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एक अनमोल विरासत का नाम है गुरुकुल झज्जर

गुरुकुल झज्जर का नाम इस में स्थित म्यूजियम के कारण विश्व विख्यात है| गुरुकुल झज्जर को इतिहास का स्रोत जाना जाता है| इसके म्युजियम के कारण देश विदेश के शोधार्थी यहाँ आते ही रहते हैं| इस कारण इस गुरुकुल की ख्याति आज भारत ही नहीं अपितु भाअत की सीमाओं को पार करते हुए पूरे विश्व में पहुँच चुकी है| इस संस्था ने जहाँ चन्दगी राम जैसे विश्व ख्याति के पहलवान पैदा किये हैं, वहां स्वामी ओमानंद सरस्वती जी, जो इस गुरुकुल के लम्बे समय तक आचार्य रहे, की इतिहास की खोज तथा एतिहासिक सामग्री के संकलन में रूचि होने के कारण इसे विश्व मानचित्र पर लाने का पूरा श्रेय जाता है|

इस गुरुकुल की स्थापना पंडित विश्वंभरदास जी ने की थी, जिनका जन्म आर्य समाज की स्थापना के मात्र एक वर्ष पश्चात् सन् १८७६ ईस्वी में होने के कारण उन पर आर्य समाज का पक्का रंग चढ़ गया था| उनका सम्बन्ध झज्जर( हरियाणा) के एक सुप्रतिष्ठित ब्राहमण परिवार से था| व्यवसाय के रूप में आप अंग्रेज की रेल के कर्मचारी थे| व्यवसाय के ही चक्कर में आपका अफ्रिका में भी जाना हुआ| वहां भी आपने रेलावे में ही कार्य किया| तत्पश्चात् जल्द ही आपने अफ्रिका की रेल सेवा को त्याग दिया और फिर भारतीय सेना के अंग बन गए| ज्यों ही आपने सेना को त्यागा तो आप वहां से सीधे स्वामी श्रद्धा नन्द सरस्वती जी से संपर्क करने गुरुकुल कांगड़ी में चले गए| वहां जाकर आपका गुरुकुल को देखकर एसा प्रभाव हुआ कि आपने अवैतनिक रूप से गुरुकुल की सेवा करना आरम्भ कर दिया|

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जब आप गुरुकुल कांगड़ी को अपनी सेवाओं को दे रहे थे तो इन्हीं दिनों आपके मन के अन्दर एक अभिलाषा ने भी जन्म लिया और यह अभिलाषा थी झज्जर में भी शिक्षा की वैदिक ज्योति को जगाने के लिए वहां भी गुरुकुल खोलने की| आपने इस योजना पर खूब विचार करने के पश्चात् इसे कार्य रूप देने की ठानी और फिर इस सम्बन्ध में आपने स्वामी श्रद्धानंद जी से बात की| उनसे सहयोग के लिए प्रार्थना भी की| इस प्रार्थना को स्वीकार करते हुए स्वामी श्रद्धानंद जी ने इसके लिए आर्य प्रतिनिधि सभा पंजाब से सवीकृति लेने के लिए १६ मई सन् १९१५ को प्रस्ताव रखा, जिसे सर्व सम्मति से स्वीकार करते हुए सभा ने झज्जर में गुरुकुल आरम्भ करने का मार्ग खोल दिया| इसके अगले वर्ष ही अर्थात् १९१६ को झज्जर में गुरुकुल का कार्य विधिवत् आरम्भ हो गया और इस गुरुकुल के भवन की आधार शिला भी स्वयं स्वामी श्रद्धानंद जी सरस्वती ने रखी|

पंडित जी ने बड़े परिश्रम से इस गुरुकुल को चलाया और इस गुरुकुल के ब्रह्मचारियों को वेद की शिक्षा दी जाने लगी| कड़े परिश्रम के कारण गुरुकुल में शिक्षा की उत्तम व्यवस्था हुई किन्तु आचार्य भगवान देव जी (स्वामी ओमानंद सरस्वती जी) के आचार्यत्व स्वरूप आने के पश्चात् ही इस गुरुकुल को सर्वत्र ख्याति प्राप्त हुई| सन् १९४२ ईस्वी में पंडित जगदेव सिंह सिद्धान्ती तथा चौधरी छोटूराम जी के अनथक प्रयास से आचार्य भगवानेव जी ने इस गुरुकुल के आचार्य का पद भार सम्भाला| उनके आचार्य पद संभालने पर गुरुकुल नित्य नई ऊँचाइयों को पाने लगा| यह आचार्य भगवान् देव जी की कार्यकुशलता तथा कर्मठता का ही कारण था|

