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तीन दिन तक पेड़ पर भूखे प्यासे लटके रहे भाकुनी ने कैसे अपनी जान बचाई

1971 के युध्द की शौर्य गाथा

सूबेदार भाकुनी की उन दिनों कश्मीर पोस्टिंग थी. इकहत्तर की बात है. भारत ने ने पाकिस्तान पर धावा बोल दिया था सुबह-सुबह सारी बटालियन को फॉलिन करा कर कमांडेंट साहब ने सूचना दी कि वार शुरू हो गई है और सारे जवान अपनी-अपनी तैयारी मजबूत कर के रखें. बात पूरी करके उन्होंने भाकुनी को एक तरफ करके अलग से अपने दफ्तर आने को कहा। दफ्तर ले जा कर बोले कि देखो भाकुनी किसी को बताना मत लेकिन बात ये है कि जनरल साहब का टेलीग्राम आया है और उन्होंने ऑर्डर दिया है भाकुनी को तुरंत कलकत्ता भेज दो।

पूरी भारतीय सेना में सूबेदार सुन्दर सिंह भाकुनी जैसी जीप चलाने वाला दूसरा कोई नहीं था जन्नल साब भी ये बात जानते थे। कमांडेंट साहब को हुकुम हुआ था कि जैसे भी हो सबसे पहले सूबेदार भाकुनी को दिल्ली हैडक्वाटर रिपोर्ट कराओ। भाकुनी को हैडक्वर्टर के गेट पर देखते ही सिपाहियों में भगदड़ मच गई कि भाकुनी आ गया, भाकुनी आ गया।

शाम को जन्नल साहब प्रधानमंत्री को टैंक में बिठाकर सूबेदार से मिलाने हैडक्वार्टर ले कर आए.

इन्दिरा गाँधी ने कहा – “देश की इज्जत तुम्हारे हाथ है भाकुनी! तुम्हारी पोस्टिंग ठीक बंगलादेश बॉर्डर पर पर कर दी है। आसाम के जंगल हैं लेकिन तुम घबराना मत। सारा देश तुम्हें बड़ी उम्मीद से देख रहा है। सूबेदार भाकुनी को असम के जंगलों में गोला-बारूद सप्लाई करने की जिम्मेदारी मिली। गोदाम से गोला-बारूद डिग्गी में भर-भर कर भाकुनी ने सैकड़ों फेरे लगाए।

एक बार की बात है ठीक जिस समय वह माल की डिलीवरी देकर लौट रहा था दुश्मन को पता चल गया। उसके जहाजों ने जंगल में बमों की बरसात कर दी। भाकुनी जीप में अकेला था !

इतने बम फूटे कि सारे जंगल में धुआं ही धुआं हो गया. भाकुनी को याद आया सबसे पहले जनरल साहब को बचाया जाना होगा. पेड़ों के बीच से मोड़-मोड़ कर गाड़ी बचाते हुए वह जीप को उस जगह पहुँचाने की जुगत में लग गए जहाँ जन्नल साहब बड़ी वाली मशीनगन से फायरिंग कर रहे थे. अचानक क्या हुआ कि एक बड़ा सा बम पीछे वाले पहिये पर गिर कर फूटा। गाड़ी हवा में सत्तर-अस्सी मीटर उछल गयी। भाकुनी भी किसी टिड्डे की तरह सीट से उड़ कर हवा में छिटक गया।

बेहोश होने से पहले उसने खुद से कहा कि सूबेदार सुन्दर भाकुनी, मौत आ गई है, एक बार अपने कुलदेवता-ग्रामदेवता गोलज्यू महाराज को याद कर जलती हुई जीप का उड़ना और फिर उसके साथ खुद का अधोदिशा में उछलना भाकुनी को याद रह गया।

होश आया तो क्या देखा कि एक पेड़ के ऊपर अटक गया था। नीचे सुनसान जंगल और लड़ाई का नाम-निशान गायब। बाद में पता चला कि पेड़ पर बेहोश अटके-अटके तीन दिन बीत गए थे. पचास-साठ मीटर ऊँचे पेड़ की चोटी पर सूबेदार और नीचे खतरनाक जंगल। निगाह जमने लगी तो क्या देखा नीचे तीन बाघ एक गैंडे को लेकर जा रहे हैं. भाकुनी की तो सिट्टी पिट्टी गुम हो गई. अब क्या किया जाय?

किसी को आवाज़ लगाता है तो बाघ देख लेंगे, मौका देख कर नीचे को कूद मारता है तो हड्डियां टूट जाने का खतरा. आखिर वो करे तो क्या करे।

जान बचानी मुश्किल हो रहा था भूख-प्यास से बुरा हाल था। तीन दिन और वैसे ही पेड़ पर लटके-अटके बीते. फिर जा कर चौथे दिन दोपहर हो रही थी जब हेलीकॉप्टर की आवाज़ सुनाई दी और ऊपर देखा तो पता लगा कि अपनी ही फौज का हेलीकॉप्टर था उस पर तिरंगा लगा था. जैसे-तैसे कमीज खोल कर सूबेदार भाकुनी ने एक हाथ से झंडा जैसा फहराना शुरू किया, हेलीकॉप्टर के पाइलट ने जैसे ही उन्हें देखा वहीं थम गया।

वहीं खड़े-खड़े हेलीकॉप्टर की खिड़की में से मुंह बाहर निकाल के जन्नल साब बोले – “अरे बाकुनी तुम साला इदर ट्री के ऊपर में क्या करता है!” बिचारे साउथ में कहीं के थे. ऐसे ही हिन्दी बोलते थे।

हेलीकॉप्टर से सीढ़ी उतार कर जन्नल साहब ने खुद सूबेदार भाकुनी को बचाया और अपनी बगल में बिठाया. हाथ मिलाया. बोले, “लो रम पियो सूबेदार बाकुनी भारत लराई जीत गया!”

#शौर्यगाथा

साभार- https://www.facebook.com/BhartiyaSanskriti.BharatBhagyaVidhata से

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