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राज्यसभा चुनाव से कांग्रेस के चाणक्य के रूप में उभरे गहलोत!

जयपुर। समय समय पर कांग्रेस के संकटमोचक के रूप में उभरे राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत इस बार के राज्यसभा चुनाव में कांग्रेस के चाणक्य के रूप में भी स्थापित हो गए। राजस्थान से रणदीप सुरजेवाला, मुकुल वासनिक और प्रमोद तिवारी तीनों जीत गए। दो महासचिव और एक दमदार नेता। राजस्थान विधानसभा के सदस्यों की संख्या के गणित के हिसाब से कुल चार उम्मीदवारों की जीत तय थी, जिनमें से एक बीजेपी व कांग्रेस के तीन उम्मीदवारों की जीत सुनिश्चित थी। लेकिन बीजेपी द्वारा अपने बचे हुए 30 वोट सुभाष चंद्रा को दिए जाने की घोषणा की गई, फिर भी मुख्यमंत्री गहलोत ने पहले ही ऐसी कसावट भरी हुई रणनीति बना दी थी कि बीजेपी उसके वोटरों में कोई सैंध न लगा सके। उल्टे बीजेपी की शोभारानी का एक वोट भी कांग्रेस को मिला। बीजेपी को केवल एक ही सीट हाथ लगी, दिग्गज नेता घनश्याम तिवाड़ी जीत गए, मगर देश के बड़े टीवी नेटर्वक के जी ग्रुप के मालिक सुभाष चंद्रा चुनाव हार गए।

देश की राजनीति में जादूगर कहे जाने वाले अशोक गहलोत अब कांग्रेस के असली चाणक्य हैं। राजस्थान में मतदान के नतीजे देखें, तो कांग्रेस को जीत के लिए 123 विधायकों की जरूरत थी, जबकि तीनों उम्मीदवारों को मिले कुल 126 वोट। प्रमोद तिवारी को 41 वोट मिले और मुकुल वासनिक 42 व सुरजेवाला को 43 वोट मिले। इस तरह से अपनी जीत की जरूरत से 3 वोट कांग्रेस को ज्यादा मिले। बीजेपी के घनश्याम तिवारी को 43 वोट मिले। सुभाष चंद्रा को मिले केवल 30 वोट। भाजपा की शोभा का वोट प्रमोद तिवारी को मिला। ज्ञात रहे कि राज्यसभा में सबको दिखाकर वोट करना पड़ता है, गुप्त मतदान नहीं होता। गहलोत ने अपने विश्वस्त राज्यसभा सांसद नीरज डांगी, व कुछ अन्य ऐसे लोगों को को चुनाव एजेंट के रूप में तैनात किया, जो राजनीतिक रूप से सक्षम हैं, ताकि कोई गड़बड़ी न हो सके। रणदीप सुरजेवाला, मुकुल वासनिक और प्रमोद तिवारी तीनों राहुल गांधी, प्रियंका गांधी व सोनिया गांधी के नजदीकी एवं विश्वस्त लोगों में गिने जाते हैं। कांग्रेस महासचिव एवं राजस्थान से राज्यसभा सांसद केसी वेणुगोपाल व नीरज डांगी भी आलाकमान के करीबी हैं। कमजोर तो मुख्यमंत्री गहलोत कभी नहीं थे, लेकिन इस बार के राज्यसभा चुनाव में तीनों को जिताकर नई दिल्ली में गहलोत ने अपनी स्थिति और मजबूत कर ली है। साथ ही विरोधियों को साफ संदेश भी दे दिया है।

राज्यसभा चुनाव में देखा जाए, तो सुभाष चंद्रा को जीतता हुआ उम्मीदवार दिखाने की कोशिश में बीजेपी ने करतब तो बहुत किए, लेकिन गहलोत ने किसी भी कोशिश में बीजेपी को सफलता हासिल नहीं होने दी। सुभाष चंद्रा ने अपने चुनाव अभियान में कई बड़े बड़े दावे किए और खुलकर कहा कि कई निर्दलीय उनके साथ हैं, यह भी कहा कि कई कांग्रेसी विधायक अंदर ही अंदर उन्हें समर्थन दे रहे हैं और चुनाव के मौके पर कई औरों के समर्थन के दावे भी किए। कांग्रेस के असंतुष्ट नेता यह भी सचिन पायलट के बारे में सुभाष चंद्रा ने कहा कि उनके पिता मेरे मित्र रहे हैं। पायलट के पास यह आखिरी मौका है, नहीं तो वे 2028 , से पहले मुख्यमंत्री नहीं बन सकेंगे। लेकिन गहलोत ने एक नहीं चलने दी और सुभाष चंद्रा को केवल 30 वोट पर ही रोके रखा।

किसान आंदोलन में बीजेपी से खटास के बावजूद राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी के हनुमान बेनीवाल को बीजेपी ने पटा लिया, और जब उन्होंने अपनी पार्टी के तीनों विधायकों का समर्थन बीजेपी समर्थित उम्मीदवार सुभाष चंद्रा को दिए जाने की घोषणा की। तो, कांग्रेस का चौंकन्ना होना जायज था। क्योंकि ऐसे में कांग्रेस की संख्या 122 ही रह जाती है जबकि तीनों उम्मीदवार की जीत के लिए उसे चाहिए 123 वोटों की जरूरत थी। हालात की गंभीरता को समझते हुए मुख्यमंत्री गहलोत सक्रिय हुए और सीपीएम के 2 व बीटीपी के 2 विधायकों को अपने पाले में करके कांग्रेस के लिए 126 विधायकों का समर्थन सुनिश्चित किया। मुख्यमंत्री गहलोत ने पहले से ही निर्दलियों का समर्थन सुनिश्चित कर लिया था, और बचे हुए निर्दलीयों में से एक और विधायक बलजीत यादव से भी बात करके कुल 127 वोटों का इंतजाम कर लिया था।

(लेखक राजनीतिक विश्लेषक हैं)

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