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मूर्ख चैनल वालों ने गरीब आदमी की मुर्गी राज्यपाल की बता दी!

उस दिन जब टीवी ऑन किया तो पाया कि लगभग हर चैनल पर ब्रेक्रिंग न्यूज चल रही थी कि उत्तर प्रदेश के राज्यपाल ने मुर्गी चोरी की पुलिस जांच के आदेश दिए। इसके पहले आजम खान की भैंस बरामद कर लिए जाने की खबर आई थी। खबर में बताया जा रहा था कि राजभवन ने कुछ मुर्गियों की चोरी का पता लगाने के लिए पुलिस को आदेश दिए हैं। जितना अपन उत्तर प्रदेश के राज्यपाल को जानते हैं उसके मुताबिक मुर्गी पालना तो दूर रहा, वे तो अंडा तक नहीं खाते हैं, अगर कबूतर पालने की बात होती तो भी शायद एक बार विश्वास हो जाता। मगर सारा दिन तमाम चैनल राज्यपाल की व आजम खान की तुलना कर उनका मखौल उड़ाते रहे।

अगले दिन जब अखबार खोला तो खबर पढ़ कर माथा ठोंक लेने का मन करने लगा। मामला यह था कि उत्तर प्रदेश के किसी गरीब व्यक्ति की दर्जन भर मुर्गियां चोरी हो गईं। उसने पुलिस में इनकी चोरी की रिपोर्ट लिखवाई, पर उन्होंने कुछ नहीं किया। अंततः उसने राज्यपाल के यहां अपनी फरियाद कर दी और जैसा कि रुटीन में होता है, उनके यहां के एक अधिकारी ने पुलिस को इस मामले में कार्रवाई करने के आदेश दे दिए।

आम आदमी इंसाफ न मिलने पर यहीं कदम उठाता और राज्यपाल या राष्ट्रपति द्वारा उसकी फरियाद को कार्रवाई के लिए आगे भेज दिया जाता। हर दिन दर्जनों ऐसे मामले आते हैं पर चूंकि चैनलों को तो सनसनी पैदा करनी थी इसलिए उन्होंने यह साबित करने की कोशिश की कि जैसे पुलिस का अमला आजम खान की भैंसें ढूंढने के लिए परेशान हो गया था, वहीं काम उत्तर प्रदेश के राज्यपाल करवा रहे हैं। उन्होंने तो अपनी मुर्गियां ढूंढने के आदेश जारी करवा दिए।

यह सब देख कर टीआरपी बढ़ाने के लिए बेताब चैनलों की मानसिकता पर हंसी आती है। बहुत पहले जब दिल्ली से एक बड़े प्रकाशन घराने का सांध्य दैनिक शुरु हुआ तो उसके कर्णधारों ने भी इसी तरह की हरकतें कीं। एक दिन खबर छपी कि ‘सायरा बानो गिरफ्तार’। यह हेडलाइन किसी को भी आकर्षित कर सकती थी। खबर में बताया गया था कि जामा मस्जिद इलाके में रहने वाली इस नाम की एक महिला को जेब काटते हुए पकड़ा गया था।

सांप-छुछुंदर दिखाकर अपनी टीआरपी बढ़ाने के लिए चर्चित एक चैनल पर एक बार खबर दिखाई जा रही थी कि यह बंदर जो सिगरेट पीता है व उसे पिलाने वाले को धन्यवाद देता है। जब खबर देखी तो पला चला कि किसी ने बंदर को सिगरेट पकड़ाई, बंदर ने उससे हाथ मिलाया और मुंह में चबा कर सिगरेट तोड़ दी। चैनल ने दर्शकों को अंधा मानते हुए चिल्लाकर उन्हें बताया कि यह बंदर हाथ मिलाकर धन्यवाद देता है। यह मुंह से चबा कर सिगरेट पीने का मजा लेता है।
ब्रेक्रिंग न्यूज दिखाना ओर सबसे पहले कोई खबर ब्रेक करने का श्रेय लेना तो खबरिया चैनलों की आदत में शुमार है। सुबह अखबार में छपी खबर का फॉलोअप करके उस पर सारा दिन अपनी खोज होने का ढिंढोरा पीटना बहुत आम बात है। अपवाद के रुप में एबीपी ही ऐसा चैनल है जो कि कम से कम किसी अखबार में छपी खबर पर चर्चा करवाते या उसका इस्तेमाल करते समय उसे इसका श्रेय तो देता है।

