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प्राचीन काल से लेकर मुगल काल, भक्ति काल और आज तक की होली के रंग

अगर आप होली को पारंपरिक और शास्त्रीय तरीके से खेलेंगे तो होली का यह पर्व आपके जीवन को एक नई उर्जा, मस्ती और रोमांच प्रदान करने में सहायक हो सकता है। होली के अध्यात्मिक एवं धार्मिक महत्व को रेखांकित करता हुआ यह शोधपूर्ण आलेख आपके लिए निश्चित ही उपयोगी होगा।
1.गुलाल लगाने का महत्व
2.धूलिवंदन
3.रंगपंचमी
4.रंगपंचमी मनानेकी पद्धति व उसका आधारभूत शास्त्र
5.होली अर्थात् मदन का दहन
6.रंगों का महत्त्व
7.होली को विकृत होने से बचाएं
8.हमारे देश के प्रसिध्द होली उत्सव
9.दुनिया भर में मनाई जाती है होली
10.भारतीय साहित्य, संस्कृति और परंपरा में होली
11.होली को लेकर प्रचलित कथाएं
12.होली के अलग अलग मिजाज
13.होली की प्राचीन कथाएं
14.उर्दू साहित्य में होली
15.भक्ति काल के कवियों की होली
16.हि्न्दी फिल्मों के कुछ अमर होली गीत

गुलाल लगाने का महत्व
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आज्ञा चक्र पर गुलाल लगाना, शिव को शक्तित्त्व का योग देने का प्रतीक है। गुलाल के प्रभाव से देह सात्त्विक तरंगों को ग्रहण कर पाती है। आज्ञाचक्र से ग्रहण की गई शक्तिरूपी चैतन्यता संपूर्ण देह को तरंगित करती है।

होलीमें नारियल डालना
नारियल वायुमंडल के विकारों को नष्ट कर देता है। नारियलको होली की अग्नि में डालने वायुमंडलकी शुद्धि होती है ।

 

 

धूलिवंदन

होलीके दूसरे दिन अर्थात् धूलिवंदन के दिन अनेक स्थानों पर एक-दूसरे के शरीरपर गुलाल डालकर रंग खेला जाता है। होली के दिन प्रदीप्त हुई अग्नि से वायुमंडल के रज-तम कणों का विघटन होता है। इस दिन खेली जाने वाली रंगपंचमी, विजयोत्सवका अर्थात् रज-तम के विघटनके कारण अनिष्ट शक्तियों को नष्ट करने का (मारक कार्य का) प्रतीक है।
रंगपंचमी
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चैत्र कृष्ण पंचमीको खेली जानेवाली रंगपंचमी देवताके तारक (आशीर्वादरूपी) कार्यका प्रतीक है। इस दिन वायुमंडल में उड़ाए जानेवाले अलग-अलग रंगकणों की ओर विभिन्न देवातओं के तत्त्व आकर्षित होते है। मध्यप्रदेश के कई शहरों में खासकर उज्जैन इन्दौर संभाग में मालवा अंचल में रंग पंचमी के अवसर पर विभिन्न अखाड़ों की गैर (टोलियाँ) निकलती है और अखाड़ों में व्यायाम सीखने वाले युवा अपने करतबों का प्रदर्शन करते हैं।

 

रंगपंचमी मनाने की पद्धति व उसका आधारभूत शास्त्र

रंग उड़ाना
वायुमंडल में रंगों का गुबार उड़ाकर हम `देवताओं को इन रंगोंके माध्यमसे बुला रहे हैं’, ऐसा भाव रखकर हम देवताओं का स्वागत करते हैं। देवताके चरणोंमें नतमस्तक होना ही रंगपंचमी का उद्देश्य है ।

पौराणिक संदर्भ में होली की कथाएं
ढुण्ढा नामक राक्षसी गांव-गावमें घुसकर बालकोंको कष्ट देती थी । उन्हें रोग व व्याधिसे ग्रस्त करती थी। उसे गाँव से भगाने के लिए लोगोंने अनेक प्रयास किए; परंतु वे सफल नहीं हुए। अंत मे लोगों ने अपमानित किया और उसे गालियाँ देकर अपमानित किया और शाप दिए। इस पर वह प्रसन्न होकर गाँव से भाग गई। (भविष्य पुराण)
उत्तर भारतमें ढुण्ढा राक्षसी की बजाय होली की रात पूतना को जलाया जाता है। होली के पूर्व तीन दिन भगवान कृष्ण के बाल रूप को पालने में सुलाकर उसका उत्सव मनाते हैं। चैत्र पूर्णिमा पर पूतना का दहन करते हैं।

होली अर्थात् मदन का दहन
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दक्षिणके लोग कामदेव से विजय के प्रतीक के रूप में यह उत्सव मनाते हैं। भगवान शंकर तपाचरण में मग्न थे। वे समाधिस्थ थे। उस समय मदन ने उनके अंत:करणमें प्रवेश किया। उन्हें कौन चंचल कर रहा है, यह देखने हेतु शंकरने नेत्र खोले और मदन को देखते क्षण ही भस्मसात कर दिया। होली अर्थात मदन का दहन। मदन पर विजय प्राप्त करने की क्षमता होलीमें है; इसी भाव को लेकर होली का उत्सव मनाया जाता है।

