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हाड़ोती पुरातत्व दर्शनः शिव मंदिर भंडदेवरा, रामगढ़

राजस्थान का बारां जिला जो अप्रैल 1992 में कोटा जिले से प्रथक कर नया जिला गठित किया गया पुरातत्व संपदा से भरपूर है। ये स्थल जहां पुरातत्व की दृष्टि से विशेष महत्व रखते हैं वहीं पर्यटन का भी महत्वपूर्ण आधार हैं।
बारां जिला मुख्यालय से किशनगंज से पहले एक रास्ता रामगढ़ की ओर जाता है जो लगभग 40 किमी. दूरी पर है। रामगढ़ में पहाड़ की तलहटी में स्थित है यह मंदिर। शैवमत के तांत्रिक परंपरा का यह मंदिर नागर शैली में निर्मित मध्यकालीन वास्तु कला का उत्कृष्ट एवं अद्वितीय नमूना है।

पंचायतन शैली का पूर्वाभिमुख मंदिर मूर्तियों के अजायबघर से कम नहीं है। यहां से प्राप्त शिलालेख से ज्ञात होता है की मंदिर का निर्माण मालवा के नागवंशीय शासक मलयवर्मन ने 10वीं शताब्दी में करवाया था। उसने युद्ध में शत्रु पर विजय के उपलक्ष्य में अपने इष्टदेव शिव को समर्पित यह मंदिर बनवाया था। आगे चल कर 1162 ई. में मेडवंशीय क्षत्रिय शासक त्रिश वर्मा ने मंदिर का जीर्णोधार करवाया था।

माना जाता है की 10वीं शताब्दी में इस अंचल में शैवमत की वाममार्गी शाखा का प्रभाव था जो मोक्ष के लिए भोग से तृप्ति को आवश्क मानते थे। यही वजह रही कि मंदिर में आलिंगन एवं रतिक्रियाओं से युक्त मूर्तियों का भी अन्य मूर्तियों के साथ – साथ अंकन किया गया। प्रेमाशक्त मूर्तियों के कारण इस मंदिर को ‘ मिनी खजुराहो ‘ कहा जाता है।

मंदिर के बाह्य भाग की दीवारें, सभामंडप, स्तंभ, छत, अंतराल, गर्भगृह की द्वार शाखा सभी कुछ कलात्मक मूर्तियों से जड़ित हैं। मंदिर का सभामंडप वर्तुलाकार अर्थात (ढलवा छत) है जो कलात्मक आठ खंभों पर टिका है। इन पर किन्नर, कीचक, विद्याधर, अप्सराएं, देवी, देवता, कामकला के विभिन्न आसनों की युगल मिथुन मूर्तियां उत्कीर्ण हैं। मूर्तियों की मदभरी आंखें, उन्नत उरोज, पतली कमर,पैरों में नूपुर, गले में हार,कानों में कुंडल और कलाई में कंगन धारण किए स्वरूपों को इतना आकर्षक बना दिया है की अपलक देखते रह जाएं। दक्षिण दिशा में पार्श्व लिंद और श्रृंगार चौकी स्थित है। पूर्व रथिका को छोड़ कर तीनों दिशाओं की रथिकाएं टूट गई हैं। काफी मूर्तियां समय – समय पर चोरी की जा चुकी है।

जीर्णशीर्ण मंदिर के जीर्णोद्धार के लिए पिछले कुछ वर्ष पूर्व प्रयास किए गए पर कुछ ही कार्य किया जा सका और बीच में रोक दिया गया। मंदिर आज भी अपनी अद्भुत मूर्ति शिल्प और स्थापत्य की दृष्टि से दर्शनीय है। मंदिर पुरातत्व विभाग के अधीन संरक्षित स्मारक है। अनेक पर्यटक इसे देखने के लिए जाते हैं।

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