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गिलगित-बाल्टिस्तान : पाकिस्तान और चीन का षड्यंत्र

पाकिस्तान सरकार गिलगित-बाल्टिस्तान को पाकिस्तान का ‘पांचवां प्रांत’ घोषित करने पर गंभीरता से विचार कर रही है। पाकिस्तानी प्रधानमंत्री के सुरक्षा सलाहकार सरताज अजीज की अध्यक्षता में गठित एक कमेटी ने रावलपिंडी सरकार को ऐसी सलाह दी है। गिलगित-बाल्टिस्तान जम्मू-कश्मीर के उस हिस्से में है जिस पर पाकिस्तान ने नवंबर 1947 से जबरन कब्जा किया हुआ है।

भारत सरकार ने पाकिस्तान के नए इरादे का विरोध करते हुए इसे ‘पूरी तरह अस्वीकार्य’ हरकत बताया है और कहा है कि इस तरह का कदम उठाकर पाकिस्तान जम्मू-कश्मीर के कुछ हिस्सों पर अपने कब्जे के गैरकानूनी होने की सच्चाई को छिपा नहीं सकता। भारत ने अपने इस दावे को भी दोहराया है कि पाकिस्तान को भारत का यह इलाका खाली करना ही होगा। उसने यह भी कहा कि ऐसे कदम उठाकर पाकिस्तान 70 साल से गिलगित, बाल्टिस्तान और अवैध कब्जे वाले जम्मू-कश्मीर के अन्य हिस्सों में अपनी मानवाधिकार विरोधी करतूतों और स्थानीय जनता से उसकी मूलभूत स्वतंत्रता छीनने के अपने पाप को छिपा नहीं सकता। उधर, कश्मीर के तीन प्रमुख अलगाववादी नेताओं सैयद अलीशाह गिलानी, मीरवाइज फारूक और मुहम्मद यासीन मलिक ने भी पाकिस्तान के इस इरादे का कड़ा विरोध किया है। लेकिन पाकिस्तान के विरोध में इन विरोध से भी ज्यादा कड़ी आवाज ब्रिटेन से आई। कंजरवेटिव पार्टी के सदस्य बॉब ब्लैकमैन ने ब्रिटिश संसद में एक प्रस्ताव पेश किया है जिसमें कहा गया है कि ”गिलगित-बाल्टिस्तान कानूनी और संवैधानिक तौर पर भारत के जम्मू-कश्मीर का वह हिस्सा है, जिस पर पाकिस्तान ने गैरकानूनी कब्जा जमाया हुआ है।”

इस प्रस्ताव में यह भी कहा गया है कि चीन और पाकिस्तान ने गिलगित-बाल्टिस्तान के रास्ते शिंजियांग और ग्वादर को जोड़ने वाला जो ‘चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा’ (सीपैक) बनाना शुरू किया है, वह गैरकानूनी है और एक विवादित क्षेत्र में दखलंदाजी जैसा है। भारत के विभाजन के बाद शुरू हुए कश्मीर विवाद के इतिहास में यह पहला मौका है जब ब्रिटेन में भारत के पक्ष में और पाकिस्तान के विरोध में इतना स्पष्ट और कड़ा बयान दिया गया है। यहां यह याद करना जरूरी है कि 22 फरवरी, 1994 के दिन भारतीय संसद ने सर्वसम्मति से एक प्रस्ताव पारित किया था जिसमें पाकिस्तान के गैरकानूनी कब्जे वाले इलाके भारत को लौटाने की मांग करते हुए यह राष्ट्रीय संकल्प दोहराया गया था कि समूचा जम्मू-कश्मीर भारत का अभिन्न हिस्सा है और पाकिस्तान के कब्जे वाले हिस्से को भारत में वापस लेने के लिए हर संभव कदम उठाया जाएगा।

