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क्या पृथ्वीराज चौहान की अस्थियां शेरसिंह राणा भारत लाया है?

यदि ऐसा है तो फूलन के हत्यारे का नाम सम्मान से लिया जायेगा
जब से व्हाट्स एप्प नाम का हरे जादू का पिटारा दुनिया में ईजाद हुआ है, तब से नाना प्रकार का ज्ञान, जानकारियां, सूचनायें , चरित्र हत्या, दुष्प्रचार से भरपूर ऑडियो-वीडियो क्लीप्स, कमेंट्स , किस्से-कहानियां हमारे दिमाग को भिन्नाभोट किये जा रहे हैं। ऐसी ही एक जानकारी हाल ही में मेरे देखने में आईं तो लगा कि इसे आमजन से साझा करना चाहिये। मैं इस पर अपना कोई मत प्रकट नहीं कर रहा हूं, लेकिन इसकी सच्चाई जानने की जिज्ञासा जरूर रखता हूं। सार रूप में वह बात यह है कि एक वीडियो मैंने देखा , जिसमें बताया गया है कि डकैत से सांसद बनी फूलन के प्रेमी-सह-हत्यारे ने देश की चर्चित व अपेक्षाकृत सुरक्षित माने जाने वाली तिहाड़ जेल से फरार होकर अफगानिस्तान जाकर देश के गौरव पृथ्वीराज चौहान की अस्थियां निकाली और भारत लाकर बाकायदा एक मंदिर बनवाकर उसमें स्थापित कर दीं।

इस प्रसंग को आगे बढ़ाने से पहले मैं इस बात का खुलासा कर दूं कि निजी रूप से मैं सोशल मीडिया पर बिखरे ज्ञान को तवज्जो नहीं देता, अपवाद छोडक़र । दूसरा यह भी कि व्हाट्स एप्प पर आ रहे ज्यादातर ऑडियो-वीडियो को बिना देखे-सुने डिलीट कर देता हूं। जो चुनिंदा देख-सुन पाता हूं , उनमें से इस वीडियो ने मुझे सोचने पर मजबूर तो किया , जिस वजह से मैं इसे सार्वजनिक कर इस पर बहस आमंत्रित कर रहा हूं और अनुरोध भी कर रहा हूं कि इसकी सचाई तक कोई पहुंचे तो कृपया मेरा ज्ञानवर्धन भी करें। संभव है, यह वीडियो बेहद पुराना हो और आप लोगों में से ज्यादातर ने देख रखा हो। बहरहाल।

इसमें बताया गया है कि मूलत: रुडक़ी के रहने वाले राजपूत पंकजसिंह बनाम शेरसिंह राणा ने 25 जुलाई 2001 को दिल्ली के सरकारी आवास में तत्कालीन सासंद फूलन की गोली मारकर हत्या कर दी थी। यह हत्या उसने अस्सी के दशक में उ.प्र. के बेहमई में फूलन द्वारा 22 राजपूतों को एक पंक्ति में खड़ा कर गोली मारकर हत्या कर देने के प्रतिशोध स्वरूप की थी। बाद में फूलन ने आत्म समर्पण कर दिया था और 11 साल जेल मेें बिताने के बाद मुलायम सिंह यादव ने लोकसभा टिकट देकर उसे सांसद बना दिया था।

वहीं संभवत: तयशुदा स्क्रिप्ट के मुताबिक शेरसिंह ने पहले फूलन से नजदीकी बढ़ाई, उससे कथित तौर पर शादी भी की और अंतत: एक दिन मौत के घाट उतार दिया। घटना के दो दिन बाद ही शेरसिंह ने उत्तराखंड पुलिस के सामने आत्म समर्पण कर दिया, जहां से बाद में उसे जेल भेज दिया गया। बताते हैं तब उसने फिल्मी अंदाज में कहा भी कि तिहाड़ की सलाखें उसे ज्यादा देर रोक नहीं पायेंगी । यह सही साबित हुआ करीब ढाई साल बाद। 27 फरवरी 2004 को उत्तराखंड पुलिस की वर्दी में तीन जवान कोर्ट वारंट के सात तिहाड़ आये और अपने यहां पेशी का ऑर्डर दिखाकर शेरसिंह को ले गये । जब वह नहीं लौटा तो असलियत पता चली। यह और बात है कि 17 मई 2006 को शेरसिंह कोलकाता में फिर से पकड़ लिया गया और तब से तिहाड़ में ही है। इसी बीच उसने अफगानिस्तान जाकर अस्थियां लाने का कथित पराक्रम किया।

