आप यहाँ है :

इस्लाम का इतिहास और मुस्लिम स्त्रियों का संघर्ष

सुप्रीम कोर्ट ने तीन तलाक व हलाला की वैधानिकता पर सुनवाई शुरू कर दी है। कुछ इस्लामी नेता इस बहाने मुसलमानों को हिन्दू राष्ट्र के भूत से बरगला रहे हैं। जबकि तीन तलाक जैसे रिवाज के रहने या जाने से हिन्दू हितों का कोई लेना-देना नहीं है। ये रिवाज केवल मुस्लिम स्त्रियों के हित से जुड़े हैं। इसीलिए वे ही इस की लड़ाई लड़ रही हैं।

इसलिए, मुसलमानों को इस की स्वतंत्र समीक्षा करनी चाहिए। बहुत लोग तो यह भी नहीं जानते कि भारतीय मुसलमानों पर अनेक इस्लामी कानून सदा से लागू नहीं थे। यहाँ मुस्लिम पर्सनल लॉ भी हाल की चीज है। अधिकांश मुसलमान पारंपरिक भारतीय रीतियों से चलते थे जिस में कोई भी और कितने भी धर्म-विश्वास रखने या छोड़ने की सदैव स्वतंत्रता थी।

डॉ. भीमराव अंबेदकर के अनुसार सन 1939 तक भारत में कानून था कि यदि कोई विवाहित मुस्लिम महिला इस्लाम छोड़ देती थी, तो उस का विवाह स्वतः भंग हो जाता था और ‘वह अपने नए धर्म के किसी भी पुरुष से विवाह करने के लिए स्वतंत्र हो जाती थी। साठ वर्ष तक भारत की सभी अदालतों में इस कानून का दृढ़तापूर्वक पालन किया गया।’ अर्थात्, इस्लाम छोड़कर हिन्दू बनना भी स्वीकृत था। मगर कुछ अरब-पलट मौलानाओं (आजाद, इलियास, गंगोही, आदि) ने मुसलमानों को यहाँ की परंपरा से तोड़कर हू-ब-हू अरबी चलन से जोड़ने का तबलीग आंदोलन शुरू किया। तभी पुराना कानून रद्द कराया गया।

हालिया वर्षों में यहाँ शाह बानो से लेकर जितने मामले चर्चित हुए, वे भिन्न-भिन्न प्रकार के हैं। मगर एक समानता थी कि सभी में मुस्लिम स्त्री की अपनी इच्छा या मान-सम्मान गायब था! प्रत्येक स्त्री अपने शौहर या उलेमा द्वारा संपत्ति के टुकड़े की तरह तय की गई। किसी बीवी को रखने, बदलने या त्यागने में इस वस्तु-भाव के अतिरिक्त कुछ न था। क्योंकि इस्लामी निकाह के केंद्र में केवल पुरुष है। उस के शारीरिक सुख, भोग तथा उम्मा की संख्या-वृद्धि के सिवा कोई भाव, आध्यात्मिक तत्व वहाँ नहीं मिलता।अतः यहाँ मुस्लिम स्त्रियों की अभी जो दशा है, वह पहले नहीं थी और फिर बदल सकती है। अब मुस्लिम स्त्रियाँ तीन तलाक, चार बीवियों और हलाला वाली गंदी प्रथा के विरुद्ध खुद खड़ी हो रही हैं। मौजूदा केंद्र सरकार से भी उन्हें आशा बँधी है। अनेक मुस्लिम पुरुष भी अपनी स्त्रियों की स्थिति सुधारने के पक्ष में हैं। वे जानते हैं कि चालू इस्लामी निकाह या तलाक के नियम मनमाने हैं।

