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गूगल को भा रहे भारतीय स्टार्टअप के कारनामे

ऑप्टिक्स एवं फोटोनिक्स क्षेत्र की अंतरराष्ट्रीय संस्था एसपीआईई के पिछले वर्ष हुए सालाना तकनीकी कार्यक्रम में चेन्नई स्थित स्टार्टअप एडिवो डायग्नोस्टिक्स की संस्थापक और मुख्य कार्याधिकारी गीतांजलि राधाकृष्णनन ने भी हिस्सा लिया था। अमेरिका में हुए इस कार्यक्रम में विश्व के हजारों लोगों ने भागीदारी की जिसमें गूगल, माइक्रोसॉफ्ट और एमेजॉन जैसी बड़ी कंपनियों के शीर्ष अधिकारी भी शामिल थे।

तमिलनाडु के तंजावुर जिले में स्थित एसएएसटीईए संस्थान से बायो-इंजीनियर की डिग्री हासिल करने वाली राधाकृष्णनन ने इस अवसर पर फोटोनिक्स पर एक शोध पत्र प्रस्तुत किया और उनकी कंपनी द्वारा विकसित की गई घाव में इन्फेक्शन से बचाव संबंधी उपकरण पेश किया। इस तकनीक से प्रभावित होकर गूगल ने उनसे संपर्क किया और भारत में गूगल लॉन्च पैड एक्सीलरेटर में शामिल होने के लिए कहा। एडिवो उन कई नई भारतीय कंपनियों में से एक है, जो कृत्रिम मेधा (एआई) और मशीन लर्निंग (एमएल) आधारित नवाचारों की मदद से भारत की प्रमुख चुनौतियों का सामना करने के उपाय विकसित कर रही हैं और उन्हें एक्सीलरेटर कार्यक्रम के तहत गूगल सलाह और समर्थन दे रही है। उदाहरण के लिए, कैंसर का पता लगाने के लिए एआई का उपयोग किया जा रहा है, मानसिक स्वास्थ्य के मुद्दों को हल करने के लिए ‘भावनात्मक रूप से बुद्धिमान’ रोबोट बनाए जा रहे हैं या बीमा धोखाधड़ी और दावों के प्रबंधन का पता लगाने के लिए नई तकनीक का उपयोग हो रहा है।

भारत में गूगल लॉन्च पैड एक्सीलरेटर के प्रोग्राम मैनेजर पॉल रवींद्रनाथ कहते हैं, ‘हम भारत की समस्याओं का समाधान करने का प्रयास कर रहे हैं। हमारा मानना है कि एआई और एमएल की सहायता से हम इनमें से कई चुनौतियों का समाधान कर सकेंगे।’ वह कहते हैं, ‘हम जिन स्टार्टअप को सहायता प्रदान कर रहे हैं उनमें से अधिकांश के कामकाज के केंद्र में एआई और एमएल तकनीक शामिल है।’

भारत में गूगल का तीन महीने का एक्सीलरेटर कार्यक्रम अपने उत्पादों को तेजी से बढ़ाने में मदद करने के लिए अपने लोगों, नेटवर्क और उन्नत प्रोद्योगिकियों के साथ उभरती नई परिस्थितियों से ये स्टार्टअप मेल खाते हैं। यह कार्यक्रम उन्हें वेंचर कैपिटलिस्ट और शीर्ष तकनीकी कंपनियों के सलाहकारों से भी जोड़ता है। एडिवो ने मशीन लर्निंग आधारित क्लाउड मॉडल पेश किया था जो इस नवोन्मेष की प्रायोगिक परियोजना के लिए आवश्यक है। हालांकि शुरुआत में यह उपकरण काफी बड़ा और भारी था लेकिन गूगल टीम की मदद से इसे आईफोन जैसे आकार तक लाने में मदद मिली। उपकरण का यूजर इंटरफेस बेहतर बनाया गया और ऐप का आकार भी कम किया गया। एडिवो का पोर्टेबल उपकरण ‘इल्युमिनेट’ उन्नत इमेज प्रोसेसिंग एवं मशीन लर्निंग एल्गोरिद्म का उपयोग करके मिनट के भीतर त्वचा में रोगजनक एवं संक्रमित ऊतकों की उपस्थिति का पता लगा सकता है। इससे चिकित्सकों को संक्रमण के प्रारंभिक चरण में सही उपचार करने में मदद मिलती है।