होली पर गालियाँ देने का कारण
होली के त्यौहार पर एवं इसके अगले दिन लोग प्रायः गंदी गालियां देते हैं। यह एक तरह से मनुष्य की विकृतियों का रेचन है। इस तरह से व्यक्ति के अंदर दबी कुंठा और पूर्वाग्रह नष्ट हो जाते हैं, यह एक तरह से मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया है। शब्दों का मन पर जो एक प्रकार का अशिष्ट तनाव होता है, उसके निकलने से मन स्वच्छ हो जाता है। जैसे गंदे/मैले पानीको मार्ग देकर निकाल देते हैं उसी प्रकार मनुष्य में विद्यमान पशु प्रवृत्ति को धर्मशास्त्रों ने होली के माध्यम से रेचन करने की छूट दी है।

रंगपंचमी का महत्व
होली में `होलिका’ नामक एक राक्षसी का नाश हुआ था। होलिका भक्त प्रह्लादकी बुआ थी। उसने तपकर अग्निसे संरक्षण की सिद्धि प्राप्त की थी। भक्त प्रह्लाद की भक्ति के सामने होलिका की सिद्धि असफल हो गई और वह जल गई; परंतु भक्त प्रह्लादका बाल भी बांका नहीं हुआ। होलिका हिरण्यकश्यप की बहन थी, इसलिए उसमें सामर्थ्य अधिक था; उसे नष्ट होनेमें ५ दिन लगे। पूर्णिमासे लेकर चतुर्थी तक, यानी ५ दिन तक उसका शरीर अग्नि में जलता रहा। छठे दिन प्रह्लाद के बच जाने पर लोगों ने आनंदोत्सव मनाया। होलिका के जल जाने के कारण सर्वत्र राख यानी काला रंग तथा उसके कारण दु:ख व उदासीनता फैल गई। उसे नष्ट करने हेतु विभिन्न रंगोंसे सजी तथा रंगों के माध्यमसे अनुभूति प्रदान करनेवाली `रंगपंचमी’ का त्यौहार मनाया जाता है ।

रंगों का महत्त्व
रंगपंचमी के दिन रंगोंका विशेष महत्त्व होता है। उस दिन जहाँ तक संभव हो, नैसर्गिक रंगों का ही उपयोग करना चाहिए। अन्य दिनों की तुलना में रंगपंचमी के दिन रंगोंके माध्यम से ५ प्रतिशत अधिक सात्त्विकता प्रक्षेपित होती है। इस कारण रंगोंसे खेलते समय तथा रंग लगाने पर जीवकी सात्त्विकता भी बढ़ती है।

होली को विकृत होने से बचाएं
`नियताह्लादजनकव्यापार: – निश्चित रूप से आह्लाद उत्पन्न करने वाला उद्योग ही उत्सव कहलाता है ।’ (शब्दकल्पद्रुम) । किसी धार्मिक समारोह में, उसे आयोजित करने वाले व उसमें सहभागी होने वाले लोगों को यदि हर्ष, आनंद व मन:शांति का अनुभव होता है, उसे उत्सव कहते हैं।’ परंतु आजकल उत्सवों का स्वरूप घिनौना होता जा रहा है। होली के बारे में ही देखें, तो आजकल – जबरन चंदा वसूल करना, राह चलते लोगों और वाहन चालकों को रोककर पैसे ऐंठना, ज़बरदस्ती रंग लगाना, गुलाल का अत्यधिक उपयोग होलिका के निकट शराब अथवा भांग पीकर अश्लील नृत्य करना एक-दूसरे पर कीचड़ फेंकना, एक-दूसरे को गंदे पदार्थ अथवा डामर लगाना पानी के गुब्बारे मारना लड़कियों के साथ छेड़छाड़ तथा उनसे असभ्य व्यवहार करना, देवी- देवताओ के मुखौटे धारण कर पैसे मांगना पानी का अपव्यय करना जैसी घटनाएं आम हो गई है। ऐसी घटनाओं से धर्म का मूल संदेश ही नष्ट हो जाता है। इन अनाचारों को चुपचाप देखना या सहना भी एक तरह से धार्मिक अनादरण की श्रेणी में आता है। धार्मिक त्यौहारों की पवित्रता कायम रहे, त्यौहार मनाते समय उसमें अश्लील अथवा घिनौने व्यवहार न हों, सबको आनंद मिले, हिन्दुओ के त्योहारों के प्रति गर्व लगे, इसके लिए प्रयत्न करना धर्मसेवा ही है। जो धर्म का रक्षण करता है, उसका रक्षण धर्म (ईश्वर) करता है। इसके लिए देश और दुनिया भर में फैले हिन्दु समाजको संगठित रूप से प्रयास करने होंगे। समस्त सनातनी हिन्दुओं को चाहिए कि वे अपने पर्वों और त्यौहारों के धार्मिक, वैज्ञानिक, सांस्कृतिक और प्राकृतिक महत्व को समझें और उसी के अनुरूप इन त्यौहारों को मनाएं ताकि इनके माध्यम से हमारी संस्कृति विकृति में नहीं बदल सके।