मुस्लिम स्त्रियों के साथ जो होता है, उस का स्त्रोत इस्लामी व्यवस्था है। कुरान में औरतों को मर्दों की खेतियाँ बताया गया है, ‘जिसे वह जैसे चाहें जोतें’ (2-223)। बीवियों के अलावा लौंडियाँ भी अतिरिक्त भोग्या हैं (4-24)। उस में एक अध्याय ही है ‘अल तलाक’ जहाँ मर्दों द्वारा तलाक देना मामूली, रोजमर्रा काम जैसा है। औरत के बारे में अध्याय ‘अल-निसा’ में भी यही भाव है। जब चाहो एक बीवी छोड़ दूसरी ले आओ (4-20), केवल परित्यक्ता को पहले दी गई चीजें वापस मत छीनना।

हदीसें भी इन्हीं आदेशों को दुहराती हैं। मानो औरत संपत्ति हो जिसे इच्छानुसार लाया, बाँटा, छोड़ा जा सकता था। किसी को उपहार में भी देने के लिए भी औरत को तलाक दिया जाता था। मदीना-प्रवास के समय प्रोफेट के साथी अब्दुर्रहमान को साद ने मजहबी भाई बनाया। जब दोनों खाने बैठे तो मेजबान ने कहा, ‘मेरी दोनों बीवियों को देख लो, और जिसे पसंद करो, ले लो।’ उसी वक्त एक बीवी को तलाक दे कर उपहार दे दिया गया। वही व्यवहार आज भी मुस्लिमों के लिए कानून बताया जाता है। मुसलमानो को सोचना चाहिए कि ऐसे कानूनों के सहारे वे कहाँ पहुँचेंगे?

यह केवल तलाक की बात नहीं। मुस्लिम स्त्रियों के जीवन की कई स्थितियाँ त्रासद हैं। औरत संबंधी अन्य इस्लामी कायदे – हलाला, बहुपत्नी प्रथा, मुताह, स्त्री-खतना (इन्फ्यूबलेशन), आदि – भी सब के सब विवेकहीन तथा जबरिया हैं। उस समाज में मनमाना तलाक किसी शिकायत का मामला नहीं बनता। अतः मुस्लिम औरतों पर आतंक का स्थाई साया रहता है।

आज जब स्वयं मुस्लिम स्त्रियाँ समान अधिकार के लिए खड़ी हो रही हैं, तो उन का सम्मान होना चाहिए। मध्ययुगीन इस्लामी कायदों को ऐतिहासिक, वैज्ञानिक रोशनी में परखना चाहिए। आखिर मुसलमान पहले मनुष्यता के अंग है जो अटूट संबंध है। उन का मनुष्य होना बदला नहीं जा सकता। जबकि मजहब, विश्वास, मतवाद, विचारधारा, आदि परिवर्तनीय चीजें हैं। इसे स्वीकारा, बदला, छोड़ा जा सकता है। यह पहले भी हुआ, अभी हो रहा है और आगे भी होगा।

अतः मुसलमानों को सोचना चाहिए कि कौन सी चीज उन्हें इन्सानियत से मिलने से रोकती है? परिवर्तनशील जगत में मध्ययुगीन, जुल्मी कायदे सदा नहीं रह सकते। जब तक मुसलमान यह नहीं समझते, उन के सामाजिक-आर्थिक-राजनीतिक मसले भी सुलझने वाले नहीं। वे संघ-भाजपा, हिन्दुओं, अमेरिकीयों, पूरी आधुनिक सभ्यता पर लाख खफा हो लें। किंतु अंततः उन्हें वह देखना ही पड़ेगा जिस से वे बचते हैं। वह यह कि इस्लाम की अनेक रूढ़ियाँ मुस्लिमों के गले का पत्थर हैं।

