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कानून का हथौड़ा हिन्दू मान्यताओँ और परंपराओं पर ही क्यों चोट करता है?

सुप्रीम कोर्ट ने धार्मिक मान्यता व मंदिर को ले कर गजब बात कही! पूछा कि किस संवैधानिक अधिकार से सबरीमाला मंदिर में महिला प्रवेश पर पाबंदी लगी हुई है? जब बताया गया कि यह परंपरा है तो सुप्रीम कोर्ट बेंच के जस्टिस दीपक मिश्रा ने कहा क्या बोर्ड के पास सबूत है कि डेढ़ हजार साल पहले मंदिर में महिलाएं नहीं जाती थीं? अब इस पर भला क्या जवाब होगा? कहीं-कभी यह जवाब नहीं होता है कि धर्म-कर्म की आस्था व परपंरा में सौ या हजार साल पहले फलां आदेश हुआ था तो उसके पीछे फलां वैज्ञानिक तर्कसंगतता थी?

इसलिए कि धर्म और आस्था का मामला ही ऐसा है। सुप्रीम कोर्ट ने पिछले महीने भी आदि शैव संगम के मामले में कहा था कि यदि कोई परंपरा, मान्यता, कस्टम धार्मिक स्वतंत्रता के आर्टिकल 25 व 26 से इतर लगती है तो संवैधानिक वैधानिकता में सभी धार्मिक आस्थाओं व व्यवहार को जांचा जाएगा। मतलब आजाद भारत ने जो संविधान बनाया है, 65 साल से जिसमें हम हैं वह सैकड़ों- हजारों सालों से चली आ रही मान्यता, परंपरा से ऊपर है। वह पहले है और फिर धर्म, आस्था, परंपरा, मान्यता, रिवाज, व्यवस्था आदि है।

अन्य शब्दों में आज का संविधान सौ, हजार साल पुरानी मान्यता को बदल सकता है। संविधान बढ़ा है और धर्म उसके दायरे में। कोई हर्ज नहीं है। वक्त के अनुसार अपने आपको बदलना, नई व्यवस्था बनाना इंसान को, समाज को कुल मिला कर आगे बढ़ाता है। इसी के चलते सती प्रथा से ले कर छुआछूत की कई बातों से हमने मुक्ति पाई थी।

पर यहां दो बातें हैं। एक, तब सभी धर्मों की मान्यताओं, पंरपराओं पर संविधान का डंडा समान रूप से चलना चाहिए। यदि अदालत और कानून सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश की समान व्यवस्था करा रहा है तो मसजिद में बिना पर्दे के, पुरुषों के साथ, उनके बीच रहते हुए मुस्लिम महिला के नमाज पढ़ने के हक की व्यवस्था भी क्या इस संविधान को नहीं बनवानी चाहिए?

दूसरे, यदि किसी धर्म में किसी सोच, आस्था, परंपरा के चलते कोई व्यवस्था है तो उसके औचित्य व तर्कसंगतता में हजार,पांच सौ साल पुरानी भावना को क्या 50-60 साल पुराने संविधान के हवाले खत्म किया जा सकता है? यह सवाल इसलिए भी है क्योंकि आधुनिक विचार में धर्म कुल मिलाकर अफीम की अवधारणा लिए हुए है। सो अब आप या तो धर्म को ही खत्म कर दें। जैसे कम्युनिस्ट शासन व्यवस्था में कई देशों ने किया। लेकिन वहां का अनुभव यह है कि कम्युनिस्ट फेल हुए और आस्था जीती। सोवियत संघ से ले कर पूर्व योरोप के तमाम कम्युनिस्ट देश ढह गए। वह एक तरह से आस्था में इंसान के आस्थावान होने की जीत थी।

इसलिए धर्म याकि आस्था इंसान की प्राणवायु है। और इस आस्था में अतार्किक मान्यताएं, परंपराएं ढेरों हैं। हिसाब से उनमें सुधार का कारगर तरीका समाज, धर्म के भीतर आंदोलनों, समाज सुधारों का है। भारत में राजा राममोहन राय से ले कर गांधी सबने समाज सुधार से ही हिंदू धर्म की कई परंपराओं को खत्म कराया। मतलब सुधार कानून से नहीं समाज-धर्म के अपने अंदरूनी मेकेनिज्म से हुआ। बाकी सभ्यताओं में भी धार्मिक, सामाजिक पुनर्जागरण और सुधारों के आंदोलन से धर्म व उसकी मान्याताएं बदली। उसी में लोग बदले, देश बदले।

तथ्य है कि यदि पश्चिम में संवैधानिक तौर पर, राष्ट्र-राज्य के खाके में यदि बराबरी बनवाने, सभी को हक देने के काम हुए हैं तो ऐसा सभी धर्मों के प्रति समभाव से हुआ है। फ्रांस ने बराबरी के अपने संविधान के चलते मुस्लिम महिलाओं को बुर्के से बाहर निकाला। बुर्के पर पाबंदी लगाई। भारत में कई लोग कहते हैं कि फ्रांस ने ऐसा किया तभी उसके नतीजे उसे भुगतने पड़ रहे हैं। मणिशंकर अय्यर जैसे ज्ञानी भी यह थीसिस देते हैं।

तभी सवाल है कि उम्र, लिंग या ऐसे ही किसी आधार पर भेदभाव यदि संविधान विरोधी है तो क्या कोई अदालत या सुप्रीम कोर्ट भारत में बुर्के पर पाबंदी का फैसला दे सकता है? भारत में सिविल सोसायटी हो या प्रगतिशील जमात या अदालत सबमें महिलाओं के प्रति हक को ले कर बहुत हल्ला होता है लेकिन उस हल्ले में मुस्लिम महिलाओं के हक का जिक्र होते ही सांप सूंघ जाता है। क्यों? क्यों भारत के संविधान व या सुप्रीम कोर्ट को मुस्लिम महिलाओं के बराबरी के हक, उसके बुर्के में बंद होने की बात पर सांप सूंघता है?और यह बड़ी नहीं एक बहुत सामान्य हकीकत है।

हकीकत यह भी है कि सबरीमाला मंदिर हो या कामाख्या मंदिर या हिंदू धर्म की और कोई पुरानी बेढब बात, उन सब पर सुर्खियां ऐसे बनती हैं मानो दुनिया का सबसे पुरातनपंथी, दकियानूसी धर्म यदि कोई है तो वह हिंदू धर्म है। कोर्ट-कचहरी, मीडिया में आए दिन इस धर्म का फलूदा बनाते हुए कोड़े चलाए जाते हैं। इसमें भी हर्ज नहीं है। इसलिए कि इससे धर्म के बेमिसाल होने की खूबी झलकती है तो वक्त अनुसार सुधरने का अवसर भी बनता है। बावजूद इसके यह तो खटकता है कि हिंदू आस्था, मान्यता को ले कर यदि कानून के कोड़े चलते हैं तो बराबरी के भाव में क्या वैसा अन्य धर्मों की गलत मान्यताओं, आस्थाओं, रिवाज के मामले में नहीं होना चाहिए?

जो हो, धर्म में आस्था, विश्वास और मान्यता का मामला पेचीदा व उलझा हुआ है। इस पेचीदगी को समझते हुए ही कार्यपालिका, विधायिका, न्यायपालिका याकि संविधान को विचार करना चाहिए। अब यह बात कहना आसान है और व्यवहार में बहुत मुश्किल।

साभार-http://www.nayaindia.com/ से

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