हमारे देश के प्रसिध्द होली उत्सव
भारत में बरसाने की लट्ठमार, फूलों की व लड्डूमार होली, तो रोहतक की पत्थर मार होली व पंजाब की होला महल्ला होली का अपना खास महत्व है। जब नंदगाँव के गोप गोपियोंपर रंग डालते, तो नंदगांवकी गोपियां उन्हें ऐसा करनेसे रोकती थीं और न माननेपर लाठी मारना शुरू करती थीं। पंजाबमें गुरु गोबिंद सिंह ने होली को एक क्रांतिकारी स्वरूप देते हुए होली का पुल्लिंग होला शब्द का प्रयोग किया व ऐसे होली होला महल्ला (शस्त्र प्रदर्शन) के रूपमें मनाई जाने लगी। ऐसे तो रंगों का यह पर्व कहीं-कहीं मंदिरों मे बसंत पंचमी से ही शुरू हो जाता है वाराणसी में इसकी शुरूआत रंगभरी एकादशी से होती है। आपका ब्राउज़र इस छवि के प्रदर्शन का समर्थन नहीं भी कर सकता.

दुनिया भर में मनाई जाती है होली
हर्ष, उल्लास व रंगोंका यह पर्व केवल भारत मे ही नहीं बल्कि पूरे विश्व में मनाया जाता है। चीन में इसे `च्वैजे’ कहते है, जिसमें लकड़ियोंका ढेर लगाकर जलाते हैं व एक-दूसरे को रंग लगाते हैं। यूनान में यह उत्सव `पोल’ के नामसे मनाया जाता है जिसमें लकड़ियों का ढेर लगाकर उसे जलाते हैं व लोग अपने देवता टायनोसियम की पूजा करते हैं।
अंग्रेजी में जानकारी के लिए इस साईट पर जाएं ।

भारतीय साहित्य, संस्कृति और परंपरा में होली
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संस्कृत शब्द होलक्का से होली शब्द का जन्म हुआ है। वैदिक युग में (होलक्का) को ऐसा अन्न माना जाता था, जो देवों का मुख्य रूप से खाद्य-पदार्थ था। बंगाल मे होली को डोल यात्रा या झूलन पर्व, दक्षिण भारत में कामथनम, मध्यप्रदेश के छत्तीसगढ़् में ’गोल बढ़ेदो’ नाम से उत्सव मनाया जाता है और उत्तरांचल में लोक संगीत व शास्त्रीय संगीत की प्रधानता है। ‘प्रियदर्शिका’, ‘रत्नावली’, ‘कुमार सम्भव’ सभी में रंग का वर्णन आया है। कालिदास रचित ‘ऋतुसंहार’ में पूरा एक सर्ग ही ‘वसन्तोत्सव’ को अर्पित है। ‘भारवि’, ‘माघ’ जैसे संस्कृत कवियों ने भी वसन्त और होली पर्व का उल्लेख अपनी रचनाओं में किया है। ‘पृथ्वीराज रासो’ में होली का वर्णन है। महाकवि सूरदास ने वसन्त एवं होली पर 78 पद लिखे हैं। पद्माकर ने भी होली को लेकर कई मस्ती भरे पद लिखे हैं जिनमें प्रकृति और धरती माता के होली खेलने के भावों को प्रकट किया गया है।

 

होली को लेकर प्रचलित कथाएं
होली को लेकर हिरण्यकश्यप और उसकी बहन होलिका की कथा सबसे ज्यादा प्रचलित है। प्राचीन काल में अत्याचारी राक्षसराज हिरण्यकश्यप नामका एक अत्याचारी राजा था। उसे यह वरदान मिला था कि वह आकाश-पाताल, सुबह-शाम, मनुष्य-जानवर कहीं भी किसी से भी नहीं मारा जा सकेगा। खुद को वह तीनों लोकों का स्वामी समझता था।
उसका एक पुत्र प्रह्लाद, भगवान विष्णु का परम भक्त था और उस पर भगवान विष्णु की कृपा-दृष्टि थी। हिरण्यकश्यप को यह बात कतई पसंद नहीं थी कि कोई उसके ही घर में रहकर उसकी बजाय किसी दूसरे की पूजा करे। उसने अपने पुत्र प्रह्लाद को कई बार डराया-धमकाया लेकिन इसके बावजूद प्रह्लाद पर इसका कोई असर नहीं हुआ। उसने प्रह्लाद को मार डालने की योजना बनायी। उसे पहाड़ से गिराया गया और तरह-तरह के अत्याचार किए गए। लेकिन प्रह्लाद हर बार भगवान की कृपा से बचा गया। फिर उसने अपनी बहन होलिका की सहायता ली। उसे (होलिका) एक ऐसी चादर वरदान में मिली थी जो आग में नहीं जल सकती थी। अग्नि की तेज लपटों के बीचों-बीच होलिका को चादर ओढ़ा कर प्रह्लाद को गोद में बैठा दिया। लेकिन आश्चर्य, होलिका ही जल गई प्रभु विष्णु की कृपा से प्रह्लाद सही-सलामत बाहर आ गया। आज भी हम बुराई पर अच्छाई के जीत के रूप मे होलिकादहन करते हैं। उसके अगले दिन होली मनाई जाती है। हिरण्यकश्यप को मारने के लिए नरंसिंह अवतार में भगवान विष्णु ने खंभे से निकल कर गोधूली वेला (सुबह और शाम के समय का संधि काल) में दरवाजे की चौखट पर बैठकर अत्याचारी हिरण्यकश्यप को मार डाला और लोगों को अत्याचार से मुक्त किया। फिर प्रह्लाद को राजा बना दिया गया।

