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आठवीं अनुसूची के अखाड़े में पस्त होती हिंदी

हमारे देश में हिंदी भी आठवीं अनुसूची की 22 भाषाओं में से एक भाषा है। हिंदी को देश की राजभाषा तो बनाया गया लेकिन साथ में ऐसे प्रावधान भी कर दिए गए कि कभी अंग्रेजी से निर्भरता न हटे , जिसके फल स्वरूप हिंदी राजभाषा से राष्ट्रभाषा नहीं बन पाई है। 14 सितम्बर, 1949 को हिंदी को राजभाषा के रूप में स्वीकार किया गया। अनुच्छेद 343 के अंतर्गत इसे राजभाषा तो घोषित किया गया लेकिन अनुच्छेद 343(2) के अनुसार 26 जनवरी, 1950 को लागू नहीं किया गया क्योंकि अनुच्छेद 343(3) के अनुसार सरकार 15 वर्ष तक अंग्रेजी में माध्यम से काम कर सकती है। इसके बाद यह अवधि बढ़ती रही और आज तक कायम है। आठवी अनुसूची में प्रादेशिक व अन्य भाषाओं के साथ हिंदी भी रख दी गई, जिसके कारण हिंदी को भी संख्याबल का सहारा चाहिए, जिसमे अब रोज सेंधमारी हो रही है। इस सूचि में अन्य बोलियां व भाषाएं सम्मिलित होने के लिए रोज प्रयास कर रही है।

राजस्थानी और भोजपुरी के लोगो ने तो अपने को हिंदी से अलग कर आठवीं अनुसूची में सम्मिलित करने के लिए एड़ी चोटी का जोर लगा रखा है। सरकार बैठे राजनीतिज्ञ भी भाषाई वोट के महत्व को समझते हुए इन सभी को अगले सत्र में आठवीं अनुसूची में भोजपुरी और राजस्थानी को सम्मिलित करने का आश्वासन दे चुके है। अब प्रश्न उठता है कि हिंदी को सम्रद्ध करने वाले तुलसी और सूर में क्या कमी है। इनकी भाषाए अवधी और ब्रज को भी आठवीं अनुसूची में सम्मिलित करना चाहिए; क्योकि इनके पास तो प्रचुर साहित्य और व्याकरण भी है। लेकिन यह हिंदी के लिए बहुत ही घातक होगा। अगर हिंदी से तुलसी, जायसी, कबीर, सूर,रहीम, मीराआदि निकल जाते है तो हिंदी एक दरिद्र भाषा बन के रह जायेगी, जिसके पास खड़ी बोली का सीमित साहित्य बचेगा। एक ओर हम संयुक्तराष्ट्र संघ में हिंदी को स्थापित करने की बात करते है वंही दूसरी ओर उसे प्राणहीन भी किये जा रहे है। परिणाम स्वरूप इन परस्थितियों में भाषाई संघर्ष बढ़ रहा है और हर भाषा आठवीं अनुसूची में आना चाहती है। आठवीं अनुसूची का तिलिस्म हमे कई प्रकार से चोट पहुंचा रहा है। भारत की सैकड़ो भाषाये और बोलिया मिटने के कगार पर पहुँच रही है , जिसका सबसे बड़ा उदाहरण अवधी और ब्रज भाषा है , जो आज बोली भी नहीं रह पा रही है। रामचरित मानस जैसा ग्रन्थ देने वाली भाषा केवल धर्म के सहारे जीवित है। यही हाल ब्रज का है, जिसमे अपार भक्ति साहित्य का भंडार है। किसी भाषा का किसी से बैर नहीं है लेकिन वोटो की राजनीती ने सबको एक दूसरे के सामने ला कर खड़ा कर दिया है।

आठवी अनुसूची के लिए जिस प्रकार हिंदी परिवार की बोलियों ने लड़ना शुरू कर दिया है यह भाषाई संघर्ष देश के वातावरण में अस्थिरता का सन्देश देगा, जो कि राष्ट्रहित में नहीं होगा। वर्तमान में सबसे अधिक आठवी अनुसूची के लिए भोजपुरी के चन्द लोगो ने संघर्ष चलाया हुआ है, जिसका आरम्भ मुंबई में उत्तर भारतीयों के वोटो को आक्रष्ट करने के लिए शिवसेना ने किया था , उसके कर्ता धर्ता तत्कालीन सामना के सम्पादक प्रेम शुक्ल थे, जो कि स्वयं अवधी भाषी है. हिंदी पर संकट को भांपते हुए अनेक भोजपुरी भाषी विद्वानों ने चन्द राजनितिक लाभार्थियों के उदेश्य को पहचनाते हुए हिंदी से भोजपुरी को अलग न करने की मांग की है। ‘हिंदी बचाओ मंच’ के संयोजक व कलकत्ता विश्विद्यालय के प्रोफेसर अमरनाथ ने चिन्दी-चिन्दी होती हिंदी को बचाने के लिए अपने प्रयासों में तेजी ला दी है। वह स्वयं भोजपुरी भाषी होते हुए , अन्य सभी भोजपुरी भाषियों से अपील कर रहे है कि हिंदी को टूटने से बचाइए।

