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नए साल में अनोखी होगी हिंदी की भूमिका

राजनांदगांव। दसवें विश्व हिंदी सम्मेलन के यशस्वी प्रतिभागी, प्रखर वक्ता और शासकीय दिग्विजय महाविद्यालय के हिंदी विभाग के प्राध्यापक डॉ. चंद्रकुमार जैन ने कहा है कि हिंदी अब राष्ट्रीय संपर्क की भाषा है। उसे सीखना और व्यवहार में लाना अन्य भाषाओं के अपेक्षा ज्यादा सुविधाजनक और आसान है।उसका दायरा निरंतर बढ़ रहा है। भारत के भाषा संसार में हिंदी को देखने पर स्पष्ट हो जाता है कि लोग अब हिंदी का वैश्विक महत्त्व समझने लगे हैं। हिंदी भाषा में एक विशेषता यह भी है कि उसमें लोक जीवन और उसकी बानी की बड़ी ताकत है। हिंदी बड़े पैमाने पर लोचदार भाषा है, जिससे उसे अपनाने में कोई कठिनाई नहीं है। डॉ. जैन ने जोर देकर कहा है कि नए साल में हिंदी इन विशेषताओं के साथ बहुत आगे बढ़ेगी ।

त्रैमासिक वेबिनार की समापन कड़ी में भागीदारी करते हुए डॉ. चंद्रकुमार जैन ने कहा कि हिंदी में आज विभिन्न भारतीय भाषाओं का साहित्य लाया जा चुका है। विभिन्न भारतीय भाषाओं के लेखकों को हिंदी के पाठक जानते हैं, उनके बारे में जानते हैं। भारत की भाषायी विविधता के बीच हिंदी की भाषायी पहचान मुख्यत: हिंदी है। भारत के औद्योगिक प्रतिष्ठानों के आधार पर बने नगरों और महानगरों में भारत की राष्ट्रीय एकता और सामाजिक संस्कृति का स्वरूप देखने को मिलता है। उन्होंने कहा कि यदि हिंदी-क्षेत्र के राज्य औद्योगिक रूप से और ज्यादा विकसित होते तो राष्ट्रीय एकता और भाषायी एकता का आधार और विस्तृत और मजबूत होता। लेकिन आज की स्थिति में भी भारत में हिंदी की जो राष्ट्रीय भूमिका है, उतना भी उसके अंतरराष्ट्रीय महत्व को महसूस कराने में समर्थ है।

डॉ. जैन ने बताया कि मारिशस, फिजी, दक्षिण अफ्रीका, के अन्य कई देश, ब्रिटिश गायना, त्रिनिडाड, सूरीनाम, न्यूजीलैंड आदि देशों में जो बड़ी संख्या में भारतीय मूल के लोग हैं, वे मुख्यत: हिंदी भाषी हैं। वे हिंदी जानते हैं, हिंदी पढ़ते-लिखते हैं। नेपाल, पाकिस्तान, बांग्लादेश, भूटान और म्यांमार में तो स्वभावत: हिंदी भाषी जनता की संख्या बहुत बड़ी हैं। आधुनिक युग में नई संचार-व्यवस्था, आवागमन के नए साधनों की उपलब्धता और जीवन की नई जरूरतों से प्रेरित होकर इंग्लैंड, अमेरिका, कनाडा, फ्रांस, जर्मनी, इटली, रूस और यूरोप के अन्य अनेक देशों में भी भारत से जा बसे लोगों में हिंदीभाषी लोग आज रह रहे हैं। डॉ. जैन ने गर्व पूर्वक कहा कि हिंदीभाषियों को अथवा हिंदी जानने वालों की यह विशाल संख्या हिंदी के अंतरराष्ट्रीय संपर्क का साक्षात्कार कराती है।

डॉ. जैन ने हिंदी सृजन संसार की चर्चा करते हुए कहा कि हिंदी भाषा के साहित्य ने पिछली एक सदी में बड़ी तेजी से विकास किया है, वह कविता, कहानी, उपन्यास, आलोचना तथा चिंतनपरक साहित्य के क्षेत्रों में इतनी आगे आयी है कि आज वह किसी भी भाषा के श्रेष्ठ साहित्य का मुकाबला कर सकती है। प्रेमचंद, निराला, जयशंकर प्रसाद, रामचंद्र शुक्ल, राहुल सांस्कृत्यायन, मुक्तिबोध, नागार्जुन जैसे कई साहित्यकारों के लेखन के अनुवाद दुनिया की विभिन्न भाषाओं में हुए हैं। इससे सांस्कृतिक चेतना का भी विकास हुआ है। इतना ही नहीं, हिंदी के माध्यम से दूसरी भाषाओं के साहित्य का परिचय भी विश्व का हिंदी-समुदाय प्राप्त करता है। यह एक बड़ा कारण है कि दुनियाभर में हिन्दी का अध्ययन आज वे लोग भी कर रहे हैं, जो हिंदीभाषी या भारतीय मूल के नहीं हैं। इस प्रकार आज की परिस्थिति में हिंदी ने अपनी एक अलग दुनिया बना ली है।

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