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सरकार को मिला निंदा मंत्रालय के गठन का प्रस्ताव

सरकार शीघ्र ही निंदा मंत्रालय का गठन करने जा रही है। अर्णव गोस्वामी की गिरफ्तारी से लेकर हाल ही में हुई कुछ घटनाओँ को लेकर सत्तापक्ष के नेताओँ और मंत्रियों ने जिस तरह से निंदा के बयान जारी किए हैं, इससे सरकार ने ये महसूस किया है कि कई मंत्रियों को न निंदा करना आती है न निंदा का जवाब देना आता है। कई मंत्री तो ऐसे अनाड़ी हैं कि दूसरी पार्टी के नेताओँ की निंदा करने की बजाय अपने ही नेताओं की निंदा कर देते हैं। कई मंत्री तो अपने ही मंत्रालय के काम की निंदा कर देते हैं। अब इस बात पर विचार किया जा रहा है कि एक निंदा मंत्रालय का गठन कर निंदा मंत्री भी बनाया जाए। इस विभाग और मंत्री का यही काम होगा कि वह निंदा करे। मंत्रालय दिन भर टीवी देखकर, अखबार पढ़कर और सोशल मीडिया से जानकारी जुटाकर मंत्री को देगा और शाम को निंदा मंत्री सरकार की ओर से अधिकृत रूप से जिस जिस की निंदा करनी है, कर देंगा। इसके बाद टीवी चैनलों पर देश भर के निंदा विशेषज्ञ इस निंदा पर विचार विमर्श करेंगे। देश के लोगों को बताएंगे कि किसने किसकी निंदा की, क्यों की, और आगे भी क्यों करते रहना जरुरी है।

सुझाव में कहा गया है कि निंदा पुराण पर भी पीएचडी करवाना चाहिए। इसको गंभीरता से लेते हुए सरकार ने भी सभी विश्वविद्यालयों को इस मामले में पत्र लिखकर सुझाव भी मांगे हैं।

विशेषज्ञ समिति ने कहा है कि किसी भी घटना और बयान पर सबसे पहले निंदा ही की जाती है। कई बार तो किसी के निंदा करने से ही किसी घटना, दुर्घटना या बयान का पता चलता है। अगर कोई किसी के बयान या घटना की निंदा ना करे तो देश को लोगों को पता ही नहीं चले कि ऐसा कुछ हुआ है।

पाँच सौ साल पहले कबीरदास को भी पता था कि देश में आने वाले सालों में अखबार और टीवी चैनलों का ऐसा युग आएगा कि निंदा करने वाला और निंदा करवाने वाला दोनों इसके बगैर जी नहीं पाएंगे। इसीलिए उन्होंने लिख दिया- निंदक नियरे राखिये, आंगन कुटी छवाय, बिन पानी साबुन बिना निर्मल करे सुभाय।

देश की सुबह निंदा से होती है और निंदा जाप से ही रात होती है। नेता सुबह उठकर या तो निंदा करता है या बयान देता है, बयान में भी वह निंदा ही करता है। अगर अखबार और टीवी में उसका बयान नहीं आता है तो वह सोशल मीडिया पर निंदा करता है। सोशल मीडिया पर निंदा करते ही देश भर के अखबार और चैनल उसके घर पहँच जाते हैं और उससे पूछते हैं कि आपने निंदा की, इस बारे में आपका क्या कहना है। वह फिर निंदा करके अपने निंदा करने का मतलब समझाता है। इसके बाद चैनल वाले वह जिसकी निंदा करता है उसके घर जाता है, फिर उससे पूछता है कि फलाने साहब ने आपकी निंदा की है, आपका क्या कहना है। कई बार तो होता ये है कि जिसकी निंदा की जाती है उसे पता ही नहीं चलता है कि कोई उसकी निंदा करके घर पर आराम से सो रहा है। इस पर वह भी निंदा करने वाले के बारे में चैनल वालों से विस्तार से जानकारी लेता है और अपनी तरफ से भी निंदा कर देता है। कई बार तो जवाब में निंदा करने वाला इतना अज्ञानी होता है कि उसे चैनल वालों को ही बताना पड़ता है कि वो निंदा कैसे करे। चैनलों का मार्गदर्शन मिलते ही वह भी निंदा कर देता है।

