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हेमामालिनी ने देखा वो खौफनाक स्वप्न जो दूसरे दिन ही सच हो गया

हेमा क्या है? एक लड़की ही तो है!

-लड़कियां तो मगर बहुत हैं.

-वह बंबई में है.

-तो बंबई शहर में भी बहुत लड़कियां हैं!

-वह सुंदर है. उसका रंग चंपे का है, कद सरी का है, चाल तितली की है, बाल घटाओं से हैं, देह डमरू सी है, उसकी आवाज में कांसे की खनक है, अदाओं में शोखी है और पारे जैसी बेसब्री है.

-हुंह! यह तो हो गई शायरी. हर शायर की महबूबा ऐसी ही होती है. और अगर हेमा ऐसी है भी तो और भी कई हैं जो ऐसी ही हैं.

-अच्छा तो हेमा फिल्मों में है.

-यह खूब रही! फिल्मों में तो सभी लड़कियां कमोबेश ऐसी ही होती हैं. फिर हेमा में ख़ास बात क्या है?

हम बताते हैं. हेमा की खासियत उसकी आंखें हैं. उसके चेहरे पर ही क्या, उसके सारे शरीर पर वे आंखें एकदम अलग-थलग हैं. हेमा फिल्मों में नहीं थी, तब भी ये आंखें उसके पास थीं. जब वह मंच पर नृत्य कार्यक्रम प्रस्तुत करती थी और कला समीक्षक लिखा करते थे – भाव भरी इन आंखों का जादू हॉल में बैठे आखिरी आदमी को भी मंत्र में बांध लेता है. और जब हेमा नर्तकी नहीं थी. तब भी, जब वह सात साल की छोटी बच्ची थी.

मोहल्ले के चौक में रामलीला होती थी. ‘परदा उठाओ-परदा गिराओ’ के बीच जो वक्त खाली होता था, उसमें छोटे-छोटे प्रहसन और नृत्य होते थे. इसी तरह का एक नृत्य हेमा को भी करने को मिला. रिकॉर्ड बजाया गया – ‘वृंदावन का कृष्ण कन्हैया, सब की आंखों का तारा.’

नाच क्या था, जो था सो था, मगर दर्शकों ने खूब तालियां बजाईं और एक साहब ने अपनी ओर से नकद एक रुपए का इनाम हेमा को दिया. कहा, ‘तुम नाचना जरुर सीखना. नृत्य सीखना मुश्किल नहीं है. सब सीख लेते हैं. मगर इसका असर पैदा करने वाली आंखें सबके पास नहीं होतीं, जो तुम्हारे पास हैं.’

उनकी बात हेमा के पल्ले नहीं पड़ी, सिवा इसके कि नाच सीखना अच्छा है, उससे रुपया इनाम मिलता है. रुपए की अपनी जगह है. जो इससे इनकार करता है, बनता है. हेमा बनती नहीं. अब जबकि वह इतनी बड़ी फिल्म स्टार हो गई है, चाहे तो कला, साधना और समर्पण के कुछेक अच्छे संवाद किसी को सुना सकती है, मगर वह साफ़ कहती है, ‘कला का अपना स्थान है, और बहुत ऊंचा है, पर रुपया अपनी जगह है. मुझे रुपया कमाना न हो तो कभी दो-दो शिफ्ट में काम न करूं.’

हेमा के पिता सरकारी नौकरी में थे. बंधी-बंधाई तनख्वाह में बंधे-बंधाए खर्चे. मगर हेमा की मां को यह धुन थी कि हेमा को नृत्य सिखाना ही है. उसके चेहरे की भाव प्रवणता और आंखों में आकर्षण है. उन्होंने और कुछ भी जो किया वह भी शानदार था.

हेमा की अध्यापिका हेमा से खुश थीं. नृत्य की भाव भंगिमाओं को उपयुक्त प्रभाव के साथ व्यक्त करने के लिए ऐसी ही आंखें चाहिए, जैसी हेमा की हैं. नृत्य उसकी सेहत के लिए भी मनमाफिक साबित हुआ. ज्यों-ज्यों वह नाचती गई, उसके शरीर की रेखाएं आकार बदलती रहीं, जब तक कि तब की हेमा अब की हेमा में नहीं बदल गई. और अब हाल इसका ठीक उल्टा है. हेमा कुछ दिन नहीं नाचती है तो मोटी हो जाती है, फ़ौरन सारी व्यस्तताओं में से वक्त निकाल फिर नाचना पड़ता है.

वह सचमुच कमाल का भरतनाट्यम करने लगी थी. मगर तभी उसकी आंखों ने फिर उसकी राह बदल दी. एक निर्माता ने उसका नृत्य कार्यक्रम देखा. अगले दिन वे हेमा के घर आए, हेमा की मां से मिलने.

‘आपकी लड़की को मैं फिल्म में लेना चाहता हूं.’

कहते हैं, लोगों का कैरियर उनके भाग्य से बनता है. श्रीमती चक्रवर्ती ने अपनी बेटी का कैरियर बड़े जतन से खुद संवारा था. उन्हें बार-बार यह ख्याल था कि जिस तंगदस्ती में वे जीवन गुजार रही हैं, उनके बच्चे ऐसे न गुजारें. नून-तेल-लकड़ी का जुगाड़ आदमी की सारी ताकत निचोड़कर रख लेता है और उसे बेहतर कामों के लिए, मन की खुराक के लिए, कला की सेवा के लिए, अच्छा पढ़ने-लिखने के लिए वक्त ही नहीं मिलता. सबसे पहली बात गरीबी को हराना है.