इस गुरुकुल में अब सुदूर क्षेत्रों से भी ब्रह्मचारी वैदिक शिक्षा पाने के लिए आने लगे थे| जहाँ इससे पूर्व मात्र इसे क्षेत्रीय शिक्षा संस्थान के रूप में ही जाना जाता था, अब इस गुरुकुल में सुदूर क्षेत्रों यथा भारतीय क्षेत्रों में हरियाणा, पंजाब, दिल्ली, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, आंध्रप्रदेश, कर्नाटक आदि प्रान्तों के ब्रह्मचारी वैदिक शिक्षार्थ आने लगे, वहां इस में नेपाल, सूरीनाम दक्षिण अमरीका) आदि विदेशों से भी वहां के वेद प्रेमी लोगों की संतान ब्रह्मचारी व्रत की दीक्षा लेकर यहाँ शिक्षा प्राप्ति के लिए आने लगे| इस प्रकार इस गुरुकुल को अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त हो गई|

आचार्य भगवान् देव जी ने १९६९-७० में संन्यास लेकर स्वामी ओमानंद सरस्वती के नाम से कार्य करना आरम्भ कर दिया| इतिहास में उन्हें अत्यधिक रूचि थी, वह जहाँ कहीं भी जाते, इतिहासिक सामग्री की खोज करते रहते| हम ने उन्हें अनेक बार देखा है कि वह हमारे सामने ही कहीं से लाये गए प्राचीन सिक्कों को निकाल कर , उन्हें साफ़ करते रहते थे| अपना खाली समय में वह इस इतिहासिक सामग्री को संजोंने में ही लगे रहते थे| उनके इस व्यवहार से अनेक आर्य लोग उनका उपहास भी उड़ाते थे किन्तु आपने कभी इस और ध्यान ही नहीं दिया और निरंतर अपने इतिहास सम्बन्धी शोध और संकलन में लगे रहे | उन्होंने एक बार बताया कि विश्व में चक्रविक्रम नाम के दो सिक्के इस समय उपलब्ध है| इन सिक्कों को राजा विक्रमादित्य के राज्यकाल में आरम्भ किया गया था| इनमें से एक सिक्का तो विदेश में है और दूसरा सिक्का एक सोने की दूकान पर पडा था, जिसे लेने के लिए बहुत से लोग जाते किन्तु उसके ऊँचे दाम सुनकर वह वहां से खाली ही लौट आये| जब स्वामी जी को इस सम्बन्ध में पता चला तो वह भी उस सुनार के पास गए|

स्वामी जी ने इस सुनार महाराज से चक्र विक्रम सिक्का दिखाने की प्रार्थना की| सुनार ने हंसते हुए स्वामी जी से यूँ कहा, स्वामी जी इस सिक्के को बड़े बड़े लोग देखने के लिए आये , खरीदने की इच्छा भी व्यक्त की किन्तु इस का दाम देने को कोई भी तैयार नहीं हुआ| आप तो साधू हैं, आप इसका मूल्य क्या जानो? आप इस सिक्के को नहीं खरीद सकते, इसलिए देख कर क्या करोगे? स्वामी जी ने कहा कि आप दिखाओ तो सही, न ले पाउँगा तो कम से कम मुझे इतना तो गर्व होगा कि मैने चकर विक्रम सिक्का देखा तो है| बड़ी मुश्किल से स्वामी जी उसे इस बात के लिए तैयार कर पाए | ज्योंही स्वामी जी ने वह सिक्का देखा तो उन्होंने उससे इसका दाम पूछ लिया| उसने कहा आप दाम पूछ कर क्या करोगे, आप इसे नहीं खरीद सकते| स्वामी जी तो जानते थे कि वह कितने दाम मांगता है और इसके लिए पूरी तैयारी के साथ विपुल धनराशि लेकर ही वह आये थे| अत: स्वामी जी ने फिर कहा कि मुझे बता तो दो कि यह कितने मूल्य का है, मैं न भी खरीद पाऊं तो भी मुझे इसके मूल्य का पता तो होना ही चाहिए न| सुनार ने बहुत उंचा दाम लगाते हुए उन्हें इसका दाम बता दिया और स्वामी जी ने तत्काल वह धन राशि निकाल कर उसके सामने रख दी, वह सुनार स्वामी जी के मुख की और ताकता ही रह गया क्योंकि अब यह सिक्का उसके हाथ से निकल चुका था|

इस प्रकार ही १९६५ के युद्ध के थोड़ा पश्चात् स्वामी जी अबोहर आये थे| इस युद्ध में पाकिस्तान फाजिल्का बार्डर को पार कर नगर के निकट तक पहुँच गए थे| इस स्थिति को देखने और वहाँ के हरियाणवी सैनिकों को मिलने, विशेष रुप्प से सेना के पुरोहित आनंद मोहन जी को मिलने के लिए आप फाजिल्का गए| मैं भी उस समय आपके साथ गया था| वहां पर आपको एक हेलमेट भेंट किया गया जो एक सैनिक का था| इसकी विशेषता यह थी कि पाकिसतान के एक सैनिक की गोली इस हेलमेट को एक और से चीरते हुए दुसरी और से पार निकल गई किन्तु उस सैनिक को छुआ तक भी नहीं जिसके सर पर यह सैनिक टोप पहना हुआ था|

