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अब पोर्टल बताएगा कैसा है अस्पताल

अगर आप छुट्टियों पर जाने की योजना बना रहे हैं तो आप इंटरनेट के जरिये रेस्तरां और होटलों के बारे में जानकारी हासिल कर सकते हैं। आप कमरों का आकार, वहां मिलने वाली सेवाएं और किराया तो मालूम कर ही सकते हैं, यह भी देख सकते हैं कि वहां ठहर चुके लोगों ने उस होटल को कितना बेहतर बताया है। लेकिन अगर आपको किसी अस्पताल में भर्ती होना हो तो आप कैसे पता लगाएंगे कि कौन सा अस्पताल अच्छा है? आप सबसे पहले अपने पारिवारिक डॉक्टर से बात करेंगे। फिर अपने मित्रों और परिजनों से यह पता करने की कोशिश करेंगे कि आपकी बीमा कंपनी का उस अस्पताल से समझौता है या नहीं ताकि आपको बीमा के दावे में आसानी हो। लेकिन अगर अस्पतालों के लिए होटलों की ही तरह रेटिंग की व्यवस्था होती तो अपने लिए सही अस्पताल चुनने में आपको सहूलियत नहीं होती?
आईसीआईसीआई लोंबार्ड जनरल इंश्योरेंस ने हाल में ‘हेल्थ एडवाइजर’ नाम से प्लेटफॉर्म शुरू किया है, जो 10 शहरों के लगभग 1,000 अस्पतालों के लिए रेटिंग मुहैया कराता है। यह प्लेटफॉर्म अस्पतालों की भौगोलिक स्थिति, उनके द्वारा मुहैया कराई जाने वाली सेवाओं, इलाज के खर्च तथा देखभाल की गुणवत्ता आदि के बारे में जानकारी देता है। उपचार की गुणवत्ता निर्धारित करने के लिए आईसीआईसीआई लोंबार्ड ने टाटा इंस्टीट्ïयूट ऑफ सोशल साइंसेज के साथ काम किया है। अस्पतालों से मिली जानकारी के आधार पर रेटिंग के लिए 20 पैमाने तय किए गए हैं। इनमें प्रति शैया डॉक्टर अथवा नर्स की संख्या, अस्पताल से छुट्टïी मिलने की प्रक्रिया, उसमें ठहरने की अवधि, चिकित्सक के मना करने पर भी अस्पताल छोडऩे वाले मरीजों की संख्या तथा ऑपरेशन के दौरान संक्रमित हो गए मरीजों का प्रतिशत शामिल हैं।

जो दावे आए हैं, उनके आधार पर पोर्टल 30 सामान्य ऑपरेशनों और उपचारों के बारे में जानकारी देता है। इनमें घुटने को पूरी तरह बदलना, मोतियाबिंद, कूल्हे की हड्डïी बदलना, अपेंडिक्स के ऑपरेशन, टॉन्सिल हटाना आदि शामिल हैं। तुलना करने के लिए ऐसे कमरे का किराया लिया जाता है, जिसमें दो मरीज रहते हैं क्योंकि बीमा के मामलों में मरीज अधिकतर ऐसे ही कमरों में रहना पसंद करते हैं।

आईसीआईसीआई लोंबार्ड जनरल इंश्योरेंस में अंडरराइटिंग्स एंड क्लेम्स के प्रमुख संजय दत्ता कहते हैं कि दरों के बारे में अस्पताल ही बताते हैं, लेकिन हर मरीज के लिए दर अलग-अलग हो सकती हैं। मिसाल के तौर पर यदि आप कॉर्पोरेट ग्राहक हैं तो आपके नियोक्ता द्वारा ली गई चिकित्सा बीमा योजना के तहत आपके कमरे का किराया अलग हो सकता है। कमरे का किराया इस बात पर भी निर्भर करता है कि आप किस तरह का कमरा चाहते हैं या उसमें किस तरह की सुविधाएं चाहते हैं।

