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हरि सिंह गौर : हिंदू कोड बिल के जनक जिनके काम आज भी बड़े-बड़े वकीलों को रास्ता दिखाते हैं

भारत में सुप्रीम कोर्ट बनाने की बात सबसे पहले कहने वाले मशहूर न्यायविद् हरि सिंह गौर ने मध्य प्रदेश के सागर को देश की राजधानी बनाने का प्रस्ताव भी रखा था।

‘कुछ ही लोग अपने औचित्य को साबित कर पाते हैं. कानूनविद डॉक्टर हरि सिंह गौर उनमें से एक थे.’ यह बात चर्चित लेखक पी राजेश्वर राव ने अपनी किताब ‘द ग्रेट इंडियन पेट्रियट्स’ में डॉक्टर हरि सिंह गौर के बारे में कही है. हरि सिंह गौर के कई परिचय हैं. वे मशहूर न्यायविद् थे, शिक्षा के क्षेत्र में भी उनका योगदान बहुत बड़ा है और उन्हें एक असाधारण समाज सुधारक के तौर पर भी याद किया जाता है. मोती लाल नेहरू का ज़िक्र तो आज भी हो जाता है, लेकिन उनके समकक्ष और बेहद होशियार व काबिल हरि सिंह गौर के बारे में अब कम ही बात की जाती है.

26 नवंबर, 1870 को हरि सिंह का जन्म मध्य प्रदेश के सागर में हुआ था. इनके पिता पुलिस विभाग के कर्मचारी थे. मैट्रिकुलेशन की परीक्षा में अव्वल आने के बाद, इन्हें आगे की पढ़ाई के लिए कैम्ब्रिज भेजा गया. वहां उन्हें रंगभेद का सामना करना पड़ा. एक बार तो ऐसा भी हुआ कि गणित और अंग्रेज़ी कविताओं की प्रतियोगिताओं में वे अव्वल आए, पर रंगभेद की नीति के चलते इन प्रतियोगिताओं के नतीजे रोक लिए गए.

लंदन में हरि सिंह ने कानून की पढ़ाई की और वहीं से डीलिट की डिग्री भी हासिल की. कम ही लोगों को मालूम होगा कि जब दादाभाई नौरोजी, जो ब्रिटेन में भारतीय मूल के पहले सांसद थे, ने संसद का चुनाव लड़ा था तो हरि सिंह ने उनके पक्ष में प्रचार किया था. भारत आने के बाद कुछ महीने के लिए वे डिप्टी कलेक्टर की नौकरी पर रहे. फिर वकालत करने के लिए हरि सिंह ने नौकरी छोड़ दी. इसके बाद उन्होंने इलाहाबाद, मध्य प्रांत और कलकत्ता के उच्च न्यायालयों में वक़ालत की.

यह वह दौर था जब वकील अक्सर राजनीति में भी हाथ आज़माते थे. हरि सिंह ने 1918 में नागपुर नगरपालिका का चुनाव लड़ा. जीतकर वे अध्यक्ष बने और काफ़ी नाम कमाया. 1920 में उन्होंने इंडियन नेशनल कांग्रेस की सदस्यता से इस्तीफ़ा दे दिया. तब वे पार्टी के नरम दल के समर्थक थे. 1921 से लेकर 1935 तक हरि सिंह सेंट्रल असेंबली के सदस्य रहे. उसी दौरान साइमन कमीशन भारत आया था. हरि सिंह ने कमीशन के सामने भारत को डोमिनियन दर्ज़ा देने का प्रस्ताव रखा. इसका अर्थ यह था कि आंतरिक मामलों में भारतीयों को स्वशासन का अधिकार दिया जाए. ब्रिटिश सरकार ने इसे नामंजूर कर दिया.

क्या आप जानते है कि भारतीयों को सिविल मैरिज एक्ट हरि सिंह की देन है? महिलाओं की आज़ादी के लिए भी उन्होंने बाल विवाह विरोधी कानून में लड़कियों की उम्र को 12 साल से 14 साल करने का प्रस्ताव दिया था. सरकार ने इसे बढ़ाकर 13 साल किया था. इसी प्रकार संपत्ति के अधिकार पर हरि सिंह का काम आज भी वकीलों द्वारा पढ़ा जाता है. उन्होंने ही महिलाओं के वकील बनने का रास्ता भी सुनिश्चित किया था.

