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हिंदुओं के मन में हिंदू होने को लेकर हीन भावना कैसे पनपती है?

वर्तमान समय में हिंदू समाज एक अनोखी समस्या का सामना कर रहा है । लोगों की तीन श्रेणियाँ उभर कर सामने आई है। एक तो वे लोग हैं जो समय के साथ साथ अपनी संस्कृति के महत्व को समझने लगे हैं और स्वतंत्र रूप से उसका वरण करते हैं, दूसरे वे लोग हैं जो समझने की प्रक्रिया में हैं किंतु स्वतंत्र रूप से उसका वरण करने में झिझकते हैं और तीसरे वे हैं जो संस्कृति को अनदेखा कर देते हैं ।

दूसरे और तीसरे प्रकार के लोग अपने ही प्रति हीन भाव से ग्रसित होते हैं । इस समस्या के कई कारण हैं –

लोगों को मात्र धनोपार्जन प्रवृत्ति वाला बनाया जा रहा है, उनसे ये कहा जा रहा है कि – धर्म में क्या रखा है! हिंदू धर्म तो अंधविश्वासों पर आधारित है, सब बातें निरर्थक हैं, इन सब बातों का कोई प्रमाण नहीं है इत्यादि इत्यादि । रामायण और महाभारत को विभिन्न अपमानजनक प्रश्न पूछकर काल्पनिक कहा जाता है और अपनी ही संस्कृति से अनभिज्ञ लोग आत्मरक्षा में विफल हो जाते हैं एवं उन्हें ये बातें सत्य लगने लगती हैं । धर्मग्रंथों को ना पढ़ना एवं परम्पराओं का आदर ना करना मस्तिष्क में रिक्ति पैदा करता है, जिससे अपनी संस्कृति के मूल्यों एवं सांकेतिक कर्मकांडों के पीछे का कारण जाने बिना ही लोग उसे अंधश्रद्धा कहकर दुत्कारने लगते हैं | शास्त्रों को ना पढ़ना, हीन भाव जागने का सबसे बड़ा कारण होता है |
दशकों/सदियों पुरानी प्रथाएं (जैसे – सती प्रथा, बाल विवाह, विधवा विवाह निषेध इत्यादि ) जो अब समाप्त हो चुकी हैं, उनके बारे में पुस्तकों में निरंतर पढ़ाया जाता है | हिन्दू धर्म को इस प्रकार चित्रित किया जाता है जैसे इन कुप्रथाओं के अतिरिक्त हिन्दू धर्म में और कुछ हो ही ना | कहीं भी अच्छाई के बारे में नहीं पढाया जाता है | 19वीं सदी के धर्म सुधारों में मूर्ति पूजा को एक पाप की तरह वर्णित किया गया है, ऐसा लगता है कि पुस्तक किसी मौलवी ने लिखी हो | एक योजनाबद्ध तरीके से हिन्दुओं के मन में अपनी रीतियों – प्रथाओं के प्रति हीन भाव को जगाया जा रहा है | ऐसा करने वाले बहुत बड़े स्तर पर अपने उद्देश्य में सफल भी हुए हैं | हिन्दू संस्कृति में अन्तर्निहित मूल्यों, नैतिक बातों और कर्तव्यों के बारे में किसी भी प्रकार की शिक्षा नहीं दी जाती ; जैसे – वृक्षों की पूजा करने से उनके प्रति आदर बढ़ता है और उन्हें काटने की निर्मम सोच विरले ही आती है ; शिवजी को बेलपत्र अर्पण किये जाते हैं, इसी बहाने एक लुप्त होती प्रजाति की रक्षा की जा सकती है |
दर्शनशास्त्र, मनोविज्ञान, भौतिकी, भूगोल, गणित, रसायनशास्त्र, नैतिकता आदि असंख्य सद्गुणों को अनदेखा करते हुए हिन्दू धर्म के केवल और केवल उस पक्ष पर ध्यान केन्द्रित किया जाता है जो कई वर्षों पहले मुरझा चुका है |

