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मालवा के लोक देवता वीर तेजाजी महाराज

वीर तेजाजी महाराज एक लोक देवता है। उन्हें शिव के प्रमुख ग्यारह अवतारों में से एक माना जाता है । कुछ सालों पहले तक मालवा व राजस्थान के विभिनन्न मेलों और हाट बाजारों में तेजाजी की कथा गाँव के लोगों का एक खास आकर्षण हुआ करती थी। गाँव के युवक और किशोर तेजाजी की कथा में अलग अलग किरदार निभाकर अपनी अभिनय कला को निखारते थे। साथ में संगीतकार के रूप में हारमोनियम बजाने वाला, ढोलक पर थाप देने वाला और तेजाजी की वीरता के किस्से गाने वाला ऐसा समांँ बाँधते थे कि लोग रात भर वीर तेजाजी की कथा सुनते रहते थे। बीच बीच में मालवी के लोकप्रिय गीत इस कथा को रसमयी और भक्तिमयी बना देते थे। ये कथाएँ कई बार किसी गाँव या शहर के मोहल्लें में भी होती थी और रात भर अलग-अलग घरों से कथा सुनने देखने वालों के लिए चाय नाश्ता बनकर आता रहता था। ठंड के दिनों में होने वाली कथा बकादा अलाव जलाकर सुनी और देखी जाती थी। इस कथा के लिए कोई मंच नहीं होता था, किसी के घर का ओटला या किसी घर के बाहर रखी तखत मंच का काम करती थी।

तेजाजी का जन्म राजस्थान के नागौर जिले में हुआ था ।तेजाजी वीर योद्धा थे। तेजाजी का जन्म मनौती स्वरूप हुआ था। तेजाजी के माता-पिता शिव पार्वती के भक्त थे। उन्होंने शिव पार्वती की तपस्या की थी ।ऐसा कहा जाता है कि ,उस फल स्वरुप तेजाजी का जन्म हुआ उन्होंने वरदान दिया कि यह बालक बहुत तेज स्वरूप बहुत वीर और बलशाली रहेगा ।कई बार कई संकट आए पर तेजाजी पर हर संकट शिव कृपा से टल गया।

तेजाजी के पूर्वज कि जायल के काला जाटों की पीढ़ी दर पीढ़ी शत्रुता चली आ रही थी। जायल के सरदार ने अपने ज्योतिष को बुलाकर पूछा था कि बालक का भविष्य क्या होगा ज्योतिष ने बताया था यह बालक अपार बली होगा अन्याय के खिलाफ लड़ने वाला होगा और धर्म संस्थापन के पक्ष में हमेशा बलिदान मर मिटने वाला होगा गोधन के लिए यह ईश्वर स्वरूप ही रहेगा।
तेजाजी के पिता राजस्थान के नागौर जिले के खरनाल गांव के मुखिया थे तेजाजी की माता का नाम राम कुवंरी था और उनका ननिहाल किशनगढ़ जिले में त्यौद गांव में था। विवाह के बारह वर्ष तक राम कुवंरी बाई के कोई संतान नहीं थी तो स्वयं रामकुंवरी बाई ने अपने पति का विवाह करवाया इसी विवाह से उनके पुत्रों का वर्णन है और संतान स्वरूप पांच पुत्र थे।
राम कुंवरी बाई को संतान नहीं थी तो उन्होंने गुरु मंगल नाथ जी के कहे अनुसार नाग देव जी की पूजा आरंभ की बारह वर्ष की आराधना के बाद उन्हें तेजाजी के रूप में एक पुत्र और एक पुत्री राजल भी प्राप्त हुई ।

वहां नाग महाराज की पूजा होती थी वह नागबांबी आज भी त्यौद में मौजूद है ।अब उस स्थान पर तेजाजी की देव गति धाम स्थित है।