होली के अलग अलग मिजाज
भारत का सबसे प्राचीन और सर्वाधिक लोकप्रिय त्यौहार है होली। बसंत ऋतु में मनाया जाने वाला वसंतोत्सव जहाँ कवि, साहित्यकारों और उच्च वर्ग का पर्व माना जाता है, वहीं होलिकोत्सव आम लोगों का उत्सव है, जिसे वे बड़े दिल से, उमंग से, उल्लास से मनाते हैं। होली के अगले दिन धुलेंडी को पानी में रंग मिलाकर होली खेली जाती है तो रंगपंचमी को सूखा रंग डालने की परंपरा रही है। पुराने समय में धुलेंडी के दिन टेसू के फूलों का रंग और रंगपंचमी को गुलाल डाला जाता था।

ब्रज में तो बरसाना और नंदगाँव की होली पूरे भारत में प्रसिद्ध है, जहाँ लठमार होली खेली जाती है। पुरुष, महिलाओं पर रंग फेंकते हैं तो बदले में उन्हें डंडे मिलते हैं। यह डंडों की मार भी पुरुष हँसते-हँसते झेलते हैं तथा जिन्हें डंडे नसीब नहीं होते वे अपने आपको महादुर्भाग्यशाली समझते हैं।
रंगो के पर्व होली की धूम श्रीकृष्ण और राधा के अलौकिक प्रेम के प्रतीक रूप में मथुरा और रासलीला स्थली वृन्दावन के अलावा नंदगाँव, बरसाना, गोकुल, लोहबन और बलदेव जैसे गाँव में भी होली एक सप्ताह पहले से शुरू हो जाती है। बृज की लठ्ठमार होली का तो अपना एक अलग रंग है। उनके संग खेलनेवाली राधारानी का जन्मस्थली नंदगाँव से बरसाने की दूरी बमुश्किल तीन से चार किलोमीटर है। इन दिनों नंदगाँव के गोप राधारानी के गाँव बरसाने के गोपियों से और बरसाने के लोग नंदगाँव में होली खेलने जाते हैं। इन पुरुषों को ’होरियारे’ कहा जाता है। रंग-बिरंगी लहँगा-चुन्नी पहने स्त्रियाँ, हाथों मे मोटे-लंबे लट्ठ थामे हुए फागुनी रंग मे रंगे हुए छैला के मन को मर्यादित करने के लिए तैयार रहती है। फिर भी निडर ब्रजवासी उनके साथ होली की मीठी मीठी छेड़छाड़ करन से बाज नहीं आते। इनकी इस छेड़छाड़ का जवाब का जवाब भाभियाँ लाठियों के प्रहार (स्वागत सत्कार) से देती है। जिससे रसिक मिजाज देवर इधर उधर भागने लगते हैं। इस लाठी की मार से बचने के लिए सिर पर एक खास तरह की पगड़ी बाँधे हाथ में ढाल लिए तैयार होकर आते हैं। ढाल से भाभी से मिले लाठी के तीव्र प्रहार से तो खुद को तो बचाने की कोशिश करते हैं मगर भाभी की लज्जाभरी मधुर मुस्कान के आगे नतमस्तक हो जाते है। महानायक श्रीकृष्ण की क्रीड़ास्थली ब्रजभूमि के गाँव की गलियों में होली से पहले ही सफाई कर, मिट्टी बिछा दी जाती है। श्रीकृष्ण के नंदगाँव और राधा के बरसाने के बीच फैले स्नेह भाव के स्मृतियों को अमिट रखने के प्रयास (लठमार होली) हमारी प्राचीन संस्कृति का एक महत्वूर्ण हिस्सा है।
माघ पूर्णिमा से ही ब्रज का पूरा अंचल शीत ऋतु के बाद फागुनी रंग में रंगने लगते हैं। ब्रजवासियों में मौसम की मस्ती का यह नशा चालीस दिन तक छाया रहता है और रंगपंचमी (फागुन कृष्णपंचमी) को रंगों की फुहारों के साथ ही उतरता है। है। ब्रजभूमि के अलावा देश भर मे फैले ब्रज परंपरा के राधा-कृष्ण मंदिरों मे वसंत पंचमी से ही गुलाल चढ़ने लगता है। इसके साथ-साथ रसिया गायन भी शुरू हो जाता है, जवान से लेकर अधेड़ ही नहीं बूढ़े भी इसकी रसीली धुन से नहीं बच पाते। रसिया गायन में भक्ति और अध्यात्म की चर्चा होती है लेकिन मूलतः श्रृंगार रस की ही प्रधानता होती है। होली के दिन तो नंदगाँव संगीत की सुमधुर स्वर लहरियों से भींगने लगता है।

