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’छत्तीसगढ़ के चार चिन्हारी -नरवा, गरूवा, घुरूवा अऊ बाड़ी-ऐला बचाना हे संगवारी’’

कृषि आधारित ग्रामीण अर्थव्यवस्था के सुदृढ़ीकरण तथा ग्रामीण क्षेत्रों में उपलब्ध प्राकृतिक संसाधनों जैसे- नरवा (नदी-नाला), गरूवा (पशुधन), घुरूवा (जैविक खाद, बायो कम्पोस्ट) एवं बाड़ी (घर के बाड़ी में साग-सब्जी एवं फल) के समन्वित विकास से कृषि उत्पादन और किसानों के आमदनी बढ़ाने के लिए छत्तीसगढ़ राज्य में अभिनव प्रयास प्रारंभ किया गया है। ’’छत्तीसगढ़ के चार चिन्हारी – नरवा, गरूवा, घुरवा अऊ बाड़ी-ऐला बचाना है संगवारी’’ की इस परिकल्पना से ग्रामीण क्षेत्रों की दशा में अमूलचूल परिवर्तन आएगा और ग्रामीण स्वावलंबन की अर्थव्यवस्था की दिशा में अच्छा कार्य होगा।

इसके लिए राज्य स्तर में मुख्य सचिव और जिला स्तर पर कलेक्टरों की अध्यक्षता में समितियों का गठन किया गया है, जिसमें विभिन्न विभागों के अधिकारी शामिल किए गए हैं। इसके क्रियान्वयन के लिए विभिन्न विभागों की विभिन्न योजनाओं के अभिसरण और उपलब्ध संसाधनों के प्रभावी एवं एकीकृत उपयोग को सुनिश्चित किया जा रहा हैै। कार्यक्रम में निम्नानुसार गतिविधियां ली जाएगी-

1. नरवा:-  प्रदेश के ग्रामीण अंचलों में जल स्त्रोतों, नालों के उद्गम स्थल से शुरूआत करते हुए आवश्यकतानुसार जल संचयन एवं संवर्धन हेतु कच्ची एवं पक्की संरचनाओं का निर्माण करना। इसके लिए वैज्ञानिक ढंग से सैटेलाईट इमेज एवं जीआईएस मैप का उपयोग कर किया जाएगा। छोटे स्ट्रक्चर, बोल्डर, चेक-डेम इत्यादि को बढ़ावा दिया जाएगा। ग्रामों के तालाब एवं जल स्ट्रक्चरों को सोलर पंप एवं पाईप लाईन के माध्यम से भरा जावेगा। वर्तमान नदी-नालों तालाबों का संधारण, जीर्णोद्धार व गाद हटाने की कार्यवाही की जावेगी। इसके तहत सरफेस वॉटर जैसे नदी-नालों – तालाबों के साथ जमीन के नीचे के जल को सुरक्षित बनायें रखने पर जोर दिया गया है।

 

 

अपेक्षित मुख्य लाभ –  नदी-नालों-तालाबों का पुनरोद्धार होकर जल स्तर में वृद्धि होगी, जिससे अधिकाधिक द्विफसलीय उत्पादन संभव हो सकेगा। साथ ही साथ जल स्त्रोतों में बारह महीने पानी सुनिश्चित हो सकेगा तथा भू-गर्भ जल में वृद्धि होगी।

2. गरूवा:-  हर ग्राम में तीन एकड़ भूमि का चयन कर दिन में गौठान में पशुओं के रहने हेतु प्रबंधन की उचित व्यवस्था की जावेगी। ये गोठान पशुधन के लिए ‘डे केयर सेन्टर‘ की तरह कार्य करेंगे। गौठान हेतु ऊंची भूमि जहां 2-4 बडे़ वृक्ष हो, का चयन किया जाएगा। इस हेतु भूमि का आरक्षण कर फेसिंग एवं सी.पी.टी. कार्य कराये जायेंगे। इसकी परिधि व गौठान में वृक्षारोपण किया जावेगा। गौठान में पशुओं के बैठने के लिए पक्का प्लेटफार्म, बछड़ों, बीमार पशुओं एवं चारा के लिए शेड, पीने के पानी हेतु टंकी एवं उपयुक्त संरचनाएं आदि बनाई जायेगी। जल की सुनिश्चित उपलब्धता हेतु नलकूप खनन कराकर सोलर पंप लगाए जायंेगे। गौठान में बंधियाकरण एवं नस्ल सुधार को बढ़ावा दिया जायेगा।

 

अपेक्षित मुख्य लाभ-  ग्रामीण क्षेत्रांे में पशुओं के चरने से फसल को नुकसान होता है। इस प्रकार सामूहिक गौठान में पशुओं को सुरक्षित रखने से फसलों की सुरक्षा होगी और उत्पादन में बढ़ोतरी होगी। गौठानों में कृत्रिम गर्भाधान से पशुओं की नस्ल में सुधार को बढ़ावा मिलेगा, जिससे ग्रामीण अंचलों में उन्नत किस्म के पशुओं की उपलब्धता होगी और दूध उत्पादन में बढ़ोतरी होगी।

