गांधी : संभावना के शिखर

राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के जीवन और चिंतन की पौधशाला में सत्य, अहिंसा, सत्याग्रह, अपरिग्रह, संयम और पर्यावरण चेतना की बहार आबाद रही है। गांधी सार्ध शती के समापन और उनकी 151वीं जयंती पर पूरी दुनिया में परिचर्चा-परिसंवाद और सेवा कार्यों का दौर चला। मंथन हुआ कि बापू आज होते तो क्या करते ? उनकी सीख से वर्तमान विषम समय में हम कैसे नयी उमंग के साथ नया जीवन शुरू कर सकते हैं ?

मुझे लगता है जीवन और समाज में लोगों को तोड़ने वाली ताकतें जब ज्यादा सक्रिय हो जाएं, लोगों की जिंदगियां खतरे में हों तब गांधी ज्यादा प्रासंगिक हो जाते हैं। जल, जंगल, जमीन के साथ इंसान भी नफरत के शिकार हुए और हो रहे हैं। नतीजा सामने है। हम घर होकर भी अक्सर सफर में रहते थे, किन्तु कोरोना-कहर के वक़्त ने हमें घर का सही अर्थ समझा दिया है।

गांधी जी ने सत्य की प्रयोगशाला में अहिंसा का रसायन तैयार किया। दिव्य प्रेम के प्रयोग में खप गए और धरती से अपने लोभ को पूरा करने की मांग करने से लोगों को बाज आने की सीख देते रहे। बापू के उन शब्दों को बार बार याद करना होगा कि यह धरती हमारी जरूरतों को तो पूरा कर सकती है किंतु सारी इच्छाओं और लालच को कभी पूरा नहीं कर सकती। आज इस पर अमल के अलावा कोई राह नहीं है।

आज पर्यावरण के साथ हिंसक बर्ताव हो रहा है। उसके शिकार हम सभी हो रहे हैं। दुनिया के अगुवा देश पर्यावरण को धता बताकर खुद को सबसे आगे बताते हैं तब सचमुच गांधी बहुत याद आते हैं। आज हम कोरोना योद्धा बनने की बात कर रहे हैं। गांधी जी ने तो एक पर्यावरण योद्धा बनकर जीने की सलाह दी थी। लेकिन, हम बुनियाद से कटकर तरक्की के किले बनाने में इतने मशगूल हो गए कि जो नहीं होना था उसे नियति बना बैठे।

बापू की जरूरत कल थी, आज है और कल भी रहेगी क्योंकि जीवन भी कल था, आज है और कल भी रहेगा। गांधी जीवन और जिजीविषा का दूसरा नाम है। बापू हर युग की भाषा हैं, युग-युग के पानी हैं, सचमुच अमर कहानी हैं। हमारे समय की सबसे अहम जरूरत यह है कि हम गांधी की तरफ लौटें। अभी बहुत दूर जाना है, बेहतर दुनिया बनाना है। इसलिए जियो जीतने के लिए !
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