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गहलोत ने गुजरात में सम्हाला कांग्रेस का चुनाव प्रचार

अहमदाबाद। राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत का गुजरात मिशन फिर शुरू हो गया हैं। गुजरात में विधानसभा चुनाव प्रचार की कमान उन्होंने सम्हाल ली है और जीत के लिए वे सारी कोशिश करेंगे, जो बीजेपी की ताकत को वहां कमजोर कर सके। अब, जब गुजरात में चुनाव घोषित होने को है, तो गहलोत के ताजा गुजरात दौरे को राजनीति के कई मायने तलाशे जा रहे है। कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में मल्लिकार्जुन खड़गे के पद सम्हालने के वक्त दिल्ली में गहलोत ने सोनिया गांधी और राहुल गांधी सहित खड़गे से मिलकर गुजरात में विधानसभा चुनाव की तैयारियों पर चर्चा की और राजनीतिक हालात की जानकारी दी, उसके बाद वे गुजरात दोरे पर निकले हैं। इस बार के विधानसभा चुनाव में गहलोत का गुजरात में फिर प्रमुख जिम्मेदारी सम्हालना बदली हुई कांग्रेस की बदलती राजनीति के नए संकेत है।

वैसे, राजनीतिक संकेत तो यह भी हैं कि गुजरात में कांग्रेस का पिछली बार जैसा माहौल बनना मुश्किल है, क्योंकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह जैसे दो दिग्गज नेताओं के गुजरात में कांग्रेस की हालत पिछली बार जैसी नहीं रही। फिर, गहलोत के लिए इस बार सबसे बड़ा चैलेंज यह भी है कि मोदी और शाह अपनी पार्टी की लगातार 27 साल की सत्ता को बनाए रखने के लिए हरसंभव प्रयास कर रहे हैं। दूसरी तरफ कांग्रेस के वोट बैंक में सैंध मारने में दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी लगातार सफल होती जा रही है।

कांग्रेस की अंदरूनी चुनौतियों की बात करें, तो इस बार राहुल ने गुजरात में चुनाव प्रचार से किनारा कर लिया है, क्योंकि वे ‘भारत जोड़ो यात्रा’ पर हैं। फिर, गुजरात कांग्रेस के नेताओं में अंदरूनी बिखराव भी बहुत बड़ा है, साथ ही कांग्रेस छोड़कर जानेवालों को रोके रखना भी एक अलग बड़ा काम है। गुजरात में कांग्रेस के बड़े नेताओं को एकजुट करने में गुजरात के प्रभारी रघु शर्मा पहले से ही सक्रिय रहे हैं। लेकिन प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष जगदीश ठाकोर का राजनीतिक नजरिया किसी की भी समझ से परे माना जा रहा है। उधर, गुजरात की 25 सीटों पर जबरदस्त पकड़ रखनेलाले दिग्गज नेता भरतसिंह सोलंकी को मुख्यधारा में लाना भी बेहद जरूरी है। तो, शक्तिसिंह गोहिल, अमित चावड़ा, अर्जुन मोढवाड़िया, सिद्धार्थ पटेल, परेश धानानी को एकजुट करना भी एक अलग चुनौती है, क्योंकि इस चुनाव में अशोक गहलोत अकेले हैं, और उनके दोस्त अहमद पटेल भी अब इस संसार में नहीं है।

गुजरात में पिछली बार 2017 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के प्रभारी के रूप में गहलोत ने गुजरात की चुनावी फिजां बदल कर रख दी थी। उसी चुनाव से राहुल गांधी की राजनीतिक छवि भी पहले से ज्यादा मजबूत हुई थी और कांग्रेस 77 सीटें हासिल करके बहुमत के करीब पहुंची थी। राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि गुजरात की कुल 182 सीटों में से कई सीटों पर कांग्रेस जबरदस्त मजबूत है, जहां कांग्रेस को हराना कतई संभव नहीं है, वहां पर बीजेपी जीत के जबरदस्त प्रयास कर रही है। लेकिन मुख्यमंत्री गहलोत के गुजरात की कमान सम्हालने से बीजेपी की ये कोशिशें कमजोर पड़ेंगी और उनके व्यापक दौरों व जनसंपर्क का असर आसपास की सीटों पर भी पड़ेगा।