हिंदू कोड बिल पर उनका काम आज भी एक प्रामाणिक दस्तावेज़ माना जाता है. इस क़िताब में उन्होंने लगभग 500 अन्य क़िताबों और लगभग सात हज़ार केसों का हवाला दिया है. ऐसा कोई हिंदू शास्त्र और केस नहीं छोड़ा, जो इसमें नहीं मिलता हो. हिंदू की परिभाषा से लेकर विवाह, संपत्ति, तलाक़ सहित वे सारी बातें जो किसी हिंदू के जीवन में घटित हो सकती हैं, उनका कानूनी पक्ष इस क़िताब में मिलता है. उस दौर में बहुविवाह को लेकर हिंदू पुरुष और महिलाओं के बीच अंतर था. डॉक्टर हरि सिंह गौर ने पुरुषों के लिए बहुविवाह जायज़ और महिलाओं के लिए ग़ैरक़ानूनी माना था.

लार्ड मैकाले के द्वारा प्रदत्त भारतीय दंड संहित (इंडियन पीनल कोड) की व्याख्या पर भी हरि सिंह का काम काफ़ी अहमियत रखता है. कानून का होना एक बात है और उसकी व्याख्या अलग बात है. इस सिद्धांत को मानते हुए, हरि सिंह ने भारतीय दंड संहिता के प्रावधानों को काफ़ी कठोर मानकर इनमें बदलाव की वक़ालत की थी. मिसाल के तौर पर उन्होंने मुजरिमों को सज़ा के तौर पर अत्यधिक लंबी कैदों का विरोध किया. उनकी नज़र में किसी कैदी को एकांतवास में रखना ग़ैरक़ानूनी बात है. आपको याद दिला दें, बाद में, जस्टिस वीआर कृष्णा अय्यर ने कहा था कि कैदियों के भी मूलभूत अधिकार होते हैं.

ब्रिटिश शासन के दौरान भारत में सर्वोच्च न्यायालय नहीं था. तब सिर्फ़ हाई कोर्ट हुआ करते थे. हाई कोर्ट के फ़ैसलों को लन्दन की प्रिवी काउंसिल में चुनौती दी जाती थी. यही एक तरह से सुप्रीम कोर्ट था. डॉक्टर हरि सिंह और मोती लाल नेहरु सरीखे वकील प्रिवी काउंसिल में वकालत करने के लिए मशहूर थे. संभवतया, हरी सिंह पहले वकील थे जिन्होंने भारत में सर्वोच्च न्यायालय की बात उठायी थी.

1944 में डॉक्टर हरि सिंह हिंदुस्तान आये और इंडियन नेशनल कांग्रेस ने इन्हें आज़ाद हिन्द फ़ौज के सिपाहियों का केस लड़ने का ज़िम्मा दिया. दिल्ली के लाल किले में आज़ाद हिंद फ़ौज के सैनिकों पर हुए कोर्ट मार्शल के ख़िलाफ़ उन्होंने जोरदार पैरवी की. हरि सिंह ने कहा कि ब्रिटेन की सरकार ने उनके ख़िलाफ़ खड़े हुए आयरलैंड और कनाडा के सैनिकों को योद्धा का दर्ज़ा दिया था और उन्हें योद्धा इसलिए माना गया कि वे अपनी मात्रभूमि के लिए इंग्लैंड की सरकार के विरुद्ध लडे थे. लेकिन जब आईएनए सिपाही अपने देश प्रेम के आवेग में उठ खड़े हुए तो सरकार सारे क़ायदे कानून भूल गयी है. हरी सिंह ने मांग की कि सरकार इन्हें युद्ध बंदी मानकर इनसे वैसा बर्ताव करे और न कि इन्हें बाग़ी माना जाए.

1946 में कांग्रेस ने हरि सिंह की काबिलियत देखकर उन्हें संविधान सभा का सदस्य बनाया. उनकी इच्छा थी कि उनके गृहनगर सागर (मध्य प्रदेश) को देश की राजधानी बनाया जाए. इसके पीछे उनका अपना तर्क था. हरी सिंह का मानना था कि एक तो सागर भौगोलिक रूप से भारत के मध्य में स्थित है और वहां की जलवायु भी माक़ूल है.

डॉक्टर हरी सिंह दिल्ली और नागपुर विश्वविद्यालयों के पहले वाइस चांसलर नियुक्त किये गए थे. वक़ालत के दौरान कमाए गए धन और संपत्ति को उन्होंने ट्रस्ट में तब्दील कर अपने पास इसका सिर्फ़ पांचवां हिस्सा रखा. इस ट्रस्ट की मदद से उन्होंने सागर यूनिवर्सिटी की स्थापना की जिसे आज उनके ही नाम से जाना जाता है.

साभार https://satyagrah.scroll.in/ से

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