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हिंदू अपने ही देश में कब तक डर कर रहेगा?

इतिहासकार सीताराम गोयल ने अपनी पुस्तक ‘भारत में इस्लामी साम्राज्यवाद की कहानी’ में बताया है कि सच्चे इतिहास का ज्ञान ही भारत में हिन्दू चेतना की और सदभावपूर्ण हिन्दू-मुस्लिम संबंधों की भी कुंजी है। उन्होंने प्रामाणिक विश्लेषण कर के दिखाया कि हालिया दशकों में यहां झूठे इतिहास- प्रचार के कारण ही यह संबंध तनावग्रस्त रहे हैं।

भारत में हिन्दू समाज बहुसंख्यक की तरह न रहता है, न सोचता है। नागरिकता कानून पर सब से पहला विरोध उन्होंने ही किया। असम, त्रिपुरा और बंगाल की घटनाएं कोई अपवाद नहीं है। महाराष्ट्र में शिव सेना ने भी इस का विरोध किया, जो भाजपा से भी प्रखर हिन्दूवादी मानी जाती रही है। यह भी याद रहे कि कांग्रेस, सपा,बसपा, कम्युनिस्ट पार्टियां भी मूलत: हिन्दुओं से भरी हैं। उन में कहने को इक्का-दुक्का मुसलमान हैं। सच यह है हिन्दू न केवल दुनिया में, बल्कि भारत में भी सब से प्रामाणिक अल्पसंख्यक हैं।

अर्थात दुनिया में ‘माइनॉरिटी’ की अवधारणा से जो समझा जाता है, कि जिसे उपेक्षित, वंचित, सताया गया हो। अत: जिसे विशेष उपायों से सुरक्षा देना उचित हो। जैसे, यूरोप में यहूदी अथवा जिप्सी, संयुक्त राज्य अमेरिका में नीग्रो, मिस्र में कॉप्टिक क्रिश्चियन्स, या पाकिस्तान- बंगलादेश में हिन्दू लोग। ये सब ऐसे समुदाय हैं, जिन्हें दूसरों के हाथों उत्पीड़ित, अपमानित होना पड़ा है। भारत में तो उलटा ही रहा था। यहां अत्यंत अल्पसंख्या में होते हुए भी मुसलमानों ने राज किया। आज भी यहां कई मुस्लिम नेता ठसक से कहते हैं कि उन्होंने भारत पर 600 वर्षों तक शासन किया है और फिर करेंगें। जबकि हिन्दू अपना ऐतिहासिक दमन, उत्पीड़न, वंचना बताने से भी डरते हैं। अपने बच्चों को भी कुछ नहीं बताते, या झूठा इतिहास पढ़ाते हैं।

कश्मीर से लेकर केरल तक आज भी हिन्दुओं के उत्पीड़न पर मुंह बंद रखते हैं। ठीक दिल्ली में हिन्दू मंदिर को भीड़ तोड़ डालती है, और हिन्दुओं से भरे बड़े अखबार बताने में भी लजाते हैं कि किस ने और क्या कहते हुए यह विध्वंस किया? इस बीच, अकबरुद्दीन ओवैसी खुले भाषण (4 जुलाई 2019) में कहते हैं कि ‘आरएसएस वाले उन से डरते हैं’ कि ‘मुसलमानों को शेर बनना होगा ताकि कोई चायवाला सामने खड़ा न हो सके।’ वे अपनी पंद्रह मिनट वाली धमकी भी बार- बार दुहराते हैं कि उन्हें पुलिस हटा कर यह समय दे दो। यह सब प्रमाण है कि भारत में असली प्रताड़ित, अल्पसंख्यक, वंचित हिन्दू ही हैं। मुस्लिम नेताओं के सार्वजनिक वक्तव्य भी इसी की पुष्टि करते हैं। यह गत सौ साल से चल रहा है। डॉ. अंबेदकर ने इस के कई उदाहरण अपनी पुस्तक ‘पाकिस्तान आॅर पार्टीशन आॅफ इंडिया (1940) में दिए हैं। जैसे, बड़े सूफी और निजामुद्दीन दरगाह के प्रमुख ख्वाजा हसन निजामी ने 1928 ई. में बाकायदा एक घोषणापत्र में कहा, ‘‘मुसलमान कौम ही भारत के अकेले बादशाह हैं।

उन्होंने हिन्दुओं पर सैकड़ों वर्षों तक शासन किया और इसलिए उन का इस देश पर अक्षुण्ण अधिकार है। हिन्दू संसार में एक अल्पसंख्यक समुदाय हैं। … लोगों पर शासन करने की उन की योग्यता ही क्या है? मुसलमानों ने शासन किया है और मुसलमान ही शासन करेंगे।’’ यानी, मुसलमान नेता हिन्दुओं की वास्तविकता से अवगत ही नहीं, बल्कि उस का हिकारत से उल्लेख भी करते हैं। सैयद शहाबुद्दीन ने एक बार कहा था कि भारतीय शासक सेक्यूलरिज्म का पालन इसलिए करते हैं क्योंकि मुस्लिम देशों से डरते हैं। उन्होंने यह धमकी भी दी थी कि अरब देशों से कहकर भारत को तेल की आपूर्ति बंद करा देंगे! सन 1989-90 में कश्मीर में खुला नारा दिया गया, ‘‘असि छु बनावुन पाकिस्तान, बटव रोस तु बटन्यव सान’’ (हम पाकिस्तान बनाएंगे, कश्मीरी पंडितों को खत्म कर, मगर उनकी स्त्रियों को रख कर)। वहीं यह नारा भी था, ‘‘या रलिव, या गलिव, या चलिव’’ (या तो इस्लाम में मिल जाओ, या खत्म हो जाओ, या भाग जाओ)।