ये तो भला हो 24 घंटे देश की सेवा में लगे चैनल और अखबार वालों का कि वो निंदा करने वाले को ढूँढ निकालते हैं और उससे फिर निंदा करवा लेते हैं।

हाल ही में देखने में आया है कि सत्तापक्ष में बैठे मंत्री और नेता निंदा को लेकर ज्यादा सक्रिय हो गए हैं। पहले तो होता ये था कि सत्ता पक्ष कुछ करता था तो उसकी प्रतिक्रिया में विपक्ष निंदा करने का काम करता था। अब तो ये हाल हो गई है कि विपक्ष के नेता सोये ही रहते हैं और सत्ता पक्ष के नेता सुबह उठते ही निंदा करने लगते हैं। कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसा इसलिए हो रहा है कि सत्ता में बैठे लोग अपने आपको विपक्ष का नेता ही समझ रहे हैं और जो विपक्ष में हैं वो अपने आपको सत्ता में बैठा हुआ समझ रहे हैं। इस गड़बड़झाले में निंदा करने वालों का स्तर भी बहुत गिर गया है।

इधर भाजपा के नेता ने सुझाव दिया है कि जैसे मतदान के दिन मतदान केंद्र से 500 मीटर दूर टेबल लगाकर मतदाताओं को वोट देने के लिए समझाया जाता है वैसे ही जगह जगह टेबलें लगाकर भाजपा कार्यकर्ता लोगों को समझाएंगे कि आज किसकी निंदा करना है।

बुध्दिजीवियों का कहना है कि साहित्य, धर्म, अध्यात्म से लेकर देश के विकास में में निंदा रस का भी अपना महत्व है। निंदा की वजह से ही महाभारत हुई और रामायण लिखी गई। अगर ये ग्रंथ नहीं लिखे जाते तो हमें न गीता का ज्ञान मिलता न रामराज्य के बारे में जान पाते।

लोगों का भी मानना है कि निंदा की वजह से ही हम कई नेताओं और मंत्रियों को पहचानते हैं, अगर ये लोग आपस में निंदा ही नहीं करे तो पता ही नहीं चले कि देश में ऐसे बड़े बड़े नेता बैठे हैं।

इस मामले में शोध के इच्छुक एक छात्र का कहना है कि मौका मिलते ही मैं सबसे पहले इस पर पीएचडी करुंगा। इसके लिए मैं गाँव में कुओं पर पानी भरने वाली औरतों से लेकर गाँव की चौपाल में बैठे बुजुर्गों, शहरों में महिलाओं की किटी पार्टियों में जाकर जमकर रिसर्च करुंगा।

एक अन्य सुझाव में कहा गया है कि सरकार को और राजनीतिक दलों को गाँव गाँव और शहर शहर में हर मोहल्ले में ऐसे निंदा क्लब बनाना चाहिए जो अपने आसपास की हर घटना की निंदा करे। क्लब के सदस्य निंदा करने के ज्यादा से ज्यादा मौके की तलाश में रहे ताकि गली मोहल्ले से उठी निंदा की आवाज़ राष्ट्रीय चैनल की सुर्खियाँ बन सके। इससे गाँव और शहर में निठल्ले और अवारा छोकरों को व्यस्त रहने का मौका मिल जाएगा। स्कूलों में बच्चों से निंदा पर निबंध लिखवाए जाने चाहिए ताकि वे अपने स्कूल के शिक्षक-शिक्षिकाओँ द्वारा की जाने वाली आपसी निंदा पर ज्यादा विस्तार से लिख सके।

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