इस वीडियो में बताया गया है कि पहले उसने रांची से फर्जी पासपोर्ट बनवाया और कोलकाता चला गया । वहां से बांग्लादेश का वीसा बनवा कर वहां चला गया। वहां बाकायदा यूनिवर्सिटी में एडमिशन ले लिया। फिर वहां से अफगानिस्तान का वीसा बनवाकर काबुल पहुंच गया। वहां करीब तीन माह रहकर उसने पृथ्वीराज चौहान की समाधि ढंूढी और रैकी की। सवाल यह है कि जो काम सरकार को करना चाहिये था, वह शेरसिंह ने क्यों किया? इसका जवाब भी इस वीडियो में है।

बताया जाता है कि अफगानिस्तान में जहां मोहम्मद गोरी की कब्र है, उसके पास ही पृथ्वीराज चौहान की समाधि भी है। कब्र देखने आने वालों के लिये यह अनिवार्य है कि वे पहले चौहान की समाधि को जूते मारे, फिर कब्र के दर्शन करें। इसके लिये वहां पर बाकायदा जूते भी रखे गये । इस तथ्य ने शेरसिंह को राजपूत होने के नाते बैचेन किया हुआ था। इसी तथ्य से तत्कालीन विदेश मंत्री जसवंतसिह भी परेशान हुए थे, जो कंधार विमान अपहरण के वक्त अफगानिस्तान गये थे । वहां तालिबान सरकार ने ही उन्हें यह बात बताई थी। वे भारत लौटकर भी कुछ कर नहीं पाये, जबकि इस घटना का जिक्र मीडिया में हुआ था।

शेरसिंह राणा ने अंतत: अवसर देखकर एक रात समाधि से अस्थियां निकाल लीं और भारत लौट आया। इस पूरे घटनाक्रम की उसने वीडियो शूंिटंग भी की, जो इसमें दिखाई गई है। भारत लौटकर उसने अपनी मां की मदद से गाजियाबाद के पास तिलखुआ में पृथ्वीराज चौहान का मंदिर बनवाया और अस्थियों को वहां सुरक्षित रख दिया। हालांकि तब से लगाकर अब तक सरकारी या गैर सरकारी स्तर से इस बात की पुष्टि अभी तक नहीं हो पायीं, क्योंकि इससे सरकार की किरकिरी भी होती ही।

इस वाकये के कुछ ही समय बाद कोलकाता से ही शेरसिंह राणा को 17 मई 2006 को गिरफ्तार भी कर लिया गया, जिसमें भी यह लगता है, जैसे राणा ने खुद ही ऐसा करवाया हो , क्योंकि इतना तो वह भी जानता था कि इस तरह तो उसे चोरों का जीवन ही जीना पड़ेगा , लेकिन फिर से जेल चला गया तो एक दिन छूट जाने का अवसर भी रहेगा ही।

तिलखुआ के मंदिर में रखी अस्थियाों की सत्यता परखना कोई मुश्किल बात नहीं है । पुरात्त्व विभाग आसानी से इतना तो पता कर ही सकता है कि वे कितनी पुरानी हैं? फिर, खुद भारत सरकार अफगानिस्तान सरकार से भी इसकी असलियत मालूम करवा सकती है। हालांकि , यह जरूर कठिन होगा, क्योंकि तब वहां की सरकारी मिट्टी पलीद होगी। यदि यह तथ्य किसी तरह प्रमाणित होता है तो शेरसिंह राणा की हत्या की सजा भले ही माफ न की जाये, जेल से फरार होने की सजा भी कम न की जाये, लेकिन देश का गौरव जान की बाजी लगाकर लौटाने का सम्मान तो हर हाल में मिलना चाहिये। जंग का कोई नियम नहीं होता, कोई मर्यादा नहीं होती और लुटेरों, आततायियों, आक्रमणकारियों के साथ तो बिलकुल नहीं , तब शेरसिंह शाबाशी से वंचित कैसे किया जा सकता है? आखिरकार आजादी के गरम दल व गरम खून के सेनानियों ने भी अंग्रेजों से लोहा लेने में अंग्रेजों के तौर-तरीके ही अपनाये थे , जो कि कतई गलत नहीं थे तो शेेरसिंह का यह दुस्साहसिक कदम भी सराहा जाना चाहिये।
अपने इस अनुभव पर जेल से ही राणा ने किताब भी लिखी है-
जेल डायरी : तिहाड़ से काबुल-कंधार तक । एंड ऑफ बेंडिड क्वीन फ़िल्म भी राणा की बायोपिक है , जिसमें नवाजुद्दीन सिद्दीकी ने मुख्य भूमिका निभाई है ।]

शेर सिंह राणा की हैरत अंगेज़ कहानी : https://www.youtube.com/watch?v=sqvpp_tpWEY

साभार। – http://mediawala.in/



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