होली की प्राचीन कथाएं
एक कहानी यह भी है कि कंस के निर्देश पर जब राक्षसी पुतना श्रीकृष्ण को मारने के लिए उनको विषपूर्ण दुग्धपान कराना शुरू किया लेकिन श्रीकृष्ण ने दूध पीते-पीते उसे ही मार डाला। कहते हैं, उसका शरीर भी लुप्त हो गया तो गाँव वालों ने पुतना का पुतला बना कर दहन किया और खुशियाँ मनायी। तभी से मथुरा मे होली मनाने की परंपरा है।
एक अन्य मुख्य धारणा है कि हिमालय पुत्री पार्वती भगवान शंकर से विवाह करना चाहती थी। चूँकि शंकर जी तपस्या में लीन थे इसलिए कामदेव पार्वती की मदद के लिए आए। कामदेव ने अपना प्रेमवाण चलाया जिससे भगवान शिव की तपस्या भंग हो गई। शिवशंकर ने क्रोध में आकर अपनी तीसरा नेत्र खोल दिया। जिससे भगवान शिव की क्रोधाग्नि में जलकर कामदेव भस्म हो गए। फिर शंकर जी की नज़र पार्वतीजी पर गई। शिवजी ने पार्वती जी को अपनी पत्नी बना लिया और शिव जी को पति के रूप में पाने की पार्वती जी की अराधना सफल हो गई। होली के अग्नि में वासनात्मक आकर्षण को प्रतीकात्मक रूप से जलाकर सच्चे प्रेम के विजय के रूप में यह त्यौहार विजयोत्सव के रूप मे मनाया जाता है।
मनुस्मृति में इसी दिन मनु के जन्म का उल्लेख है। कहा जाता है मनु ही इस पृथ्वी पर आने वाले सर्वप्रथम मानव थे।
इसी दिन नर-नारायणके जन्म का भी वर्णन है जिन्हें भगवान विष्णु का चौथा अवतार माना जाता है।
सतयुग में भविष्योतरापूरन नगर में छोटे से लेकर बड़ों को सर्दी-जुकाम जैसी बीमारियाँ लग गई। वहाँ के लोग द्युँधा नाम की राक्षसी का प्रभाव मान रहे थे। इससे रक्षा के लिए वे लोग आग के पास रहते थे। सामान्यतौर पर मौसम परिवर्तन के समय लोगों को इस तरह की बीमारीयाँ हो जाती हैं, जिसमे अग्नि राहत पहुँचाती है। ‘शामी’ का पेड़ जिसे अग्नि-शक्ति का प्रतीक माना गया था, उसे जलाया गया और अगले दिन सत्ययुगीन राजा रघु ने होली मनायी।
इस तरह देखते हैं कि होली विभिन्न युगों में तरह-तरह से और अनेक नामों से मनायी गयी और आज भी मनाई जा रही है। इस तरह कह सकते हैं कि असत्य पर सत्य की या बुराई पर अच्छाई पर जीत की खुशी के रूप मे होली मनायी जाती है। इसके रंगो मे रंग कर हम तमाम खुशियों को आत्मसात कर लेते हैं।

उर्दू साहित्य में होली
मुगल काल में रचे गए उर्दू साहित्य में फायज देहलवी, हातिम, मीर, कुली कुतुबशाह, महज़ूर, बहादुरशाह ज़फर, नज़ीर, आतिश, ख्वाजा हैदर अली ‘आतिश’, इंशा और तांबा जैसे कई नामी शायरों ने होली की मस्ती और राधा कृष्ण के निश्छल प्यार को अपनी शायरी में बहुत खूबसूरती से पिरोया है। उर्दू के जाने माने शायर नजीर अकबराबादी पर उर्दू अदब के भारत की संस्कृति और परंपराओ का ज़बर्दस्त असर था। 150 साल पहले लिखी गई उनकी रचनाएं नजीर की बानी के नाम से प्रसिध्द है उन्होंने जिस मस्ती के साथ होली का वर्णन किया है उसको पढ़कर ही उस दौर में खेली जाने वाली होली की मस्ती की महक मदमस्त कर देती है। पेश है नजीर की कुछ बानियाँ…
होली की मस्ती में नजीर खुद भी कितने मसरुफ हो जाते थे इसकी बानगी देखिए
1
मुँह लाल गुलाबी आँखें हों
और हाथों में पिचकारी हो
उस रंग भरी पिचकारी को
अँगिया पर तककर मारी हो
सीनों से रंग ढलकते हों
तब देख बहारें होली की

परियों के रंग दमकते हों
खूं शीशे जाम छलकते हों
महबूब नशे में छकते हों
जब फागुन रंग झमकते हों
तब देख बहारें होली की