आज पश्चिम बंगाल के सीमावर्ती क्षेत्रों में हिन्दुओं को यह मर्मबेधी धमकी त्रस्त रखती है- ‘‘गोरू राखबि कैंपे, टाका राखबि बैंके, बोउ राखबि कोथाय?’’ (गायों को सी.आर.पी.एफ. कैंपों में रख कर बचाओगे, रुपये को बैंक में रखकर बचाओगे, अपनी स्त्रियों को कहां रखोगे?’’जरा इस की क्रूरता को महसूस करें! क्या भारत में ऐसा अपमान, दमन, जबरन धर्मांतरण, बलात्कार तथा मालाबार से लेकर नंदीमर्ग, गोधरा, मराड, कैराना, जैसे अनगिनत सामूहिक संहार तथा पलायन किसी और समुदाय के हुए? अत: भारत में न केवल हिन्दुओं की स्थिति उत्पीड़िता अल्पसंख्यक जैसी है, बल्कि उत्पीड़न करने वाले स्वयं यह कहने में संकोच नहीं करते।

समय-समय पर ईमाम बुखारी, सैयद शहाबुद्दीन, आजम खान, कमाल फारुकी, फारुख अब्दुल्ला, महबूबा मुफ्ती आदि कितने ही नेता उग्र बयानबाजियां और सरकार एवं न्यायालय तक को धमकियां भी देते रहे हैं। यदि भारत में यह हाल, तो पाकिस्तान, बांग्लादेश में हिन्दू दुर्दशा की कल्पना ही की जा सकती है! इस पृष्ठभूमि में, नागरिकता संशोधन कानून पर जनसांख्यिकी दृष्टि से भी ध्यान देना चाहिए। आज दुनिया में जनसांख्यिकी एक जिहादी हथियार जैसी भी प्रयोग हो रही है। अमेरिका, यूरोप भी इस से चिंतित है। अभी ब्रिटेन में कंजरवेटिव पार्टी की जीत में यह भी कारण रहा, जहां लोग मुस्लिम आव्रजन को रोकना चाहते हैं। क्योंकि कई इस्लामी संगठनों की रणनीति मुस्लिम आबादी बढ़ाकर यूरोप पर प्रभुत्व कायम करना भी है। कुछ भारतीय मुस्लिम नेता भारत के लिए भी यही मंसूबे रखते रहे हैं। इसी कारण, पूर्वी यूरोप ने मुस्लिम आव्रजन पर पूरी पांबदी लगा दी है। इतिहास भी साफ दिखाता है कि किसी देश में मुस्लिम जनसंख्या का एक सीमा पार करना और अशांति पैदा होने में सीधा संबंध है।

‘‘ हिन्दू संसार में एक अल्पसंख्यक समुदाय हैं। … लोगों पर शासन करने की उनकी योग्यता ही क्या है? मुसलमानों ने शासन किया है और मुसलमान ही शासन करेंगे।’’ यानी, मुसलमान नेता हिन्दुओं की वास्तविकता से अवगत ही नहीं, बल्कि उस का हिकारत से उल्लेख भी करते हैं।

तब दुनिया में हिन्दुओं के एक मात्र देश, भारत को इस की फिक्र क्यों नहीं करनी चाहिए कि यहां जनसांख्यिकी और न बिगड़े। यहां के मुसलमान तो पहले ही अपने लिए एक अलग देश तक ले चुके हैं! इस स्थिति का उपाय क्या है? महान इतिहासकार सीताराम गोयल ने अपनी पुस्तक ‘भारत में इस्लामी साम्राज्यवाद की कहानी’ में बताया है कि सच्चे इतिहास का ज्ञान ही भारत में हिन्दू चेतना की और सदभावपूर्ण हिन्दू-मुस्लिम संबंधों की भी कुंजी है। उन्होंने प्रीमाणिक विश्लेषण कर के दिखाया कि हालिया दशकों में यहां झूठे इतिहास-प्रचार के कारण ही यह संबंध तनावग्रस्त रहे हैं। बनावटी बातों से कुछ प्रश्न सुलझने के बदले और उलझते जाते हैं। भारत किस का है? इस प्रश्न ने पिछले सौ सालों से भारत को उलझा रखा है। इस का दोष मुख्यत_ हमारे नेताओं का है।

जब ख्वाजा हसन निजामी और मुहम्मद अली जिन्ना जैसे नेताओं ने मुसलमानों को शासककौ म (मास्टर रेस) बताते हुए हिन्दुस्तान पर एकाधिकार जताया, तो गांधी-नेहरू ने उन्हें चुनौती देने के बजाए अनुनय-विनय कर बहलाने की कोशिश की। नतीजन बात बिगड़ती गई और देश का आकस्मिक, खूनी विभाजन हुआ। यह सब बातें यहां नई पीढ़ी के हिन्दू और बहुतेरे मुसलमान भी नहीं जानते। यहां तमाम प्रभावी विमर्श कथित सेक्यूलरवाद की आड़ में हिन्दू-विरोधी और पाखंडी है। इस ने सच छुपाने, झूठ फैलाने की नीति रखी है। उदाहरण के लिएए 1947 ई. में विभाजन के समय सभी जानते थे कि पूरे देश के मुस्लिमों ने पाकिस्तान बनाने का समर्थन किया था। पाकिस्तान भारत के सभी मुसलमानों के लिए बना था। आज यह बात कितने लोग जानते हैं?

साभार-https://yathavat.com/ से

यशस्वी लेखक स्व. सीताराम गोयल की पुस्तकें इस लिंक पर उपलब्ध हैं-

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