भारत में हिंदी को कमजोर करने में मॉरीशस की राजनीति भी दोषी है। एक ओर भारत ने मॉरीशस को सम्मान देते हुए वँहा दो विश्व हिंदी सम्मेलनों का आयोजन किया और तीसरी बार अगला विश्व हिंदी सम्मेलन भी वंही प्रस्तावित है, जिसके लिए विदेश मंत्री सुषमा स्वराज की अगुवायी में कमेटी भी बनी हुई है। विश्व हिंदी सचिवालय की स्थापना भी मॉरीशस में की गई, जिसका सारा खर्च भारत सरकार उठाती है। उसके समकक्ष वँहा पर विश्व भोजपुरी सचिवालय की स्थापना कर दी गई और भारत में मिथ्या प्रचार होने लगा कि भारत में 20 करोड़ भोजपुरी भाषी है। भारत में वर्तमान मॉरीशस के उच्चायुक्त राजनयिक न होकर राजनीतिज्ञ है, उनके कई दिल्ली में हास्यपद भाषण सुनने को मिलते है। अभी एक पुस्तक लोकार्पण के भाषण में कह रहे थे कि हिंदी से अधिक महत्व भोजपुरी का है, वह भोजपुरी माई कि प्रतिमा मारीशस में लगवा रहे है । भारत की अन्य भाषाओं व बोलियो के विषय में उनका ज्ञान नगण्य होने के कारण पूरे भारत के विकास का कारण भोजपुरी बता रहे थे। ये एक यथार्थ से अनिभिज्ञ है जिस बिहार के पटना की बात करते है, वँहा की भाषा भी भोजपुरी नहीं है, मगही है। उसे भी भोजपुरी कह कर, मगही के अस्तित्व पर कुठाराघात कर रहे है। इसी प्रकार गिरमिटिया देशो में अवधी और अन्य भाषाओ के अस्तित्व को नकारते हुए सब जगह भोजपुरी ही बता दे रहे है। इसके कारण देश में हिंदी के अस्तित्व पर संकट आ गया है क्योंकि अब सभी बोलिया व भाषाएँ आठवीं अनुसूची में स्थान पाने के लिए सड़कों पर उतरने की तैयारी कर रही है। पिछले दिनों उड़ीसा के आदिवासी समाज ने हो भाषा को आठवीं अनुसूची में सम्मिलित करने के लिये संघर्ष छेड़ने की घोषणा की है। बिहार की ही मगही, अंगिका और बज्जिका को भी आठवीं अनुसूची में सम्मिलित करने की मांग उठना शुरू हो गई है। उदाहरण के लिए जैसे ही मैथिलि आठवीं अनुसूची में सम्मिलित हुई, अब हिंदी में विद्यापति को कोई नहीं पढ़ता। अब कल्पना करिये यदि अवधी, भोजपुरी, ब्रज, मगही, छतीसगढ़ी, राजस्थानी, बुंदेली सहित अनेक भाषाएँ व बोलियां आठवीं अनुसूची में आ जाती है तो रामचरित मानस, पद्मावत, सूरसागर जैसे महाग्रन्थ हिंदी से बाहर होंगे।

हमे ऐसे संकट में महात्मा गांघी को याद करना चाहिए, यंग इण्डिया, 31.1.1929 को गांधी जी ने हिंदी को लेकर स्पष्ट विचार रखे है कि ‘यह बात अब सभी को स्पष्टयता समझ लेनी चाहिए कि हिंदी को प्रादेशिक भाषाओं का कत्तई स्थान नहीं लेना है; उसे तो अन्तर-प्रांतीय विचार विनिमय का माध्यम बनना है और सभी अखिल भारतीय संगठनों की अधिकृत भाषा का स्थान लेना है।’ यह कथन बहुत साफगोई के साथ यह मार्ग दिखाता है कि हिंदी को प्रांतीय भाषाओं से अलग किया जाये और सम्पूर्ण भारत की भाषा हिंदी हो। मुझे भी यही लगता है कि आठवीं अनुसूची की प्रासंगिकता भी अब तभी है जब हिंदी को इसमें अलग कर विशेष संवैधानिक दर्जा प्राप्त हो और वह राष्ट्रभाषा घोषित हो, बाकी सभी भारतीय भाषाएं व बोलियां भी हमारी है, उनका साहित्य इस देश की थाती है। उसे संरक्षित करना सरकार का दायित्व है। संकट तभी पैदा होगा जब भाषाई मुद्दे का राजनितिक करण होगा . सरकार देश की सभी बोलियो व भाषाओं को सामान रूप से मान-सम्मान दे और आठवी अनुसूची के अखाड़े से हिंदी को मुक्त करे.

साभार-वैश्विकहिंदी.भारत / www.vhindi.in

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