3. घुरूवा:-  गौठान में सामुदायिक आधार पर बायो गैस प्लांट, कम्पोस्ट इकाईयां, चारा विकास एवं दुध संग्रहण केन्द्र बनाए जायेंगे। बायो गैस प्लांट से ग्रामवासियों को गैस की सुविधा मुहैया कराई जायेगी। गौठान के पशुओं के गोबर से जैविक खाद का उत्पादन होगा। इसी के साथ सामुदायिक बायोगैस की स्थापना की जाएगी, जिससे कम लागत में अधिक फसल उत्पादन एवं ऊर्जा उत्पादन सुनिश्चित होगा। इससे रोजगार बढ़ने के साथ-साथ कृषि की उत्पादकता और गुणवत्ता का भी विकास होगा। यहां पैरा कुट््टी मशीन भी लगाने पर जोर दिया गया है, जिससे पशुओं को अच्छा आहार मिले। गांव में चारागाह विकास पर भी जोर दिया गया है, जिससे पशुओं को ज्यादा से ज्यादा समय तक हरा चारा मिलें।

 

 

अपेक्षित मुख्य लाभ-  पशुओं के गोबर को एकत्रित कर गोबर गैस प्लांट में उपयोग करने के साथ-साथ घुरूवा निर्माण में और अधिक सहुलियत प्राप्त होगी, जिससे अधिक मात्रा में जैविक खाद का उत्पादन होगा, जिससे खादों के उपयोग करने हेतु हर किसान को अवसर प्राप्त होगा। जैविक खाद के उत्पादकता से पौष्टिक और गुणवत्ता में बढ़ोतरी होगी।

4. बाड़ी:-   हर गांव में उद्यानिकी और कृषि की विभिन्न योजनाओं व गतिविधियों से उद्यानिकी फसलों/सब्जी का उत्पादन हर घर के बाड़ी में लिया जाएगा। आवश्यकताओं के अनुरूप साग-सब्जी बीजों आदि का विेतरण किया जाएगा। नदी नालों के किनारे फलदार वृक्षों का रोपण किया जाएगा। जैविक खाद के माध्यम से फसलों की उत्पादकता बढ़ेगी, रोजगार के अवसर बढेंगे तथा सब्जी, फल आदि पोषकयुक्त कृषि उत्पाद बढ़ने से स्वास्थ्य पर भी अच्छा प्रभाव पड़ेगा।

अपेक्षित मुख्य लाभ-  ग्रामीण क्षेत्रों में साग-सब्जियों के उत्पादन को बढ़ावा देने से किसानों की आमदनी में वृद्धि होगी, इतना ही नहीं ग्रामीण परिवारों के लिए पौष्टिक आहार उपलब्ध होगा। हर गांव में बीज वितरण से साग-सब्जियों एवं फलों के उत्पादन को बढ़ावा दिया जाएगा, जिससे किसान परिवार अपने बाड़ी में साग, सब्जियों एवं फलों का उत्पादन कर सकेंगे।

इस कार्य को कृषि विकास एवं किसान कल्याण विभाग के साथ-साथ वन विभाग, पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग, जल संसाधन विभाग एवं लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग आदि के समन्वय से किया जा रहा है। आशा है इससे द्विफसलीय रकबा एवं उत्पादकता में वृद्धि के साथ-साथ किसानों की आय में बढ़ोतरी होगी।

मुख्यमंत्री श्री भूपेश बघेल ने इस परिकल्पना केे विभिन्न पहलुओं को अपने दीर्घ अनुभव की कसौटी पर सफलतापूर्वक परखा है। उनका मानना है ग्रामीण क्षेत्र के लोग पहले गांव के बाहर से केवल नमक लेते थे और शेष जरूरत की सभी चीजें गांव में ही पैदा कर लेते थे, लेकिन आज गांव के लोग रोजगार तथा सामग्री के लिए शहरों की ओर भाग रहे है। इसे बदलने की जरूरत है। मुख्यमंत्री श्री भूपेश बघेल का यह भी मानना है कि इस योजना से छत्तीसगढ़ के ग्रामीण क्षेत्रों में आमूल-चूल परिवर्तन होगा। उन्होंने राज्य के सभी ग्रामीणों, किसानों, जनप्रतिनिधियों, अधिकारियों-कर्मचारियों से आग्रह किया है कि वे इस योजना को सफल बनाकर ग्रामीण अर्थव्यवस्था की दृष्टि से छत्तीसगढ़ को देश का मॉडल राज्य बनाए।

क्रमांक: 3780/

( लेखक सहायक संचालक के रूप में जनसम्पर्क संचालनालय रायपुर में कार्यरत हैं)



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