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महबूबा मुफ़्ती ने जो कहा है क्या उससे केन्द्र सरकार भी से सहमत है ?

इसी २ फरवरी के दिन जम्मू कश्मीर की मुख्य मंत्री महबूबा मुफ़्ती जी ने विधान सभा में कहा है “मैंने कई बार वताने की कोशिश की, सेल्फ रूल कोई आउट साइड भारतीय संविधान नहीं है , उस की खूबसूरती तो यही है, जो सेल्फ रूल है यह जम्मू कश्मीर को पूरी दुनिया के सामने खोल देता है यह दोनों कश्मीरों को मिलाता है पर कहीं भी हमारे मुल्क के संविधान से अलग नहीं है, सार्वभौमिकता का मतलब समजौता नहीं नहीं होती,…. हमारे संविधान में.. इतना लचीलापन है कि हम जम्मू कश्मीर की अपेक्षाओं को पूरी तरह से उस में डाल सकते हैं और हमें कुछ भी नहीं करना होगा, कहीं भी कॉमा, पूर्णविराम कुछ भी बदलने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी।

यहाँ सक्रिय सभी समूहों पे हम सब की सहमति है, उस में बीजेपी – पीडीपी –एनसी- पेंथर्स – गुज्जर नेता – बकरवाल- पहाड़ी नेता – कश्मीरी पंडित – सब ने दस्तखत किए है !. एक वक्त होता था जब कहीं मुठभेड़ होती थी तो चार-पाँच गाँव के लोग छोड़ कर चले जाते थे आज एन्काउंटर होता है चार –चार पाँच- पाँच गाँवों से लोग आ के पत्थर मारते हैं!”

महबूबा जी ने जिस तरह से भारत के जम्मू कश्मीर राज्य की कश्मीर- घाटी की स्थिति को बयान किया है उस से साफ़ जाहिर होता है कि कश्मीर घाटी में आज के दिन हो रही घटनाओं को हलके से नहीं लिया जा सकता है! यह बातें महबूबा जी ने किसी आम जन सभा में नहीं कहीं है बल्कि उन्होंने यह विधान सभा में कहा है और वो भी उस समय जब २७ जनवरी के दिन शुपियाँ में सेना पर हमला होने के बाद गोली चलने से 3 स्थानीय युवकों की मृत्यु हो जाने पर पुलिस द्वारा लिखी गई एफआईआर पर विवाद उग्र रूप ले चुका था।

१ मार्च २०१५ को जब मुफ़्ती मोहमद जी ने बीजेपी के साथ मिल कर सत्ता की डोर पकड़ी थी तो आशा बंधी थी कि अब इस राज्य को शांति और स्थिरता के मार्ग पर ले जाने के प्रयासों को एक नई दिशा मिलेगी पर २ फरवरी को महबूबा जी ने जब विधान सभा को यह बताया कि “एक वक्त होता था जब कहीं एन्काउंटर होता था तो चार- चार पाँच- पाँच गाँव के लोग गाँव छोड़ कर चले जाते थे, आज एनकाउंटर होता है चार –चार पाँच- पाँच गांवों से लोग आ के पत्थर मारते हैं ” तो भारत सरकार तो क्या एक साधारण समझ वाले व्यक्ति के लिए भी चिंता की स्थिति होनी चाहिए थी!

ऐसे ही जम्मू कश्मीर की मुख्यमंत्री महबूबा जी ने विधान सभा में अनुच्छेद ३७० के बारे में समय समय पर जो विचार प्रक्ट किए है और यहाँ तक कहा है कि जो कोई भी अनुच्छेद ३७० को हटाने की बात करता है वह राष्ट्र विरोधी है !

