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धर्म की ध्वजा पाखंडियों के हाथ में

अगर लफंगों के वैचारिक ढाल बनकर आप सोच रहे हैं कि आप हिंदुत्व की रक्षा कर रहे हैं तो आपमें और जाहिल जिहादियों में बस प्रतीकात्मक रंग का अंतर है। वे हरे हैं आप गेरुए।

मैं पुनः ध्यान आकर्षित करना चाहता हूं कि “पाखंड का हर ढहता किला सनातन धर्म के लिए हितकर है। इसमें सांस्कृतिक अनपढ़ों की भीड़ इकट्ठी कर आग्नेय लघुशंका करने से वैश्विक परिदृश्य में आपकी छवि जिहादियों जैसी ही बन रही है।”

एक बात और है कि हर कथित बाबा को दैवीय आभामंडल प्रदान करने के दोषी अप्रत्यक्ष रूप से हमारे सनातन धर्म के स्थापित पीठ भी हैं।

क्यों एक टुच्चा सा धूर्त अनपढ़ भीड़ में लोकप्रिय हो रहा है और परंपरा से स्थापित आचार्यों के बारे में कोई रुचि नहीं है???

शंकराचार्य मठ हों या अन्य कोई भी परंपरा जनसाधारण के बीच इनकी संवादहीनता विदित ही है। ये लोग अपने ही घेरे में रसूखदार लोगों के बीच बैठकर संस्कृति के आधार बनाते रह जाते हैं और धर्म में उत्सुक सामान्य व्यक्ति को कपटी बाबा झपट जाते हैं। पाखंडी बाबाओं की लोकप्रियता का सबसे बड़ा कारण है इनका सामान्य व्यक्ति के साथ जीवंत संवाद।

हमारे 13 अखाड़े के नागा साधु और बैरागी साधुओं की संवाद की क्षमता फिर भी ठीक है। किंतु विद्वान कोटि के संन्यासियों के लक्षण इतराई हुई नारी जैसे लगते हैं। मुझे कम ही विद्वान संन्यासी मिले हैं जिनमें सरलता पाई गई है। और मैं 20/25 वर्षों से इस क्षेत्र के लोगों के संपर्क में हूं।

जूना अखाड़े के नागा साधु अंगद गिरिजी ने एक बार चर्चा में बताया था कि “करता पाखंडी है और भरता साधु है।” उसी चर्चा में उन्होंने मेरे तर्क से सहमति जताई थी कि ,”पाखंडी को भगवान बनने देने के लिए कहीं न कहीं परंपरा भी जिम्मेदार है।”

हमारे सनातन धर्म में शैवमत के 7 अखाड़े हैं, वैष्णव मत के 6 अखाड़े हैं। इसके अलावा नाथ संप्रदाय के साधु हैं और उदासीन संप्रदाय के साधु हैं। फिर कबीर इत्यादि के संप्रदाय हैं।

किंतु सनातन धर्म के वैचारिक प्रतिनिधि वेदांत मत के शांकर परंपरा से दीक्षित दंडी स्वामी और संन्यासी हैं। ऐसे ही वैष्णव संप्रदाय के निंबार्काचार्य, माध्वाचार्य और रामानुजाचार्य की समृद्ध बौद्धिक परंपरा है। फिर क्या कारण है कि कोई भी लफंगा संत घोषित हो जाता है और इन सबकी नाक के नीचे बढ़ कर अपरिहार्य हो जाता है????? इंदौर में ही देख लीजिए संघ और विहिप का उपयोग कर राधे राधे बाबा ने अपना साम्राज्य स्थापित कर लिया क्या दुर्गति हुई उसकी यह बताने की आवश्यकता नहीं है।

इसी प्रकार इंदौर में दत्त संप्रदाय के नाम पर कई तथाकथित महाराज अपने आपको संत कहलवाने लगे उनके बड़े-बड़े आश्रम मंदिर पलसीकर, सुकलिया क्षेत्रों में बन गए।
इन सब परिस्थितियों के लिए मुझे लगता है की संवादहीनता सबसे बड़ा कारण है वर्षों से जो संस्थाएं धर्म और अध्यात्म के क्षेत्र में कार्य कर रही थी उनका जनसामान्य से संवाद कम हो गया है और इसी का परिणाम इस तरह के कुकुरमुत्तों के रूप में पाखंडी संतों का उद्भव हो गया है। मैं बहुत छोटा व्यक्ति हूं कोई बड़ी बात नहीं कर सकता, किंतु आचार्यगण अवधान दें कि ऐसे नासूर पनपने के पहले ही समाप्त हो जाएं।