पहले समय में वहां घनघोर जंगल था अब वहां वीर तेजाजी का मंदिर बना हुआ है । तेजाजी के जन्म के समय तेजाजी का प्रखर तेज चेहरे पर चमक रहा था तो जन्म के साथ ही उनके पिता ने उन्हें तेजा कह कर बुलाया और तभी से उनका नाम तेजाजी प्रचलित हुआ उनके जन्म के समय ही उनकी माता को एक आवाज सुनाई दी थी___ कुंवर तेजा ईश्वर का अवतार है लेकिन वह तुम्हारे साथ अधिक समय नहीं रहेगा।

भादों मास की शुक्ल पक्ष की दशमी को तेजाजी का पूजन होता है। नागदंश के कारण वीर तेजाजी का जीवन अंत हुआ था,उसी तिथी उसी स्थान पर वीर तेजाजी का मेला लगता है।उसे तेजाजी की जात्रा भी कहा जाता है। हजारों की संख्या में लोग एकत्रित होते हैं।

तेजाजी का भारत के जाटों में महत्वपूर्ण स्थान है। तेजाजी सत्यवादी और दिये हुये वचन पर अटल थे। उन्होंने अपने आत्म – बलिदान तथा सदाचारी जीवन से अमरत्व प्राप्त किया था। उन्होंने अपने धार्मिक विचारों से जनसाधारण को सद्मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित किया और जनसेवा के कारण निष्ठा अर्जित की। जात – पांत की बुराइयों पर रोक लगाई। शुद्रों को मंदिरों में प्रवेश दिलाया। पुरोहितों के आडंबरों का विरोध किया। तेजाजी के मंदिरों में निम्न वर्गों के लोग पुजारी का काम करते हैं। समाज सुधार का इतना पुराना कोई और उदाहरण नहीं है। उन्होंने जनसाधारण के हृदय में सनातन धर्म के प्रति लुप्त विश्वास को पुन: जागृत किया। इस प्रकार तेजाजी ने अपने सद्कार्यों एवं प्रवचनों से जन – साधारण में नवचेतना जागृत की, लोगों की जात – पांत में आस्था कम हो गई। कर्म,शक्ति,भक्ति व् वैराग्य का एक साथ समायोजन दुनियां में सिर्फ वीर तेजाजी के जीवन में ही देखने को मिलता हैं।

तेजाजी का विवाह उनके जन्म के कुछ महिनों पश्चात ही हो गया था। किसी विवाद के कारण दोनों परिवारों की दुश्मनी हो गई थी। जब बड़े हुए तो अपनी भाभी के तानों से आहत वीर तेजाजी अपनी पत्नी को लेने जाते हैं। रास्ते में नाग को बचाने के कारण वह नाग से वचनबद्ध हो जाते हैं कि वापस आते समय तुम मुझे डस लेना अभी अपनी पत्नी को लेने जा रहा हूं।
वहां भी उनका अपमान होता है। विवाद होता है।

अपनी पत्नी पेमल को अपने घर लाते समय फिर नाग देवता से मिलकर स्वयं को डसने की प्रार्थना करते हैं। हर जगह घाव होने के कारण नागदेवता उनकी जीभ पर डसते है और उनका अंत होने पर वरदान देते हैं कि जो कोई आज तुम्हारी पूजा करेगा नाग दंश से उसकी मृत्यु नहीं होगी। उनकी पत्नी पेमल भी सती हो जाती है। अब उस स्थान को तेजाजी का देवरा कहा जाता है।
बहुत सी ऐसी बातें हैं जो उस समय के जनजीवन से आगे बढ़ी। कुछ सुनी और कुछ पढ़कर तेजाजी महाराज का जीवन इतिहास पता चला। जो तेजाजी महाराज की गाथा लिखकर गये उसी अनुसार यह लिखा। राजस्थान में तो वीर तेजाजी के मंदिर कई जगह है। मध्यप्रदेश में भी उनको बहुत माना जाता है।

साभार संकलन, सभी स्त्रोत का आभार

 

 

 

 

माया बदेका
उज्जैन मध्यप्रदेश

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