अरमानों का आशियां हो
तलाव की सतह पर
नाचती बूंदों के साथ
चाहतों का इंद्रधनुष
जीवन आकाश में खिला हो
जहां धानी चुनर ओढ़े
एकांतवास में समाधिस्थ है
सृजन सत्व में भीगता
सांस्कृतिक सृजनकार!

2.

विवेक शून्य राष्ट्र
– मंजुल भारद्वाज

भ्रष्ट लिंग
अभिशप्त योनि
जन रहे हैं
विवेक शून्य राष्ट्र
जिस पर बैठा धृतराष्ट्र
पल पल अग्रसर है
अपने विध्वंस की ओर
अब कृष्ण नदारद है
अर्जुन विलुप्त है
भीष्म, द्रोण अन्तर्ध्यान हैं
इस पाप के बजबजाते
युद्ध का सारथी और सेनापति है
सिर्फ़ अश्वत्थामा
अपने ही मवाद में
युगों युगों तक रेंगता हुआ !

3.

उम्मीद का आत्मिक सौन्दर्य है चाँद!
-मंजुल भारद्वाज
रात का हम सफ़र है चाँद
अँधेरे में जला चराग़ है चाँद
रात की गोद में खेलता
हौंसला है चाँद
पारम्परिक प्रकाश बिंब के बरक्स
प्रतिकूल हालात में
मन का राज़दार
वफ़ा ऐ नूर से रोशन
उम्मीद का आत्मिक

4.

अनंत ….

-मंजुल भारद्वाज
आत्म प्रेरित उर्जा
ठहरा हुआ जड़
अपनी अपनी धुरी पर घूमते हुए
रचते हैं चेतन अवचेतन संसार
जिसमें दौड़ता रहता है
जन्म से मृत्यु तक मनुष्य
खोजते हुए जीवन सार
अनंत ….
जीवन के लिए!

5.
आग़ जलती रहे!
– मंजुल भारद्वाज
आग़ जलती रहे
घर के चूल्हे में
पृथ्वी के गर्भ में
सूर्य के अस्तित्व में
रिश्तों की गर्मजोशी में
चाहत के झरने में
सांसों के आवागमन में
उदर के पाचन में
बर्फ़ के सीने में
प्रणय पर्व में
बीज धारण किए
खेत की माटी में
विवेक के शांत प्रकोष्ट में
बुद्धि के वैचारिक प्रभाग में
न्याय पुकारती रूह में
आग़ जलती रहे
माटी के चोले में
जब तक आग़ है
तब तक जीवन है
जब तक देह है
आग़ जलती रहे
आग़ नहीं है तो आप
जीते जी
मोक्ष धाम में स्थापित हैं
मुक्ति के लिए
आग़ जलती रहे!


Manjul Bhardwaj
Founder – The Experimental Theatre Foundation www.etfindia.org
www.mbtor.blogspot.com
Initiator & practitioner of the philosophy ” Theatre of Relevance” since 12
August, 1992.

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