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‘उसे सीखना नहीं पड़ेगा, उसकी आंखों में भाव जरखरीद गुलामों की तरह हैं. हां, स्टेज पर से उन आंखों का फायदा नहीं उठाया जा सकता, दर्शक बहुत दूर होता है. अगर वह फिल्म में आएगी तो दर्शक उसकी आंखों में झांककर देख सकेगा,’ निर्माता ने आगे कहा.

मगर हेमा थी कि अपने कमरे में सुबक रही थी.

‘क्या हुआ?’

‘छिः मम्मी! कित्ती गंदी बात!’

‘क्या?’

‘मुझे स्कूल में सभी चिढ़ाते हैं कि मैं फिल्म में काम करने वाली हूं. क्यों लोग ऐसी गन्दी बातें करते हैं? मैं क्या फिल्म में काम करूंगी?’

श्रीमती जया चक्रवर्ती एक बार खुद असमंजस में पड़ गई थीं. आम मध्यमवर्गीय हिन्दुस्तानी परिवार की तरह उनका परिवार भी था – आम हिंदुस्तानी परिवार की तरह वहां भी मान्यता थी कि फिल्म में काम करना बुरी बात है, क्यों है? यह आम हिंदुस्तानी परिवार की तरह उसे भी नहीं मालूम था.

‘क्यों बुरी बात है?’ श्रीमती चक्रवर्ती से सवाल किया गया. आप कल्पना कर सकते हैं, यह सवाल किसने किया होगा? आप ताज्जुब करेंगे. यह सवाल श्रीमती चक्रवर्ती के पचहत्तर साल के बूढ़े पिताजी ने किया था.

हेमा फिल्मों में आ गई. ‘इदु सत्यम’ उसकी पहली फिल्म थी – फूलों से लदी हुई वह रथ की हिरणी बनी थी और फूलों की लगामें कई सह-नर्तकियों के हाथ में थीं, जो उसके साथ नाच रहीं थीं. अपने प्यारे नाना के साथ वह फिल्म देखने गई थी और देखा था कि उसका नाच तो काट दिया गया था. हेमा की बड़ी-बड़ी आंखों में आंसू छलक आए थे और नाना ने कहा था, छिः बेटे! इतनी सी बात पर जी छोटा करती हो? तुम देखना, तुम हिंदुस्तान की मानी हुई अभिनेत्री बनोगी.’

हेमा की हर शूटिंग का हर किस्सा नाना पूछते थे. ‘आज ‘सपनों का सौदागर’ की शूटिंग थी. राज साहब ने मेरी पीठ थपथपाई.’

‘और क्या? मेरी बेटी कोई ऐसी-वैसी है?’

‘बाबा, आपने पढ़ा? राज साहब ने प्रेस वालों को कहा है, ‘हेमा का मेरे साथ काम करना उसके लिए नहीं मेरे लिए सौभाग्य की बात है, ‘आपने पढ़ा?’

‘पढना क्या? मैं तो जानता ही हूं अपनी बेटी को.’

‘बाबा, बाबा! आज जलसे में मेरी बहुत तारीफ़ हुई. सबने कहा मैंने बहुत अच्छा नाच किया.’

‘माला भी पहनाई होगी!’

‘हां, इत्ती बड़ी.’

‘कहां है?’

हेमा भागकर माला ले आई और बाबा उसे गले में डालकर, गर्व से सीना तानकर खड़े हो गए. हेमा ने तालियां बजाईं और खिलखिला कर हंस दी.

सुबह हेमा उठी तो बहुत अनमनी थी. आंखों में आंसू भरे थे. सीधी भागकर नाना के पास गई और गोद में सर रख दिया.

‘क्या हुआ भाई! मेरी बेटी की सुंदर-सुंदर आंखें क्या रोने के लिए हैं?’

हेमा कुछ कहे नहीं, बस रोए और रोए.

‘कुछ बताओ तो, बेटे? हुआ क्या है?’

हेमा ने तब भी कुछ न कहा, बस सुबकती रही. नाना ने अटकलें लगाईं. शायद यह वजह हो. बोले ‘तुम चिंता मत करो. जया तुम्हारी मां है तो मेरी भी बेटी है. मेरा कहना तो मानना ही पड़ेगा, तुम जरुर वह पोशाक बनवा लो. अच्छी सुन्दर लगती हो उसमें. ये लोग पुराने खयालात के हैं, बुड्ढे हो गए हैं सारे, तभी तुम्हें रोकते हैं.’ हेमा वैसे ही सुबकती रही.

‘अच्छा, अच्छा! फलां एक्टर के साथ काम करने से जया ने रोका है? मैं उसे समझा दूंगा. यूं ही बदनाम कर रखा है लोगों ने. और हमारी बेटी अच्छी है. कोई क्या बिगाड़ सकता है उसका?

मगर हेमा की सुबकियां काबू में नहीं आईं.

उसी रोज नाना को दिल का दौरा पड़ा, वे भगवान को प्यारे हो गए. हेमा के सबसे प्यारे दोस्त उसके नाना.

हेमा फूट-फूट कर रोई. इस रहस्य को कौन सुलझाएगा? कल ही रात हेमा ने सपने में देखा था कि उसके नाना नहीं रहे.

साभार- https://satyagrah.scroll.in से

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