भारत की कूटनीतिक भूलें
इसे भारतीय नेतृत्व और विदेश नीति चलाने वाली अफसरशाही की कूटनीतिक कमजोरी ही कहा जा सकता है कि 1965 और 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्धों में भारतीय सेना ने पाकिस्तान के कब्जे वाले ‘कश्ममीर’ के जिन इलाकों को जीता था, उन्हें भी वार्ता की मेज पर वापस कर दिया गया। हद तो तब हो गई जब बांग्लादेश के युद्ध में भारतीय सेना के आगे आत्मसमर्पण करने वाली पूरी की पूरी पाकिस्तानी सेना को भारतीय नेतृत्व (तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी) ने वार्ता की मेज पर कश्मीर के सवाल पर कोई भी शर्त मनवाए बिना रिहा कर दिया।

ब्रिटिश-अमेरिकी षड्यंत्र
सवाल उठता है कि पाकिस्तान सरकार को अचानक गिलगित-बाल्टिस्तान को पाकिस्तान का पांचवां प्रांत घोषित करने का ख्याल क्यों आने लगा है? इसके लिए यह समझना होगा कि 1947 में जम्मू-कश्मीर के भारत में विलय के बावजूद यह इलाका आखिर पाकिस्तान सरकार के कब्जे में कैसे आया? महाराजा हरिसिंह के शासन वाले जम्मू-कश्मीर में चार क्षेत्र थे- कश्मीर घाटी, जम्मू, लद्दाख और गिलगित-बाल्टिस्तान। मौजूदा ‘आजाद कश्मीर’ असल में जम्मू का हिस्सा है और पाकिस्तानी कब्जे वाला बाकी हिस्सा गिलगित और बाल्टिस्तान है। भारतीय नियंत्रण वाले हिस्से के जम्मू-कश्मीर में केवल जम्मू और लद्दाख हैं। भारत विभाजन के समय पाकिस्तानी नेतृत्व की नजर कश्मीर घाटी पर थी जो पाकिस्तान के साथ सटी होने के अलावा मुस्लिम बहुल आबादी वाली भी थी। इसके अलावा, सोवियत संघ, अफगानिस्तान और पूर्वी तुर्किस्तान से सीधे जुड़े होने के कारण जम्मू-कश्मीर का खासा सामरिक महत्व भी था। उधर, दूसरे विश्वयुद्ध से ताजा-ताजा बाहर निकले ब्रिटेन और अमेरिका को भी यह चिंता सता रही थी कि अगर कम्युनिस्ट सोवियत संघ और पंडित नेहरू के भारत में सांठगांठ हो गई तो पूरा दक्षिण एशिया उनके लिए मुसीबत बन जाएगा। इस वास्ते उनके लिए गिलगित-बाल्टिस्तान को भारत से काटना जरूरी था, जो इन देशों को बाकी जम्मू-कश्मीर से जोड़ता है। तब तक माओ की कम्युनिस्ट पार्टी ने चीन पर कब्जा नहीं किया था और पूर्वी तुर्किस्तान (आजकल का ‘शिंजियांग’) एक आजाद देश था।

यही कारण था कि जम्मू-कश्मीर के भारत में विलय की घोषणा के मात्र नौ दिन बाद 4 नवंबर के दिन महाराजा हरिसिंह की सेना में गिलगित स्काउट्स के ब्रिटिश कमांडर मेजर ब्राऊन ने इस इलाके को पाकिस्तान में मिलाने की घोषणा कर दी। पाकिस्तान के लिए यह बिल्ली के भाग्य से छींका टूटने जैसा साबित हुआ। बाद में 28 अप्रैल, 1949 के दिन पाकिस्तान सरकार ने ‘कराची-एग्रीमेंट’ की घोषणा की जिसमें भारत से हथियाए गए जम्मू के इलाके को ‘आजाद-कश्मीर’ नाम दिया गया और गिलगित-बाल्टिस्तान को ‘नार्दन-एरियाज’ नाम दे दिया गया। सच्चाई यह थी कि जिन नेताओं और पाकिस्तानी अधिकारियों ने इस पर हस्ताक्षर किए उनमें से कोई भी न तो जम्मू वाला था और न कश्मीरी।

