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दिसंबर १९२७ के चार बलिदानी

स्वामी दयानंद सरस्वती जी ने जिस स्वाधीनता की प्राप्ति का उपदेश दिया और बलिदान के उस मार्ग पर स्वयं भी चलते हुए अनेक दारुण कष्ट सहे, उन स्वामी जी के उस उद्देश्य की पूर्ति के लिए आर्य समाज ने जो बलिदान दिए, वह सब के सब अपने आप में ही अभूतपूर्व बलिदानी परम्परा का एक भाग थे| कहा जाता है कि भारत कि स्वाधीनता के लिए बलिदानियों की यदि सूची बनाई जावे तो उसमें समाविष्ट नामों में ८५ प्रतिशत से भी अधिक नाम या तो आर्य समाजियों के होंगे या फिर उन लोगों के होंगे जिन्होंने आर्य समाज से प्रेरणा लेकर बलिदान का यह मार्ग चुना| इस प्रकार के बलिदानी आर्य युवकों में पंडित रामप्रसाद बिस्मिल, ठाकुर रोशन सिंह, अशफाक उल्ला खान और राजेन्द्र लाहिड़ी का नाम प्रमुख रूप से हमारे सामने आता है, जिन्होंने मातृभूमि के चरणों में दिसंबर १९२७ को अपने प्राण उत्सर्ग कर दिए| आओ हम इन बलिदानियों के जीवन के कुछ अंश जानने का प्रयास करें|

१.पंडित रामप्रसाद बिस्मिल
पंडित रामप्रसाद बिस्मिल जी का जन्म लगभग १९०० ईस्वी में ग्वालियर राज्य में हुआ| बाल्यकाल से ही आर्य समाज से जुड़कर आर्य समाज के साप्ताहिक सत्संगों में जाने लगे| आर्य समाज के महापुरुषों के प्रवचनों को सुनकर नियमित रूप से संध्या तथा यज्ञादि में भाग लेने लगे| स्वामी सोमदेव जी के प्रभाव से आर्य समाज के प्रति इस प्रकार का अनुराग पैदा हुआ कि आर्य समाज को ही अपना निवास बना लिया| स्वामी दयानंद जी के अमर ग्रन्थ सत्यार्थ प्रकाश के स्वाध्याय से स्वाधीनता के लिए संघर्ष करने की प्रेरणा मिली|

पंडित रामप्रसाद बिस्मिल जी में धूम्रपान करने आदि अनेक प्रकार के व्यसन उनके आरंभिक जीवन से ही आ गए थे| इन व्यसनों का वर्णन उन्होंने स्वयं अपनी आत्मकथा में भी खोलकर किया है, आर्य समाज के साथ जुड़ते ही इन व्यसनों को त्याग कर नियमित रूप से व्यायाम तथा संध्या आदि करने का व्रत लिया| जब क्रांतिकारी बलिदानी शचीन्द्र नाथ सान्याल ने“ हिन्दुस्तान प्रजातांत्रिक एसोसिएशन” स्थापित की तो स्वराज्य प्राप्ति की भावना से आपने भी अपना सक्रीय सहयोग इस संस्था को देना आरम्भ कर दिया| इस हेतु ही शस्त्र खरीदने के लिए धन की कमीं दूर करते हुए उत्तर प्रदेश के काकोरी के स्थान पर गाडी में ले जाया जा रहा अंग्रेज सरकार का खजाना आपने लूटा और पकडे जाने पर १९ दिसंबर १९२७ को हंसते हंसते फांसी पर झूल गए| आप में इतना आत्मबल था कि जेल में फांसी की कोठरी में रहते हुए अपनी आत्मकथा लिख डाली और इस आत्मकथा को बड़ी चतुराई से फांसी से मात्र तीन दिन पूर्व ही जेल से बाहर निकाल कर सिंध( वर्त्तमान पाकिस्तान) क्षेत्र में भेज दिया| सिंध में श्री भजन लाल जी ने इसे हिंदी तथा उर्दू दोनों भाषाओं में प्रकाशित किया| यह केवल हिंदी साहित्य का ही नहीं अपितु विश्व साहित्य का वह अनुपम एकमात्र ग्रंथ है, जो फांसी की कोठारी में लिखा गया, फांसी से केवल तीन दिन पूर्व इसका लेखन पूर्ण हुआ और उसी दिन बड़ी सावधानी से इसे जेल से बाहर भी भेज दिया गया और शीघ्र ही इसका प्रकाशन भी हो गया|