एडिवो में बिजनेस ऑपरेशंस के प्रमुख मुकुंद राममूर्ति कहते हैं, ‘आजकल घाव का इलाज आसानी से हो सकता है लेकिन अभी भी घाव के ईलाज के लिए सही उपचार की पहचान करने में करीब 72 घंटे लग जाते हैं क्योंकि ऊतकों को प्रयोगशालाओं में ले जाना पड़ता है। हम इस समय को घटाकर कुछ मिनट तक सीमित कर रहे हैं और इसमें होने वाली मानव की गलतियों को भी हटा रहे हैं।’

विशेषज्ञों का कहना है कि अगर शुरुआती स्तर पर संक्रमण की पहचान कर ली जाए तो बाद मेंं बीमारी के चलते शरीर का वह हिस्सा हटाने की संभावना 90 प्रतिशत तक कम हो जाएगी। फिलहाल देश के कुछ अस्पतालों में एडिवो के उपकरण का प्रयोग हो रहा है और अब कंपनी अमेरिका, कनाडा, दक्षिण अमेरिका और दक्षिण-पूर्व एशिया के बाजारों में लॉन्च करने की योजना बना रही है।

तकनीक की मदद से मानसिक स्वास्थ्य विकारों का समाधान खोज रही कंपनियों को भी गूगल सहायता उपलब्ध करा रही है। एआई तकनीक आधारित मानसिक स्वास्थ्य के लिए चैट थेरेपी प्लेटफॉर्म ‘वाइसा’ ने ‘भावनात्मक बुद्धिमता’ आधारित रोबोट तैयार किया है जो वर्चुअल कोच की तरह काम करता है और उपयोगकर्ता की भावनाओं के हिसाब से व्यवहार करता है। यह व्यक्ति को अच्छा अनुभव कराने और मानसिक शांति के लिए कॉग्निटिव व्यवहारात्मक तकनीक (सीबीटी) जैसे, मेडीटेशन, सांस लेना, योगा, प्रेरणादायी साक्षात्कार और दूसरी सकारात्मक गतिविधियों का उपयोग करता है।

बेंगलूरु स्थित वाइसा को बनाने में मनोवैज्ञानिक, डिजाइनर एवं डेवलपरों की 15 सदस्यीय टीम और 5 लाख उपयोगकर्ताओं की एक वर्ष की मेहनत लगी है। इस दौरान उन्होंने समझा कि किस तरह एआई तकनीक युक्त रोबोट भावनात्मक बुद्धिमत्ता विकसित करता है। वाइसा के सह-संस्थापक रमाकान्त वेम्पती कहते हैं, ‘भारत में मानसिक स्वास्थ्य एक बड़ी समस्या है और यहां की 1.2 अरब जनसंख्या के लिए 5,000 से भी कम प्रशिक्षित मनोचिकित्सक मौजूद हैं। यहां मांग-आपूर्ति के बीच भारी अंतर है।’ विश्व स्वास्थ्य संगठन की एक रिपोर्ट का हवाला देते हुए वेम्पती कहते हैं कि विश्व में हर चार में से एक व्यक्ति अपने जीवन के किसी न किसी मोड़ पर मानसिक या मनोविकारों से प्रभावित होगा।

अपनी उच्च गुणवत्ता वाली एआई विशेषज्ञता उपलब्ध कराने के साथ साथ गूगल वाइसा को ग्राहक अनुभव बेहतर करने, उपयोगकर्ताओं की संख्या बढ़ाने और मंच से पैसे कमाने में भी मदद करती है। इस समय 30 से अधिक देश वाइसा का उपयोग कर रहे हैं।