लोगों को सर्वधर्म समभाव की और प्रेरित किया जाता है किन्तु यह अवधारणा अधूरी है, छद्म है क्योंकि यह एकपक्षीय है | सभी धर्मों को बराबर समझने की अपेक्षा केवल हिन्दुओं से की जाती है, प्रतिपक्षीय मजहबों (मजहब और धर्म दो भिन्न अवधारणाएं हैं ) से नहीं | यह अपेक्षा अब दबाव में बदल चुकी है, हिन्दुओं पर यह दबाव डाला जाता है कि तुम्हें धर्मनिरपेक्ष होना ही है जबकि अन्य मजहबों के लोग अपनी स्वतंत्रता का आनंद ले सकते हैं | हिन्दुओं पर धर्मनिरपेक्षता का दबाव इतना बढ़ गया है कि जब भी कोई सजग व्यक्ति इस एकपक्षीय प्रक्रिया पर प्रश्न करता है तो धर्मनिरपेक्षता के ठेकेदार तुरंत उसे सांप्रदायिक घोषित कर देते हैं |
इस विषय में सुषमा स्वराज जी ने लोकसभा में अपने एक भाषण में कहा था कि –

“ चूंकि हम अपने हिन्दू होने पर शर्म महसूस नहीं करते इसलिए हम सांप्रदायिक हैं और इस देश में जब तक आप अपने हिन्दू होने पर शर्मिंदगी महसूस नहीं करते, आपको इन तथाकथित बुद्धिजीवियों से सेक्युलर होने का सर्टिफिकेट नहीं मिल सकता ” – 11/06/1996

इस प्रकार का दबावपूर्ण प्रमाणपत्र हमें देता कौन है, कौन है जो ये निर्धारित करता है कि कोई व्यक्ति धर्मनिरपेक्ष है या नहीं! किसके हाथों में इतना बड़ा अधिकार है कि वह किसी के चरित्र का निर्धारण कर सके! यह बड़ा ही हास्यास्पद विषय है | हमनें इस प्रमाणपत्र का अधिकार उनके हाथों में छोड़ रखा है जो हमारी उपेक्षा करते हैं, हमारे धर्म पर आपत्तिजनक टिप्पणियां करते हैं, हमपर धर्मनिरपेक्ष होने का दबाव डालते हैं; इन्हें कई संज्ञाओं से संबोधित किया जाता है – लेफ्टिस्ट ( वामपंथी ), लिबरल ( उदारवादी ), अर्बन नक्सल, सेक्युलर ( जोकि ये होते नहीं हैं ) |
हिन्दू धर्म किस किस प्रकार आलोचनीय है ये लोग नए नए तरीकों से सामने आते रहते हैं, बताते रहते हैं | इनकी विचारधारा को उत्तर-आधुनिकतावाद ( पोस्ट-मॉडर्निज़्म ) कहा जा सकता है जिसमे ये हिन्दू धर्म की ओर देखते ही इसलिए हैं ताकि कमियां निकाल सकें | पहले तो इन्होने बिना मांगे ही धर्मनिरपेक्ष होने की वैधानिकता बांटनी शुरू कर दी थी, किन्तु धीरे धीरे यह अधिकार पूरी तरह उनके हाथों में खिसकता चला गया | अब वे इसका लाभ उठाते हैं एवं आलोचना करने के बहाने हिन्दू धर्म पर अपमानजनक टिप्पणी करते हैं, तंज कसते हैं और ऐसा करने को वे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता कहते हैं, जोकि वास्तविकता में हिन्दू धर्म तक ही सीमित होती है, अन्य किसी मजहब पर ये टिप्पणी नहीं करते हैं | इससे धीरे धीरे यह प्रतीत होने लगता है कि अन्य किसी मजहब में कमियां हैं ही नहीं, सारी कमियां हम हिन्दुओं में ही हैं |