2
सबमें मची होली अब तुम भी ये चरचा लो
रखवाओ अबीर ऐ जां और मय को भी मंगवा लो
हम हाथ में लोटा लें तुम हाथ में लुटिया लो
हम तुमको भिगो डालें तुम हमको भिगो डालो
होली में यहीं धूमें लगती हैं बहुत भलियां
इस दम तो मियाँ हम तुम इस ऐश की ठहरावें
फ़िर रंग से हाथों से पिचकारियाँ चमकावें
कपड़ों को भिगो डालें फिर ढंग कई लावें
भीगे हुए कपड़ों से आपस में लिपट जावें
होली में यही धूमें लगती हैं बहुत भलियाँ
3
तुम रंग इधर लाओ और हम भी उधर आवें
कर ऐश की तय्यारी धुन होली की बर लावें
और रंग के छीटों की आपस में जो ठहरावें
जब खेल चुकें होली फिर सीनों से लग जावें
4
जब खेली होली नंद ललन हँस हँस नंदगाँव बसैयन में।
नर नारी को आनन्द हुए ख़ुशवक्ती छोरी छैयन में।।
कुछ भीड़ हुई उन गलियों में कुछ लोग ठठ्ठ अटैयन में ।
खुशहाली झमकी चार तरफ कुछ घर-घर कुछ चौप्ययन में।।
डफ बाजे, राग और रंग हुए, होली खेलन की झमकन में।
गुलशोर गुलाल और रंग पड़े हुई धूम कदम की छैयन में।
5
जब ठहरी लपधप होरी की और चलने लगी पिचकारी भी।
कुछ सुर्खी रंग गुलालों की, कुछ केसर की जरकारी भी।।
होरी खेलें हँस हँस मनमोहन और उनसे राधा प्यारी भी।
यह भीगी सर से पाँव तलक और भीगे किशन मुरारी भी।।
डफ बाजे, राग और रंग हुए, होली खेलन की झमकन में।
गुलशोर गुलाल और रंग पड़े हुई धूम कदम की छैयन में।।

6
अगर आज भी बोली ठोली न होगी, तो होली ठिकाने की न होगी।
बडी गालियाँ देगा फागुन का मौसम, अगर आज ठट्ठा ठिठोली न होगी,
है होली का दिन दोपहर तक, किसी की ठिकाने की बोली न होगी,
उसी जेब में होगी फितने की पुडिया, जरा फिर टटोलो टटोली न होगी।

औरंगजेब जैसे कट्टरपंथी मुस्लिम शासक के काल में भी दिल्ली के उस दौर के जाने माने शायर फायज देहलवी दिल्ली की होली को कुछ इस तरह बयाँ किया है

ले अबीर और अरगजा भरकर रुमाल
छिड़कते हैं और उड़ाते हैं गुलाल
ज्यूं झड़ी हर सू है पिचकारी की धार
दौड़ती हैं नारियाँ बिजली की सार

शायर मीर की ने होली के नाम पर नज़्मों की पूरी एक किताब ही लिखी है ‘साकी नाम होली’, इसकी इन पंक्तियों में होली की मस्ती का एहसार किया जा सकता है।
आओ साकी, शराब नोश करें
शोर-सा है, जहाँ में गोश करें
आओ साकी बहार फिर आई
होली में कितनी शादियाँ लाई

लखनऊ के नवाब आसफुद्दौला के समय शायर मीर लखनऊ में ही रह रहे थे। लखनऊ में आसफुद्दौला के दरबार में खेली जाने वाली होली का वर्णन उन्होंने कुछ इस तरह किया है।
होली खेला आसफुद्दौला वजीर।
रंग सोहबत से अजब हैं खुर्दोपीर।
अमीर खुसरो ने होली को अपने सूफी अंदाज़ में कुछ ऐसे देखा है
दैय्या रे मोहे भिजोया री, शाह निजाम के रंग में
कपड़े रंग के कुछ न होत है, या रंग में तन को डुबोया री।
अंतिम मुगल बादशाह बहादुर शाह जफर के शब्दों में होली की मस्ती का रंग कुछ इस तरह दिखाई देता है
क्यों मो पे रंग की मारी पिचकारी
देखो कुँवरजी दूँगी मैं गारी…
एक शायर ने होली को कुछ इस तरह परिभाषित किया है।
खाके- शहीदे-नाज से भी होली खेलिए
रंग इसमें है गुलाब का बू है अबीर की।
भक्ति काल के कवियों की होली
भक्ति काल के महाकवि पद्माकर ने कृष्ण और राधा की होली की मस्ती को कुछ यों बयान करते हैं
फाग की मीर अमीरनि ज्यों, गहि गोविंद लै गई भीतर गोरी,
माय करी मन की पद्माकर, ऊपर नाय अबीर की झोरी।
छीन पितंबर कम्मर ते, सुबिदा दई मीड कपोलन रोरी,
नैन नचाय मुस्काय कहें, लला फिर अइयो खेलन होरी।
भारतेंदुजी भी तो फगुनिया जाते हैं और फिर गाते भी हैं-
गले मुझको लगा लो ऐ मेरे दिलदार होली में,
बुझे दिल की लगी मेरी भी ए यार होली में।

 

भक्तिकाल के एक और महाकवि घनानंद ने होली की मस्ती को अपने शब्दों में कुछ यों पिरोया है
प्रिय देह अछेह भरी दुति देह, दियै तरुनाई के तेह तुली।
अति ही गति धीर समीर लगै, मृदु हेमलता जिमि जाति डुली।
घनानंद खेल उलैल दतै, बिल सैं, खुल सैं लट भूमि झुली।
सुढि सुंदर भाल पै मौंहनि बीच, गुलाल की कैसी खुली टिकुली।