वित्तीय समावेशन के क्षेत्र में भी गूगल नई कंपनियों को काफी मदद उपलब्ध करा रही है। गुरुग्राम स्थित पर्सेप्टिविटी डेटा सॉल्यूशंस बीमा और भुगतान संबंधी जानकारियों, फर्जी संदेश तथा गलत प्रबंधन के लिए एआई तकनीक पर आधारित प्लेटफॉर्म विकसित किया है। कंपनी मशीन लर्निंग की मदद से प्रत्येक दावे के लिए जोखिम स्कोर की गणना करती है। इससे गलत या दोहरे दावों की पहचान करने में मदद मिलती है और वास्तविक दावों का शीघ्र निपटान सुनिश्चित होता है। कंपनी की कहना है कि इसने अभी तक 90 प्रतिशत सटीकता के साथ लाखों दावों का निपटान किया है और इससे फर्जी दावों की पहचान करने की लागत में 70 प्रतिशत तक की कमी आई है।

पर्सेप्टिविटी की शेरलॉक प्लेटफॉर्म 100 पेज के बीमा दावे को कुछ सेकंड के भीतर पढ़ सकता है और गलत या अस्पष्ट जानकारी की पहचान कर लेता है। यह गूगल के विजन एपीआई और टेंसरफ्लो मशीन लर्निंग क्षमता का उपयोग करता है और स्वास्थ्य बीमा संबंधी दावे को पूरी तरह स्वचलित बना रहा है।

पर्सेप्टिविटी के संस्थापक संदीप खुराना कहते हैं, ‘आमतौर पर एक मरीज को बीमा दावा स्वीकृत होने और धनराशि मिलने के लिए लगभग 4-8 घंटे इंतजार करना पड़ता है, जो कई बार कुछ दिनों तक भी हो सकता है। हमारा एआई तंत्र इस समय को घटाकर कुछ मिनट कर देती है।’

गूगल एक्सीलरेटर के सलाहकार पर्सेप्टिविटि के मशीन लर्निंग मॉडल को बेहतर बनाने और इसका आकार कम करने में मदद कर रहे हैं। खुराना बताते हैं कि इन सलाहकारों में गूगल की पेरेंट कंपनी अल्फाबेट के स्वामित्व वाली एआई तकनीक आधारित कंपनी डीपमाइंड की एक टीम भी शामिल है।

गूगल की सहायता प्राप्त एक अन्य कंपनी फायनेंसपीयर स्कूल की फीस संबंधी विशिष्ट समस्या का समाधान खोज रही है। मुंबई स्थित पीयर-टू-पीयर लेंडिंग कंपनी कर्ज लेने वालों को कर्जदाताओं से जोड़ती है और वह स्कूल की एक वर्ष की पूरी फीस का एक किश्त में भुगतान करके माता-पिता से 9-12 महीने की किश्त में राशि इकट्ठा रती है। कंपनी माता-पिता से किसी तरह का ब्याज नहीं लेती। फायनेंसपीयर एआई तकनीक आधारित एक सॉफ्टवेयर की मदद से जोखिम की पहचान करती है। इसी तरह, ऐप आधारित कर्ज देने वाला प्लेटफॉर्म स्मार्टकॉइन वित्तीय रूप से कमजोर लोगों के लिए काम कर रहा है। डेटा साइंस, एआई और मशीन लर्र्निंग का उपयोग करके यह ग्राहकों को छोटे या मध्यम आकार के कर्ज देता है और भविष्य के लेनदेन के लिए क्रेडिट स्कोर विकसित करता है।

गूगल ने इस तरह की के कई उद्यमियों को सलाह एवं परामर्श देने के लिए अपने अमेरिका स्थित कार्यलय में बुलाया है। इनमें से ही एक निरामयी हेल्थ एनालिटिक्स की संस्थापक और मुख्य कार्याधिकारी गीता मंजूनाथ हैं, जिन्होंने शुरुआती स्तर पर स्तन कैंसर की पहचान करने के लिए एआई तकनीक आधारित प्लेटफॉर्म विकसित किया है।

साभार- https://hindi.business-standard.com/ से

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