इस प्रकार अनेक प्रकार के सिक्के, तोपों के गोलों के खोल, हेलमेट प्राचीन चरखे, हड़प्पा मोहन जोदाडो आदि से प्राप्त वस्तुएं आदि का संकलन कर एक विशाल भवन में आपने संग्रहालय आरम्भ किया| इस संग्रहालय को देखने तथा इस पर शोध करने के लिए अनेक लोग तथा अनेक शोधार्थी समय समय पर इस गुरुकुल में आते ही रहते हैं|

आप ने इस गुरुकुल में एक रसायनशाला तथा औषधालय भी आरम्भ किया| दिन भर अनेक रोगी यहां आते हैं| वैद्य जी को अपना रोग दिखाते हैं और फिर यहीं से औषध ले जाते हैं| आपकी औषध की शुद्धता ही इनकी प्रसिद्धि का कारण है| समय समय पर देश के अनेक भागों में बाढ़ आती थी तो आप अनेक औषध लेकर बाढ़ पीड़ित लोगों के रोगोपचार के लिए जा पहुंचते थे| अनेक भयानक रोगों के इलाज तो आपकी अँगुलियों पर ही रहते थे| इस कारण रोगोपचार के लिए भी इस गुरुकुल को खूब ख्याति प्राप्त हुई| इस गुरुकुल में एक बहुत बड़े हाल में देश के तथा आर्य समाज के वीर शहीदों के चित्र लगाए गए हैं| इस भवन का नाम ही शहीद भवन रखा गया है| देखने वालों को देश के लिए कुछ करने का भारी उत्साह यहाँ से मिलता है|

स्वामी ओमानंद जी हरियाणा आर्य प्रतिनिधि सभा, परोपकारिणी सभा अजमेर तथा सार्वदेशिक आर्य प्रतिनिधि सभा दिल्ली के प्रधान भी रहे| इन पदों पर रहते हुए इन्होंने आर्य समाज की खूब सेवा की| हरियाणा में तो कोई कार्य एसा था ही नहीं जो आपकी सलाह के बिना संपन्न होता हो| इस प्रकार की आपकी साख उस समय के राजनेताओं में बनी हुई थी|

इस गुरुकुल से अनेक स्वाधीनता सेनानियों का भी जन्म हुआ तथा विश्विख्यात् भारतीय पहलवान् चन्दगीराम जी ने भी इस गुरुकुल की मिट्टी से ही यह कार्य सीखा था और वर्त्तमान में विश्व विख्यात् योग गुरु स्वामी रामदेव जी भी इस गुरुकुल की ही देन हैं| गुरुकुल कालवा के पूर्व आचार्य, आर्य प्रतिनिधि सभा हरियाणा के पूर्व प्रधान और सार्वदेशिक आर्य प्रतिनिधि सभा के पूर्व प्रधान स्वर्गीय आचार्य बलदेव जी का सम्बन्ध भी इस गुरुकुल से ही रहा है| स्वामी दयानद जी की उत्तराधिकारिणी सभा परोपकारिणी सभा अजमेर के पूर्व प्रधान पंडित धरमवीर जी भी इस गुरुकुल से ही निकले थे| पूरे विश्व में प्राचीन लिपियों में एक लिपि ब्राह्मी लिपि को पढ़ने वाला केवल एक ही व्यक्ति जीवित है और इस गुरुकुल को गौरव है कि वह व्यक्ति विरजानंद दैवाकर्नी जी इस गुरुकुल के ही वर्तमान में एक आचार्य है| आजकल आचार्य विजयपाल जी के नेतृत्व में यह गुरुकुल वैदिक शिक्षाओं के प्रसार र्मे लगा है|

इस प्रकार इस गुरुकुल ने अपने इस छोटे से काल में जो उपलब्धियां प्राप्त कीं हैं, उनके कारण इस गुरुकुल की ख्याति विश्व भर में है और निरंतर आगे और आगे ही बढ़ती जा रही है| आर्यों को इस गुरुकुल पर गर्व है| चाहे भूभाग तथा भवनों की दृष्टी से यह गुरुकुल छोटे से रूप में ही दिखाई देता है किन्तु इस की गौशाला बताती है कि यह गुरुकुल बहुत बड़ा है| विधा और वैदिक संस्कृति का प्रचार जो इस गुरुकुल से हुआ है, वह इसके बहुत बड़े रूप को दिखाता है| यह एक गुरुकुल नहीं अपितु एक विश्वद्यालय के समकक्ष संस्था है| इस गुरुकुल के प्रकाशन विभाग से भी उच्चकोटि की पुस्तकें प्रकाशित होती रही हैं और हो रही है| इसकी पत्रिका में भी उच्चकोटि के लेख आते हैं|

डॉ. अशोक आर्य
पॉकेट १/ ६१ रामप्रस्थ ग्रीन से, ७ वैशाली
२०१०१२ गाजियाबाद उ. प्र. भारत
चलभाष ९३५४८४५४२६
e mail [email protected]

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1 टिप्पणी
 

  • Bharat Kumar

    नवंबर 3, 2020 - 7:39 pm

    Bahut hi sundar

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