ठाकुर रोशन सिंह
ठाकुर रोशन सिंह जी भी उत्तर प्रदेश से ही थे और पंडित रामप्रसाद बिस्मिल जी के निकट ही अर्थात् शाहजहांपुर के निकटस्थ गाँव नवादा के निवासी थे| अत्यधिक धनवानˎ व्यक्ति भी स्वाधीनता के लिए अपना सब कुछ, यहाँ तक कि अपने प्राण भी त्याग सकता है, इसका पता तो आपके बलिदान से ही चलता है क्योंकि आपका सम्बन्ध अत्यधिक धनवानˎ परिवार से था| पंडित रामप्रसाद बिस्मिल के यह मित्र पंडित जी की ही भाँति शारीरिक रूप से अत्यधिक बलिष्ठ थे| आपने भी क्रांतिकारी गतिविधियों में भाग लेना आरम्भ किया और आपने भी पंडित रामप्रसाद बिस्मिल के साथ मिलकर काकोरी नामक स्थान पर अंग्रेज का धन लूटने के कार्य में विशेष भाग लिया| इस अपराध में ही आप भी १९ दिसंबर १९२७ को फांसी पर झूल गए| आप कहा करते थे :-

जिन्दगी जिन्दादिली का नाम है रोशन|
मुर्दा दिल भीक्या खाक जिया करते हैं||

इस के अतिरिक्त आप सब्मिलाकर यह गाया करते थे :-

मरते बिस्मिल रोशन लहरी अशफाक अत्याचार से|
होंगे पैदा सैंकड़ों उन के रुधिर की धार से ||

जब हम स्वामी सत्य प्रकाश जी की संन्यास दीक्षा के अवसर पर मई १९७१ को इलाहाबाद गए तो इनके बलिदान के स्थान को ढूँढते हुए, न मिलने पर अंत में हम लोग जब आर्य समाज के महानˎ दार्शनिक पंडित गंगा प्रसाद उपाध्याय जी के निवास पर गये तो उपाध्याय जी के सुपुत्र श्री विश्वनाथ जी से इस सम्बन्ध में भी चर्चा की| इस पर श्री पंडित विश्वनाथ जी ने बताया कि“ जहां पर आप लोग उनके बलिदान स्थान को ढूँढ़ते हुए घूम रहे थे, वही ही वह स्थान था, जहाँ पर ठाकुर रोशन सिंह को फांसी दी गई थी| ठाकुर जी के बेटे ने उन्हें आकर सूचना दी थी कि ठाकुर जी को फांसी दी जा चुकी है| अत: जब रोशनसिंह जी का अंतिम संस्कार करने के लिए पार्थिव शरीर की डोली को नगर यात्रा के लिए ले जाया जा रहा था तो उन्होंने इस डोली को कंधा दिया था|”

हमें यह जानकार अपार दु:ख हुआ कि जहां हम उनके बलिदान के स्थान को ढूँढ़ रहे थे, वह ही उनकी बलिदान स्थली था किन्तु अपार दु:ख कि इस सम्बन्ध में वहां कोई जानने अथवा बताने वाला कोई नहीं था और न ही इस सम्बन्ध में वहां कोई शिलालेख ही स्थापित किया गया था||