राजनीतिक जानकारों की राय में गहलोत को देश में एक ताकतवर नेता व अच्छे संगठक के रूप में जाना जाता है, तथा फिर से गुजरात में उन्हें कमान मिलने से कांग्रेस को कुछ तो लाभ जरूर होगा। क्योंकि गहलोत की अगुवाई में आनेवाले दिनों में कई और बड़े नेता भी गुजरात में सक्रिय होंगे, तो इससे भी कांग्रेस की राजनीतिकतस्वीर बदलेगी। गुजरात में विधानसभा चुनाव के वरिष्ठ पर्यवेक्षक बनने के बाद मुख्यमंत्री गहलोत का यह तीसरा गुजरात दौरा है, जो 28 अक्टूबर से शुरू हुआ है। इससे पहले वे 25 अगस्त को आए थे और उसके बाद 5 सितंबर को राहुल गांधी को लेकर अहमदाबाद आए थे, जहां उन्होंने विधानसभा चुनाव अभियान की शुरूआत की थी।

उल्लेखनीय है कि 2017 में पिछले विधानसभा चुनाव में मुख्यमंत्री गहलोत के नेतृत्व में गुजरात में कांग्रेस ने बीजेपी को जबरदस्त टक्कर दी थी, और गहलोत अपनी रणनीतिक मेहनत से कांग्रेस को जीत के काफी करीब ले आये थे। इस बार के लिए भी गहलोत ने अपने स्तर पर सारी तैयारियां कर ली है ताकि इस चुनाव में पिछले चुनाव से भी ज्यादा ताकत से कांग्रेस को एकजुट करके कार्यकर्ताओं में जोश पैदा किया जा सके। गहलोत मानते हैं कि गुजरात की जनता अब और परेशानियां नहीं झेल सकती तथा सांप्रदायिक ताकतों को दरकिनार करके महात्मा गांधी के प्रदेश में जनता एक ऐसी सरकार लाना चाहती है, जिसमें गरीब, मजदूर, किसान, छोटे व्यापारियों आदि सबके लिए जगह हो। उनका कहना है कि केजरीवाल और मोदी दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू हैं, जो अब साबित भी हो चुका है।

दरअसल, गहलोत के राजनीतिक काम करने व चुनावी रणनीति का हर तरीका बेहद विशिष्ट व कसा हुआ होता है, जो उनको बाकी नेताओं से उनको अलग करता है। इसके इतर, उनकी साफ सुथरी ताकतवर छवि व विरोधियों की हर रणनीति को मात देने की अबूझ तरकीबें भी उनको कद्दावर नेता साबित करती हैं, इसी कारण माना जा रहा है कि गुजरात में कांग्रेस के बारे में जो धारणाएं बनी हैं, वे गहलोत के आने से बदल रही है। माना यह भी जा रहा है कि गुजरात में कांग्रेस ने अपने सबसे कुशल रणनीतिकारों में से एक गहलोत पर जो दांव खेला है, उसका संदेश यही है कि पार्टी को उनकी क्षमता पर भरोसा है।

ऐसे में, कांग्रेस के इस दिग्गज नेता के सामने कांग्रेस को जीत दिलाने में कई बड़ी चुनौतियां और आनी बाकी हैं। लेकिन इससे निश्चिंत गहलोत का कहना है कि पिछली बार भी जोरदार टक्कर हुई थी, इस बार भी हम कोई कसर नहीं छोड़ेंगे। क्योंकि जनता जान रही है कि गुजरात मॉडल की बात करने वाले तो प्रधानमंत्री बन गए, लेकिन जनता को क्या मिला? गहलोत के इस सवाल की तर्ज पर कहें, तो अकेले गहलोत की मेहनत पर इस चुनाव में कांग्रेस को कितनी सफलता मिलेगी है, यह भी तो एक सवाल है।

*(लेखक राजनीतिक विश्लेषक हैं)*

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