ऐसा करने के पीछे उनका उद्देश्य हमारे मन में हमारे ही प्रति हीन भाव जगाना होता है क्योंकि जो स्वयं को हीन समझने लगेगा उसे मानसिक रूप से बंधक बनाना अत्यंत सरल हो जाता है, फिर उस व्यक्ति में सोचने समझने की क्षमता क्षीण हो जाती है, उसे ये वामपंथी जो भी बता देते हैं उसे सत्य लगता है | यहीं पर वामपंथी अपने खेल में सफल हो जाते हैं | उनका उद्देश्य मन पर कब्ज़ा करना होता है ताकि वे जो भी कहें वही सत्य मन जाये और वे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की आड़ में वैधानिकता का प्रमाणपत्र बांटते रहें |

ये लोग कई व्यावसायिक क्षेत्रों में मिलते हैं – मीडिया में, सिनेमा में, कॉलेजों में | ये नेता, अभिनेता, समाजसुधारक, प्रोफेसर, पत्रकार अथवा मानवाधिकारियों के रूप में हो सकते हैं | इन्हें पहचानना थोडा कठिन है किन्तु एक बार पहचान लिया तो इनसे घृणा किये बिना नहीं रहा जा सकता | ये किसी हिन्दू के किये हुए गलत कार्य को इस सीमा तक बढ़ा-चढ़ाकर दर्शाते हैं मानो वह गलती समस्त हिन्दू समाज की हो, वही दूसरी ओर अन्य मजहबों ( जिनमे इस्लाम इनका प्रिय है ) के गलत कार्यों को ये लगभग अनदेखा कर देते हैं भले ही वह सामूहिक रूप से किया गया हो | इन लोगों को दिवाली पर जानवर डरते हुए दिखाई देते हैं, इन्हें रक्षाबंधन पित्रसत्ता का प्रतीक लगता है किन्तु इन्हें ईद पर होने वाली हत्याएं नहीं दिखतीं और ना ही इन्हें हिजाब-बुर्के में पित्रसत्ता दिखती है |
हर प्रकार की उपेक्षा और अपमान करके ये लोग आरोप भी उल्टा हिन्दुओं पर ही डाल देते हैं | जिन लोगों को इनके खेल समझ नहीं आते अथवा जो लोग स्वयं को आदर्श व्यक्ति बनाने की होड़ में रहते हैं, वे इनसे प्रभावित हो जाते हैं, और स्वयं को कम आंकने लगते हैं | उन्हें ऐसी प्रतीति होने लगती है कि वामपंथियों द्वारा बताई गयी कमियां हमारे धर्म का बड़ा हिस्सा हैं | ऐसे में लोग अपनी दृष्टि में हिन्दू संस्कृति के प्रति सम्मान कम कर देते हैं ( जोकि उनसे करवाया गया और उन्हें पता भी नहीं चला ) | इस हीन भाव का लाभ लेकर वामपंथी वैधानिकता बांटते हैं |

ये हीन भाव धीरे धीरे इतना गहरा जाता है कि जब तक कोई दूसरा अथवा विदेशी, हिन्दू धर्म की प्रशंसा नहीं करता, लोग भी कतराते हैं| उन्हें अपने हिन्दू होने पर शर्म आने लगती है, वे फिर हिन्दू संस्कृति से जुड़े भी नहीं रहना चाहते, वे पाश्चात्य सभ्यता की ओर उन्मुख हो जाते हैं क्योंकि उन्हें ऐसा भ्रम होता है कि उसमे कोई कमी नहीं है, वह श्रेष्ठ है | वामपंथियों के शिकार लोगों को ईसाई तौर-तरीकों में स्वतंत्रता का छद्म- अनुभव होता है | अंततः उन्हें हिंदी से भी द्वेष हो जाता है |

साभार- https://kreately.in/ से

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