यहाँ तक पीडीपी के सेल्फ रूल प्रस्तावों की बात है उन के वारे में विस्तार से बात करने के बजाए यहाँ पर सिर्फ जम्मू कश्मीर सेल्फ रूल २००८ में लिखी गई धारा 58 से ही सेल्फ रूल के वारे में काफी कुछ समझा जा सकता है जिसमें कहा गया कि “ सेल्फ रूल जो है वह भारत राष्ट्र से ( जम्मू कश्मीर के लिए) अटोनोमी (स्वायतता ) की बात करता है; जब कि अटोनोमी ( नेशनल कांफ्रेंस के विचार से ) जम्मू कश्मीर सरकार ( राज्य सरकार) के लिए भारत सरकार (केन्द्र सरकार) से स्वायतता की वात करती है” ! ऐसे ही धारा – 59 में कहा गया है कि : “ Autonomy जम्मू कश्मीर सरकार के भारत सरकार के संधर्व में सशक्तिकर्ण की वात करती है जब कि सेल्फ रूल जम्मू कश्मीर के लोगों के भारत राष्ट्र के संधर्व में सशक्तिकरण की बात करता हैं !” “ऐसे ही धारा ६० कहती है कि स्वायत्तता में किसी प्रकार से सीमाओं (भौगोलिक) का भाग नहीं होता जब कि सेल्फ रूल में भौगोलिक सीमाओं का भाग है!” इस लिये महबूबा मुफ़्ती जी का विधान सभा में यह कहना कि उन्होंने कई कई बार बताने की कोशिश की, सेल्फ रूल कोई आउट साइड indian constitution नहीं है , कहीं भी हमारे मुल्क की constitution से comropmise नहीं होती, sovreignity compromise नहीं होती, क्योंकि जो बातें वे कहते हैं सेल्फ रूल में है उस से जम्मू कश्मीर की aspirations को पूरी तरह से संबिधान में डाल सकते है। और हमें कुछ भी नहीं करना होगा, कहीं भी coma – fullstop कोई भी change करने की जरूरत नहीं पड़ेगी, यहाँ तक कि जम्मू कश्मीर की empowerment की बात है या जम्मू कश्मीर के सेल्फ रूल की बात वह करते हैं, कहाँ तक सही है इस पर भारत सरकार और बीजेपी के राष्ट्रीय नेतृत्व को अपने विचार आम लोगों तक पहुँचाने की ज़रुरत है, नहीं तो पृथकतावादियों को भी अपनी बात कहने का अवसर मिल जाता है।

पर इस लेख को लिखने तक आज की केंद्र सरकार की ओर से इन संवेदनशी विषयों पर न तो कोई वक्तब्य दिया गया है और न ही केंद्र सरकार की ओर से मुख्यमंत्री को कोई दिशा निर्देश भेजा गया है!

यही नहीं, मई २०१४ के बाद भी लगातार जम्मू-कश्मीर को लेकर कई ऐसे विवाद पैदा होते आ रहे हैं जिन को कम से कम भारत सरकार ने संवेदनशीलता से लेना चाहिए था, पर अगर भारत के हित को देखा जाये तो नहीं लिया गया है! यहाँ तक कि डॉ. कर्ण सिंह जी जैसे शीर्ष एवं वरिष्ठ नेता ने १० अगस्त २०१६ के दिन राज्य सभा में कहा था कि १९४७ में महाराजा हरी सिंह जी ने अधिमिलन पत्र पर २७ अक्टूबर को दस्तखत किए थे ( जब कि सरकारी स्तर पर भारत सरकार २६ अक्टूबर की तिथि बताती है)। इतना ही नहीं उन्होंने यह भी कहा कि जम्मू कश्मीर रियासत ने भारत के साथ कोई मर्जर डॉक्यूमेंट न तब लिखा गया था और न अभी तक लिखा गया है जब की बाकि रियासतों ने ऐसा किया था ! ऐसी महत्वपूर्ण बातों पर भी भारत सरकार की ओर से अभी तक कोई टिप्पणी नहीं हुई है! जबकि जब उमर अब्दुल्लाह ने मुख्य मंत्री रहते हुए २०१० में मर्जर की बात की थी तो बहुत हो-हल्ला हुआ था !

आज की केंद्र सरकार की भी आखिर क्या मजबूरी है जम्मू कश्मीर राज्य के बारे में, ख़ास कर के कश्मीर घाटी के नेताओं के बारे में इस पर ठंडे मन से विचार करना होगा!

ऐसी ही कुछ और भी बातें हैं जिन की ओर ‘कश्मीरी’ मुख्यधारा के कहे जाने वाले नेतृव पर प्रश्न करने से पहले सब को सोचना होगा !

( लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं जम्मू कश्मीर मामलों के अध्येता हैं)



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