राजेन्द्र नाथ लहरी
बलिदानी वीर राजेन्द्र नाथ लहरी को राजेन्द्र लाहिड़ी जी के नाम से भी जाना जाता है| आपका जन्म उत्तर प्रदेश के पावना जिले के भड्न्गा गाँव में १९०१ को हुआ| १९०९ में आपका परिवार बनारस आ गया| अत: आपका शिक्षा का कार्य बनारस में ही हुआ| यहाँ पर जब आप हिन्दू विश्वविद्यालय में एम. ए. में अध्ययन कर रहे थे तो आप देश की स्वाधीनता के लिए क्रांतिकारी कार्यों में रूचि लेने लगे| आप भी काकोरी नामक स्थान पर जा रही रेल से अंग्रेज का खजाना लूटने के आरोप में पकडे गए और १७ दिसंबर १९२७ को गोंडा जेल में हंसते हंसते फांसी पर झूल गए|

अशफाक उल्ला खां
बलिदानी अशफाक उल्ला खां का निवास स्थान भी शाहजहाँपुर ही था| आप यहाँ के एक अच्छे धनी मुस्लिम परिवार से सबंध रखते थे| पंडित रामप्रसाद के अन्तरंग मित्र तथा उन के सच्चे भक्त होने के कारण आप भी देश को स्वाधीन कराने के लिए क्रांतीकारियों के लिए बने मार्ग पर आगे बढ़ गए| आप अभी विद्यार्थी ही थे जब आपका समबन्ध क्रांतिकारी लोगों से जुड़ गया| आप मुसलमानों के कार्य व्यवहार से सदा आहत रहते थे और कहा करते थे कि आप चाहे जितनी भी कोशिश कर लो, हिन्दुओं पर जितने चाहे अत्याचार कर लो किन्तु कभी भी सब के सब हिन्दू मुसलामान नहीं बन सकते| इसलिए हिदुओं को मुसलमान बनाने की भावना को छोड़कर सब समुदाय आपस में मिलजुल कर रहो|

आप भी बिस्मिल के परम मित्र होने के कारण उन्हीं के साथ काकोरी नामक स्थान पर जा रही रेल गाड़ी से अंग्रेज का खजाना लूटने वालों में से एक थे, अत: आपको १७ दिसंबर को फैजाबाद जेल में फांसी पर लटका दिया गया| आपने हंसते हंसते फांसी को प्राप्त किया|

मौत और जिन्दगी है दुनिया का सब तमाशा|
फरमान कृष्ण का था अर्जुन को बीच रण में||
बुजदिलों को ही सदा मौत से डरते देखा है|
गो कौन उन्हें रोज ही मरते देखा है||

वीरों और बलिदानियों की याद सदा प्रेरणा का स्रोत होती है| जब कोई जाति अपने बलिदानियों को भूल जाती है तो वह रसातल की और चली जाती है| भारत के स्वाधीन होने पर इसकी सत्ता कुछ इस प्रकार के लोगों को सौंपी गई जो बलिदानियों के इतिहास को छुपाने का ही प्रयास करते रहे, इस कारण आज क्रांतिकारी बलिदानी और देश की स्वाधीनता के लिए फांसी पर झूलने वाले वीरों का इतिहास हमारी आँखों से ओझल हो गया और हम पंगु से बन गए| आज हम देखते हैं कि भारत में स्वार्थी लोग अपने स्वार्थ के लिए पूरे देश को आन्दोलानों के नाम पर बंधक बना कर पंगु बनाने में लगे हैं, इसका नाश करने में लगे हैं| इस लिए आओ हम एक बार फिर सेअपने वीर बलिदानियों के जीवनों को याद कर फिर से प्रेरणा लेकर इस देश की स्वाधीनता को बचाए रखने के लिए कुछ करें|

डॉ. अशोक आर्य
पॉकेट १/ ६१ रामप्रस्थ ग्रीन से, ७ वैशाली
२०१०१२ गाजियाबाद उ. प्र. भारत
चलभाष ९३५४८४५४२६ e mail [email protected]

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