एक समय था जब किसी भी गांव में कोई धूर्त दूकानदारी जमाने आता तो 24 घंटे में नागाओं के दल उसे पकड़ लेते और परंपरा की पूछताछ में गड़बड़ी पाए जाने पर तगड़ी सुताई के साथ रवाना किया जाता था। आज स्थिति यह है कि खुद अखाड़े 15/20 लाख रुपए में महामंडलेश्वर जैसे पद गुंडों, छिनालों और लफंगों को बेच रहे हैं। आचार्य बैठे हैं बस चिंतन शिविर चल रहे हैं एयरकंडीशन मठों में।

ये हाल रहा तो वो समय दूर नहीं जब सारे स्थापित मठ इतिहास के शोधकर्ताओं के लिए ही रह जाएंगे। परशुराम और दुर्वासा जैसे लोगों की समृद्ध परंपराएं इन्हीं दुर्गुणों की भेंट चढ़ गई हैं।

मित्रों आज हजारो वर्षो से मछिन्द्र नाथ , गोरख नाथ , सन्त ज्ञानेश्वर, संत तुकाराम, संत एकनाथ, संत जलारामबापा , रामकृष्ण परमहंस, संत रैदास, तुलसी दास, सूरदास , आदी शंकराचार्य , बाबा कीनाराम , तेलंग स्वामी , देवरहा बाबा, स्वामी करपात्री , त्रिदंडी स्वामी आदि ऐसे अनगिनत महान और सिद्ध महात्मा इस देश में पैदा हुए!

चमत्कारिक शक्तियों से सभी भरे हुए थे सब ने देश को नयी दिशा दी सबके लाखो करोडो अनुयायी थे गुरु के संस्कार से युक्त परम् देशभक्त!

उपरोक्त सभी संतो की तस्वीर देखे सब का पहनावा सादगी भरा था!
तेलंग स्वामी तो काशी में नंग धडंग रहते थे!
करपात्री जी एक बार दोनों हाथ को जोड़ कर जो भिक्षा में मिलता उसी से गुजरा कर लेते थे!
इनमे से सभी संत सादगी में जिए सादगी में मरे किसी ने अपना कोई आर्थिक साम्राज्य नहीं बनाया!

अब आईये निर्मल बाबा, रामपाल , जय गुरुदेव , धीरेन्द्र ब्रह्मचारी, चंद्रास्वामी , राधे माँ , आसाराम, राम रहीम, राधे राधे, जैसे बाबाओं के पास किसी के पास मच्छर मारने की भी सिद्धि नहीं है!

लेकिन सबके सब अथाह सम्पति के मालिक बने हैं!

किसी ने समाज देश को सही दिशा नहीं दी! बेवकूफ लालची गरीब,अमीर लोगो को गुमराह कर अपना उल्लू सिद्ध किया!

लालची जनता इन ढोंगियों के पास केवल धन , वैभव, की लालसा में जाते रहे! और ये कालनेमि किसी सड़क छाप जादूगर की तरह इनको सम्मोहित कर उल्लू बनाते रहे!

जैसी प्रजा होगी वैसे ही समाज की स्थापना होगी!

प्रजा यदि चाहेगी “घूँघट नहीं खोलूंगी सैया तोरे आगे” को लोकप्रिय करना तो फ़िल्मकार मदर इंडिया बनाएगा!

प्रजा यदि सुनना चाहेगी “हम तो पहले से घूँघट उठाये बैठी ” तो फ़िल्मकार मर्द बनाएगा!

मलेंच्छ जाकिर नाईक, बरकाती , अंसार राजा , इमाम बुखारी जिनके पाक है या नापाक उनको झेलने दो!

तुम राम की संतान हो! अगस्त्य, भारद्वाज, अत्रि , विश्वामित्र , वसिष्ठ की खोज करो!

आज भी बहुतेरे सिद्ध है जो आशीर्वाद नहीं बांटते, झोपडी और कंदराओ में है!

अर्ध नंग और पूरे नंग है!

लेकिन तुम तो चटनी से कृपा खोज रहे खोजो!

आज रहीम बाबा है कल अंसारी बाबा तुम्हे डरायेगा!
और तुम जैसे संस्कार को खो चुके हिन्दुओ की बेटियाँ लवजेहाद में फँसती रहेगी।

अब भी है कोई शक……..!!!

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

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