हि्न्दी फिल्मों के कुछ अमर होली गीत
शोले ( 1975)
होली के दिल दिल मिल जाते है , रंगों में रंग मिल जाते है
होली के दिन दिल खिल जाते है, रंगों में रंग मिल जाते हैं
गिले शिकवे भूल कर दोस्तो दुश्मन भी गले मिल जाते हैं!
गोरी तेरे रंग जैसा थोडा सा मै रंग मिला लूँ
आ तेरे गुलाबी गालों से थोडा सा गुलाब चुरा लूँ
जा रे जा दिवाने तू होली के बहाने तू छेड न मुझे बेशरम
पूछ ले जमाने से ऐसे ही बहाने से लिए और दिए दिल जाते है

होली के दिन दिल खिल जाते है, रंगों में रंग मिल जाते हैं
सिलसिला ( 1981 )
रंग बरसे भीगे चुनर वाली , रंग बरसे ,
रंग बरसे भीगे चुनरवाली, रंग बरसे
अरे कैने मारी पिचकारी तोरी भिगी अंगिया
ओ रंगरसिया रंगरसिया हो
रंग बरसे भीगे चुनरवाली रंग बरसे…
सोने की थाली में जोना परोसा
अरे, सोने की थाली में जोना परोसा
हॉं, सोने की थाली में जोना परोसा
अरे खाए गोरी का यार, बलम तरसे रंग बरसे
रंग बरसे भीगे चुनरवाली, रंग बरसे

फिल्म बागबान ( 2003 )
होली खेले रघुबीरा , अवध में होली खेले रघुबीरा
ताल से ताल मिले मोरे बबुआ बाजे ढोल मृदंग
मन से मन का मेल जो हो तो रंग से मिल जाये रंग
ओ होरी खेले रघुवीरा…
होरी खेले रघुवीरा अवध में, होरी खेले रघुवीरा
हा हिलमिल आवे लोग लुगाई
भाई महलन में भीरा अवध में…
तनीक शरम नही आए देखे नही अपनी उमरिया
साठ बरसमें इश्क लढाये, मुखडे को रंग लगाये
बडा रंगिला साँवरिया
चुनरीमें डाले अबिरा
होरी खेले रघुवीरा अवध में, होरी खेले रघुवीरा

फिल्म मदर इंडिया ( 1957)
होली आयी रे कन्हाई, होली आयी रे
होली आयी रे कन्हाई
रंग छलके सुना दे जरा बाँसरी
होली आयी रे, आयी रे, होली आयी रे
बरसे गुलाल रंग मोरे आंगनवा
अपने ही रंग में मोहे रंग दे सजनवा
हो देखो नाचे मोरा मनवा
बरसे गुलाल रंग मोरे अंगनवा, जी मोरे अंगनवा
अपने ही रंग में रंग दे मोहे सजनवा
तोर कारन घरसे आई, तोरे कारन हो
तोरे कारन घरसे आई
हूँ निकलके सुना दे जरा बांसरी
होली आयी रे…

फिल्मः कोहिनूर (1960)
तन रंग लो जी अजी मन रंग लो तन रंग लो
तन रंग लो जी अजी मन रंग लो तन रंग लो
खेलो खेलो उमंग भरे रंग प्यार के ले लो
खेलो खेलो उमंग भरे रंग प्यार के ले लो
रंग लो रंग लो जी अजी मन रंग लो तन रंग लो
तन रंग लो जी अजी मन रंग लो तन रंग लो
आ आ आ आ
आज नगरी में रंग है बहार है
गली गली में तो रस की फुहार है
गली गली में तो रस की फुहार है
पिचकरियों में रंग भरा प्यार है
पिचकरियों में रंग भरा प्यार है
इस रंग में जीवन रंग लो
हो तन रंग लो मन रंग लो
रंग लो जी अजी मन रंग लो तन रंग लो …
नाचो नाचो री सखी रे होली आई रे
घर घर में रंगीली रुत छाई रे
घर घर में रंगीली रुत छाई रे
आज दुनिया ने मस्ती लुटाई रे
आशाओं का दामन रंग लो
हो तन रंग लो मन रंग लो
रंग लो जी अजी मन रंग लो तन रंग लो …
आज मुखड़े से घूँघटा हटालो जी
हो ज़रा सजना से अँखियाँ मिला लो जी
हो ज़रा सजना से अँखियाँ मिला लो जी
रंग झूठे मोरे तन पे न दालो जी
रंग झूठे मोरे तन पे न दालो जी
मन प्यार में साजन रंग लो
हो तन रंग लो मन रंग लो
रंग लो जी अजी मन रंग लो तन रंग लो …
राधा संग होली खेले बनवारी रे हो….
राधा संग होली खेले बनवारी रे हो….
अंग अंग पे चलाए पिचकारी हो….
अंग अंग पे चलाए पिचकारी हो….
कहे बैंया पकड़के अनारी
दिल रंग लो जी धड़कन रंग लो
हो तन रंग लो मन रंग लो
रंग लो जी अजी मन रंग लो तन रंग लो …
भक्ति काल के कवि ईसुरी ने बृज की होली का वर्णन कुछ इस तरह किया है
ब्रज में खेले फाग कन्हाई, राधे संग सुहाई
चलत अबीर रंग केसर को, नभ अरूनाई छाई
लाल लाल ब्रज लाल लाल बन, वोथिन कीच मचाई।
ईसुर नर नारिन के मन में, अति आनंद अधिकाई।
होली के अवसर पर लोग नशा करने के लिए भांग-धतुरा खाते हैं। ब्रज में भी लोग भांग-धतूरा खाकर होली खेल रहे हैं। ईसुरी की चंद पंक्तियाँ
भींजे फिर राधिका रंग में, मनमोहन के संग में
दब की धूमर धाम मचा दई, मजा उड़ावत मग में
कोऊ माजूम धतूरे फांके, कोऊ छका दई भंग में
तन कपड़ा गए उधर, ईसुरी, करो ढाँक सब ढंग में।
…..तो फिर राधिका क्या कहती है….
खेलूंगी कभी न होली, उससे नहीं जो हमजोली।
यहाँ आँख कहीं कुछ बोली, यह हुई श्‍याम की तोली
ऐसी भी रही ठिठोली।
कवि पद्माकर की भी एक बानगी पेश है :-
फाग की भीढ़ में गोरी
गोविंद को भीतर ले गई
कृष्ण पर अबीर की झोली औंधी कर दी
पिताम्बर छिन लिया, गालों पर गुलाल मल दी।
और नयनों से हंसते हुए बाली-
लला फिर आइयो खेलन होली।