मुसलमानों की समस्या गैर-मुसलमानों के साथ उतनी नहीं जितनी स्वयं अपनी रूढ़ियों के साथ है। आम मुसलमान उलेमा की तानाशाही झेलते हैं, जिन का डंडा शरीयत है। यह उन्हें मानवता से दूर कर एक अलगाववादी मानसिकता में रखता है। मुसलमानों को दूसरों से अलग-थलग रख कर ही उन्हें इस्लामी राजनीति का साधन बनाये रखा जा सकता है। जैसा ऊपर उदाहरण से स्पष्ट है, मुस्लिम स्त्री-पुरुषों को इस्लामी राजनीति साधने के लिए इस्तेमाल किया जाता रहा है।

जबकि मुस्लिम स्त्रियों को समानता देना मुस्लिम पुरुषों को भी मुक्त करेगा। उन के बच्चों को बेहतर लालन-पालन मिलेगा। सताई, त्रस्त या परित्यक्ता स्त्रियों के बच्चों की मानसकिता प्रायः स्वस्थ नहीं होती। इस पर भी विवेकवान, सुधारवादी मुसलमानों को सोचना चाहिए।

यह तथ्य भी देखना चाहिए कि इस्लामी निर्देशों की कई बुनियादी बातें छोड़ी जा चुकी हैं। जैसे, गैर-मुस्लिमों के शासन में नहीं रहना और ‘हिजरत’ कर जाना; संगीत और चित्र को कुफ्र मानकर उनसे दूर रहना; आदि। फिर, कोई मुस्लिम देश अब दुनिया को मुसलमान बनाने की आधिकारिक जिहाद-नीति नहीं रखता। इस प्रकार, जब दुनिया में सदियों से इस्लामी वैचारिकता और सत्ता लुप्त-प्राय रही है, तो सिद्धांत और व्यवहार में उस का अवसान तो बहुत पहले हो चुका!

पचास वर्ष पहले तक दुनिया की किसी राजनीतिक पुस्तक या विमर्श में इस्लाम का उल्लेख फुटनोट में भी नहीं होता था। वह स्थिति सदियों से चल रही थी। यानी, इस्लाम का बौद्धिक, तकनीकी, आर्थिक योगदान तो छोड़िए, राजनीतिक अस्तित्व भी शून्य-प्राय था। सन्ा 1924 में तुर्की में इस्लामी ‘खलीफा’ का पद और राज खुद मुसलमानों ने खत्म किया था।

यह तो अरब में तेल मिलने से 1970 के दशक से मुस्लिम देशों में कुछ सरगर्मी आई, जो संयोग है। उस में इस्लामी काबिलियत की कोई बात नहीं। इसीलिए इस्लाम का जो रौब-रुआब गत चार-पाँच दशक चला, वह उतार पर है। कोई हिंसा और धमकी उसे नहीं बचा सकता। इस्लामी विचारधारा राजनीतिक दृष्टि से पुनः उस शून्य में चली जाएगी जिस में वह सदियों पहले जा चुकी थी।

अतः इस्लामी राजनीति का कोई भविष्य नहीं है। यह समझने में ही मुसलमानों की तरक्की निर्भर है। प्रायः उन्हें उलटा सिखाया जाता है। ताकि वे अपने मजहबी नेताओं की कैद में अलग, पिछड़े और रंज-शिकायती बने रहें। पर उन्हें आँखें और दिमाग खोलकर दुनिया की स्थिति और इतिहास का स्वयं हिसाब करना चाहिए। तब उन्हें न केवल अपनी स्त्रियों की समानता और आदर, बल्कि दूसरे धर्मों की समानता और उन का आदर करना भी सहज आवश्यक लगेगा। आदर देने से ही आदर मिलता है।

साभार- http://www.nayaindia.com से



Leave a Reply
 

Your email address will not be published. Required fields are marked (*)

You may use these HTML tags and attributes: <a href="" title=""> <abbr title=""> <acronym title=""> <b> <blockquote cite=""> <cite> <code> <del datetime=""> <em> <i> <q cite=""> <s> <strike> <strong>

सम्बंधित लेख
 

ईमेल सबस्क्रिप्शन

PHOTOS

VIDEOS

Back to Top