ध्यान रखें कि प्लेटफॉर्म पर सूचीबद्घ सभी अस्पताल कमरों के किराये नहीं बताते क्योंकि इसका खुलासा उनकी मर्जी पर छोड़ दिया गया है। मुंबई और कोलकाता में अस्पतालों से कमरों का किराया पता करना मुश्किल है क्योंकि ज्यादातर डॉक्टर परामर्श चिकित्सक यानी कंसल्टेंट के तौर पर कई अस्पतालों से जुड़े होते हैं और अलग-अलग अस्पताल में कमरों के किराये अलग-अलग होते हैं। आईसीआईसीआई लोंबार्ड में प्रबंध निदेशक एवं मुख्य कार्याधिकारी भार्गव दासगुप्ता कहते हैं कि दिल्ली और दक्षिण भारत में अधिकतर अस्पताल कमरों का तयशुदा किराया रखते हैं। वे डॉक्टरों की फीस आदि भी पहले से तय कर लेते हैं, इसलिए इनका खुलासा करने में उन्हें कोई दिक्कत नहीं होती।

लेकिन एक ही अस्पताल में ऑपरेशन कराने का खर्च अलग-अलग भी हो सकता है और वह इस बात पर निर्भर करता है कि ऑपरेशन करने वाला वरिष्ठï डॉक्टर है या कनिष्ठï। इस पोर्टल पर मरीजों की प्रतिक्रिया दिखाने की व्यवस्था भी है। इन्हें मरीज को अस्पताल से छुट्टïी मिलने की तारीख की पुष्टिï होने के बाद ही पोर्टल पर दिखाया जाता है। प्रतिक्रिया अस्पताल के पास भी भेजी जाती है। दासगुप्ता कहते हैं, ‘किसी अस्पताल को हमारे पैमानों या ग्राहकों की प्रतिक्रिया के आधार पर कम रेटिंग मिले तो भी हम उसे काली सूची में नहीं डालते। अस्पताल को काली सूची में तभी डाला जाता है, जब धोखाधड़ी का ठोस सबूत मिलता है।’

अस्पताल परामर्श फर्म हॉसमैक के प्रबंध निदेशक विवेक देसाई कहते हैं कि अस्पतालों द्वारा दी जाने वाली सेवाओं और खर्च की तुलना करने के मामले में यह पोर्टल बेहतर हो सकता है, लेकिन अस्पतालों को रेटिंग देना उलझन भरा है। अस्पताल की साख इस बात से तय होती है कि वहां कितने मरीजों की मौत होती है या वहां के डॉक्टरों को कितने साल का तजुर्बा है। ऐसी सूचना हासिल करना मुश्किल हो सकता है। इसके बजाय बुनियादी ढांचे और सुविधाओं के आधार पर अस्पतालों की रेटिंग की जा सकती है। मिसाल के तौर पर पूरी तरह वातानुकूलित अस्पताल या नाजुक मरीजोंं की चौबीसो घंटे देखभाल करने वाले अस्पताल को अच्छी रेटिंग मिल सकती है। यह होटलों की रेटिंग जैसा ही हो सकता है यानी पांच सितारा या चार सितारा अस्पताल। देसाई कहते हैं, ‘जिस तरह होटलों की ग्रेडिंग के पैमाने हैं, उसी तरह अस्पतालों के लिए भी शर्तें होनी चाहिए। मसलन किसी क्रिटिकल केयर यूनिट को कोई आयुर्वेदिक या होमियोपैथिक चिकित्सा नहीं संभाल सकता। जब तक ऐसी रेटिंग नहीं होती है तब तक मरीजों को लोगों से सुनकर, अपने पारिवारिक डॉक्टर की सलाह पर या बीमा कंपनी के हिसाब से ही अस्पताल चुनना होगा।’

साभार- http://hindi.business-standard.com/ से

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