होली की मस्ती सूरदास की कलम से
1
नन्द नन्दन वृषभान किशोरी राधा मोहन खेलत होरी।
श्री वृन्दावन अति ही उजागर वरन-वरन नवदम्पति भोरी।
श्यामा उतय एकल ब्रज वनिता इतै श्याम रस रुप लखौरी।
कंचन की पिचकारी छूटत छिरकत ज्यौ सचु पावै गोरी।
झुंडन जोरि रहि चन्द्रावली गोकुल में कुछ खेल मचौरी।
“सूरदास” प्रभु फगवा दीजै चिरजीवौ राधा बरजोरी।
2
ब्रज में होरी मचाई, इतते आई सुघर राधिका
उतते कुंवर कन्हाई, हिल मिल फाग परस्पर खेले
शोभा बरनिन जाई, उड़त अबीर गुलाल कुमकुम
ब्रज में होरी मचाई रह्यो सकल ब्रज छाई।
3
हरि संग खेलति हैं सब फाग।
इहिं मिस करति प्रगट गोपी: उर अंतर को अनुराग।।
सारी पहिरी सुरंग, कसि कंचुकी, काजर दे दे नैन।
बनि बनि निकसी निकसी भई ठाढी, सुनि माधो के बैन।।
डफ, बांसुरी, रुंज अरु महुआरि, बाजत ताल मृदंग।
अति आनन्द मनोहर बानि गावत उठति तरंग।।
एक कोध गोविन्द ग्वाल सब, एक कोध ब्रज नारि।
छांडि सकुच सब देतिं परस्पर, अपनी भाई गारि।।
मिली दस पांच अली चली कृष्नहिं, गहि लावतिं अचकाई।
भरि अरगजा अबीर कनक घट, देतिं सीस तैं नाईं।।
छिरकतिं सखि कुमकुम केसरि, भुरकतिं बंदन धूरि।
सोभित हैं तनु सांझ समै घन, आये हैं मनु पूरि।।
दसहूं दिसा भयो परिपूरन, सूर सुरंग प्रमोद।
सुर बिमान कौतुहल भूले, निरखत स्याम बिनोद

मीराबाई भी अपने आपको कृष्ण के साथ होली खेलने से नहीं रोक पाई….
रंग भरी राग भरी रागसूं भरी री।
होली खेल्यां स्याम संग रंग सूं भरी, री।।
उडत गुलाल लाल बादला रो रंग लाल।
पिचकाँ उडावां रंग रंग री झरी, री।।
चोवा चन्दण अरगजा म्हा, केसर णो गागर भरी री।
मीरां दासी गिरधर नागर, चेरी चरण धरी री।।

महाकवि तुलसी द्वारा गीतावली में रचित होली के पद

खेलत बसंत राजाधिराज। देखत नभ कौतुक सुर समाज।।
सोहैं सखा अनुज रघुनाथ साथ। झोलन्हि अबीर पिचकारि हाथ।।
बाजहिं मृदंग डफ ताल बेनु। छिरकै सुगंध-भरे-मलय रेनु।।
उत जुवति जूथ जानकी संग। पहिरे तट भूषन सरस रंग।।
लिए छरी बेंत सोधे बिभाग। चाँचरि झूमक कहैं सरस राग।।
नूपुर किंकनि धुनि अति सोहाइ। ललनागन जब जेहि धरइँ धाइ।।
लोचन आँजन्हि फगुआ मनाई। छाँड़हिं नचाइ हाहा कराइ।।
चढ़े खरनि विदूषक स्वांग साजि। करैं कटि निपट गई लाज भाजि।
नर-नारि परसपर गारि देत। सुन हँसत राम भइन समेत।।
बरबस प्रसून बर बिबुध बृंद। जय जय दिनकर-कुल-कुमुद-चंद।।
ब्रह्मादि प्रसंसत अवध बास। गावत कल कीरति तुलसिदास।।
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