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हिंदी भारत की पहचान और भारतीयता का गौरव गान है – डॉ. चन्द्रकुमार जैन

राजनांदगांव। शासकीय दिग्विजय महाविद्यालय के हिंदी विभाग के राष्ट्रपति सम्मानित प्राध्यापक डॉ. चन्द्रकुमार जैन ने अखंड भारत और हिंदी के विश्व रूप को समर्पित अति महत्वपूर्ण राष्ट्रीय महामंथन में मुख्य वक्ता के रूप में प्रभावी सहभागिता की। भारत सरकार के मानव संसाधन विकास मंत्रालय, केंद्रीय हिंदी निदेशालय एवं पंडित सुंदरलाल शर्मा मुक्त विश्वविद्यालय, बिलासपुर के हिंदी विभाग के तत्वावधान में अभूतपूर्व भव्यता के साथ संपन्न इस तीन दिवसीय आयोजन में डॉ.जैन ने तकनीकी सत्र में सूचना-संचार तथा विचार के प्रसार की इक्कीसवीं सदी में हिंदी के असीमित प्रभाव पर सारगर्भित व्याख्यान दिया। प्रतिभागियों के सवालों के ज़वाब भी दिए। आयोजन समिति ने मुख्य वक्ता डॉ. चंद्रकुमार जैन का भावभीना सम्मान किया। अनेक राज्यों के विद्वानों एवं शोधार्थियों ने महामंथन में शानदार उपस्थिति दी। करीब 110 शोध पत्र प्रस्तुत किए गए।

डॉ. चन्द्रकुमार जैन ने राष्ट्रीय संगोष्ठी के निर्धारित मूल विषय हिंदी के बहुप्रयुक्त रूप – वैज्ञानिकता एवं संभावनाएं सहित दस अहम

उपविषयों के संवाद में भी उत्साहपूर्ण भागीदारी की। इनके अलावा डॉ.चन्द्रकुमार जैन ने पारिभाषिक शब्दावली के ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य और विकास पर केंद्रित अपना शोध पत्र वाचन भी किया। डॉ. जैन ने कहा कि हिंदी भारत की आत्मा संगीत है। हिंदी संस्कृत की बेटी और संस्कृति की माता है। हिंदी सदियों में बनने वाली वह अमर कहानी है, जिसमें भारत के अखंड गौरव की धड़कनें सुनी जा सकती हैं। डॉ. जैन ने कहा कि हिंदी आगे कई सदियों का निर्माण करने की क्षमता प्राप्त कर चुकी है। हिंदी की शक्ति को समझना अपनी पहचान के निकट आने के समान है। हिंदी विश्व गुरु भारत की पहचान और भारतीयता का गौरव गान है।

इस महामंथन में छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग के अध्यक्ष डॉ. विनय कुमार पाठक, पंडित सुंदरलाल शर्मा मुक्त विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. बंश गोपाल सिंह, बिलासपुर विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. जी. डी.शर्मा, हिंदी ग्रन्थ अकादमी के पूर्व निदेशक तथा वरिष्ठ पत्रकार श्री रमेश नैयर, प्रख्यात ललित निबंधकार डॉ. श्रीराम परिहार, केंद्रीय हिंदी निदेशालय के प्रमुख अधिकारियों सहित कई विश्वविद्यालयों और महाविद्यालओं के वरिष्ठ प्राध्यापकों, साहित्यकारों ने संगोष्ठी में स्मरणीय मार्गदर्शन दिया।

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