पाकिस्तानी संविधान में गिलगित-बाल्टिस्तान की असलियत
तब से पाकिस्तान ‘आजाद कश्मीर’ और गिलगित-बाल्टिस्तान पर ‘स्वायत्त क्षेत्र’ के तौर पर कब्जा जमाए हुए है। लेकिन कानूनी सच्चाई यह है कि पाकिस्तान के संविधान में परिभाषित ‘पाकिस्तान’ के इलाके में इन दोनों इलाकों का जिक्र तक नहीं है। कहने को इन दोनों इलाकों में निर्वाचित सदन हैं, लेकिन इनके चुनाव में किसी भी स्थानीय उम्मीदवार का पर्चा तब तक स्वीकार नहीं किया जा सकता जब तक वह लिखकर यह हलफनामा नहीं देता कि ‘वह आजाद कश्मीर को पाकिस्तान का हिस्सा मानता है।’ मार्च 1993, सितंबर 1994, मई 1999 और मार्च 2010 में ऐसे कम से कम चार मौके आ चुके हैं, जब आजाद जम्मू-कश्मीर सुप्रीम कोर्ट, ‘आजाद जम्मू-कश्मीर हाई कोर्ट’ और खुद पाकिस्तान के सर्वोच्च न्यायालय ने अपने फैसलों में साफ-साफ कहा है कि ‘आजाद जम्मू-कश्मीर और गिलगित-बाल्टिस्तान पर पाकिस्तान सरकार का कानूनी अधिकार नहीं है।’

पाकिस्तान और चीन की जुगलबंदी
इन सभी तथ्यों के संदर्भ में अगर पाकिस्तान और चीन के मौजूदा रिश्तों को देखा जाए तो गिलगित-बाल्टिस्तान के बारे में पाकिस्तान सरकार के नए इरादों को समझना बहुत आसान हो जाएगा। 1962 के भारत-चीन युद्ध के बाद चीन और पाकिस्तान के रिश्ते जिस दिशा में जा रहे हैं, उसे देखते हुए पाकिस्तान सरकार का यह नया पैंतरा दोनों देशों के भारत विरोधी खेल में एक नया और बहुत खतरनाक आयाम जोड़ने का संकेत देता है। 1962 के युद्घ के एक साल बाद ही पाकिस्तान ने गैरकानूनी कब्जे वाले ‘पी.ओ.के.’ के ‘ट्रांस काराकोरम ट्रैक्ट’ में मश्कोह घाटी का 5130 वर्ग किलोमीटर इलाका चीन को दे दिया था। बाद में चीन ने इसी इलाके से अपने शिंजियांग प्रांत के काशगर और पाकिस्तान के एबटाबाद के बीच 1300 किलोमीटर लंबा काराकोरम-हाइवे बनाकर भारत के लिए एक नया सुरक्षा संकट पैदा कर दिया था।

पिछले कुछ साल से चीन ने 54 अरब डॉलर की विशाल कीमत पर गिलगित-बाल्टिस्तान से लेकर पाकिस्तान के बलूचिस्तान में अरब सागर तक जो ‘चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा’ यानी ‘सीपैक’ अभियान शुरू किया है, उसने भारत के पूरे पश्चिमी मोर्चे पर भारत की सुरक्षा के लिए एक अभूतपूर्व खतरा पैदा कर दिया है। सीपैक के पूरा होने पर चीन और पाकिस्तान न केवल गिलगित-बाल्टिस्तान और बलूचिस्तान के अथाह प्राकृतिक संसाधनों को खुले हाथों लूट सकेंगे, बल्कि इस हाइवे के रास्ते चीनी सेना को बीजिंग से लेकर अरब सागर, खाड़ी और हिंद महासागर तक बेरोक-टोक अपने सैनिक और साजोसामान ले जाने की सुविधा मिल जाएगी। ऐसे में अगर पाकिस्तान गिलगित-बाल्टिस्तान को अपना ‘पांचवां प्रांत’ बनाने में कामयाब हो जाता है तो न केवल पूरे जम्मू-कश्मीर को भारत में वापस लाने का भारतीय सपना अधूरा रह जाएगा, बल्कि चीन को वहां स्थायी रूप से जमे रहने का हक भी मिल जाएगा। ऐसे में गिलगित-बाल्टिस्तान पर पाकिस्तान और चीन के नए षड्यंत्र को नाकाम करना भारतीय नेतृत्व के लिए एक नई चुनौती बन गया है।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और चीन, तिब्बत तथा जम्मू-कश्मीर मामलों के विशेषज्ञ हैं)

साभार- http://panchjanya.com/ से



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