खुद श्रेय लेने की बीमारी तो कंजेक्टिवाइटिस की तरह फैल चुकी है। कुछ चैनल तो इतने बेशर्म हैं कि उन्हें दूसरे का शिकार हथियाने में जरा शर्म नहीं आती है। इनमें टाइम्स नाऊ अब सबसे आगे है। अरनब गोस्वामी को खुद अपने चेहरे व अपनी गुर्राहट पर इतना ज्यादा नाज है कि क्या करें। मैंने अपने कॉलम में एक घटना का जिक्र किया था कि जब मैं अंगूठा छाप व्यापारी नानक सिंह से मिला था तो उन्होंने अपने ड्राइंगरुम में एक आदमकद तस्वीर लगा रखी थी। जब मैं शिष्टाचारवश उनसे पूछा कि क्या यह आपके पिता हैं तो उन्होंने उलाहना देने के स्वरों में कहा था कि पिताजी क्यों होंगे? उन्होंने मेरे लिए क्या किया? यह तो नानक सिंह की तस्वीर है जो कि अपनी मेहनत और हिम्मत से यहां तक पहुंचा है।
मुझे अक्सर अरनब गोस्वामी में नानक सिंह की छवि नजर आती है। मैं तो उन्हें अंग्रेजी बोलने वाला नानक सिंह मानता हूं जिसे कि अपनी शक्ल से बेहद लगाव है और जो किसी और की बात सुनने को तैयार ही नहीं है। पिछले एक हफ्ते से टाइम्स नाऊ चैनल को देखकर ऐसा लगता है कि जैसे कि अरनब गोस्वामी ओंबुड्समैन हों, जिन्होंने सारी नैतिकता बचाने का ठेका ले रखा हो। वे हर पांच मिनट में दावा करते हैं कि देश में जितने भी घोटाले हुए उसका सबसे पहले उन्होंने ही पर्दाफाश किया। इतने निर्लज्ज हैं कि ललित मोदी कांड के खुलासे का भी श्रेय लेने से नहीं शरमाते हैं। उन्हें लगता है कि देश के दर्शक सिर्फ उनका चैनल ही देखते हैं, कोई अखबार नहीं पढ़ते, दूसरा चैनल नहीं देखते हैं। हर अखबार में यह बात छप चुकी है कि ललित मोदी प्रकरण का खुलासा लंदन के संडे टाइम्स अखबार में हुआ था, वहीं से इस मामले ने तूल पकड़ा।

 

उन्हें अपने चेहरे से इतना प्यार है कि 24 घंटे तक चलने वाले इस चैनल में उसके लोगो के बाद अगर कोई चीज़ सबसे ज्यादा देर तक दिखाई जाती है तो वह उनका चेहरा ही है। खबर कोई भी चल रही हो पर चेहरा अरनब गोस्वामी का चलता है। मुझे तो लगता है कि खुद उनके अपने परिवार के लोग भी इतनी देर तक उनका चेहरा देखकर ऊब चुके होंगे। इतना प्रचार तो आपातकाल के दौरान 20 सूत्री कार्यक्रम का भी नहीं हुआ, जितना कि टाइम्स नाऊ पर अरनब गोस्वामी का हो रहा है। जिस तरह से भीड़ में मंहगी गाड़ी के रिक्शेवाल से टकरा जाने पर गाड़ी का मालिक पानवाले को अपने पक्ष में करने के लिए उसे भाई साहब कहकर बुलाता है वहीं वे कर रहे हैं। उन्हें गरियाते व उनके चैनल का बहिष्कार करते आए नेताओं के चेहरे उनके पसंदीदा हैं। जो कांग्रेसी कल तक उन्हें भ्रष्ट नजर आ रहे थे, उनके जरिए वे नैतिकता का उपदेश दिलवा रहे हैं। अगर कोई उन्हें उनके किसी एंकर की अनैतिकता की याद दिलाता है तो उन्हें आग लग जाती है। मेरा मानना है कि नरेंद्र मोदी को तो उन्हें इस सरकार का लोकपाल नियुक्त कर देना चाहिए ताकि वे देश को यह बता सके कि कहां क्या अनैतिक हो रहा है।

जब खबरिया चैनलों की देश में बाढ़ आई, तो लगता था कि बहुत जल्दी ही यह इलेक्ट्रॉनिक मीडिया, प्रिंट मीडिया के अस्तित्व के लिए खतरा बन जाएगा। अखबारों को अहमियत कम होती जाएगी। जब लोगों को बिना कुछ किए घर बैठे सदृश्य लाइव खबरें देखने को मिलेगी तो कौन अखबार पढ़ने की जहमत मोल लेगा। मगर ऐसा नहीं हुआ। इस संघर्ष में न केवल अखबार प्रतियोगिता से बचे रहें, बल्कि उनका प्रसार, प्रचार व विश्वसनीयता देानों ही बढ़ीं। असल में यह चैनल तो अपनी टीआरपी बढ़ाने के लिए हाथी को अश्वत्थामा बताकर टीआरपी बढ़ा रहे हैं। एक पुराने शेर को बदल दें तो वह यूं बनेगा ‘सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरी आदत है। अपनी तो कोशिश है कि टीआरपी बढ़नी चाहिए’। 

(लेखक एक वरिष्ठ पत्रकार हैं, विनम्र उनका लेखन नाम है।)

साभार- नया इंडिया से 

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