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धमकियाँ देने की मुस्लिम राजनीति की ये कुत्सित परंपरा कब तक चलेगी

आजम खान द्वारा भारतीय सेना की खिल्ली उड़ाना, ओवैसी द्वारा सरकार को चेतावनी देना, या फारुख अब्दुल्ला द्वारा मजाक उड़ाना – यह सब पिछले सौ साल से चल रही मुस्लिम राजनीति के क्रम में ही है। इस की मूल बात ताकत का गुरूर है। इस की सीमाएं देखने से पहले उस राजनीतिक परंपरा को देख लें।

अगस्त 1946 में कलकत्ता में ‘डायरेक्ट एक्शन’ के दो दिन में दो हजार हिन्दुओं का संहार करवा कर जिन्ना ने कांग्रेस को धमकाया था कि भारत-विभाजन मान लो। यह कह कर कि, ‘अब हिन्दुओं का हित इसी में है कि वे पाकिस्तान की माँग स्वीकार कर लें, चाहे तो केवल हिन्दुओं को कत्लेआम और विनाश से बचाने के लिए ही।’

उस से पहले 1926 में मौलाना अकबर शाह खान ने महामना मदन मोहन मालवीय को सार्वजनिक चुनौती दी थी कि ‘पानीपत का चौथा युद्ध’ आयोजित करें। उस में भारत की तात्कालिक जनसंख्या अनुपात से 700 मुस्लिम रहें और 2200 हिन्दू। घमंड से मौलाना ने यहाँ तक कहा कि वे लड़ाई के लिए साधारण मुसलमान ही लाएंगे, पठान या अफगान नहीं, जिन से हिन्दू ‘प्रायः आतंकित रहते हैं।’ मौलाना के अनुसार सात सौ मुस्लिम बाइस सौ हिन्दुओं को यूँ ही हरा देंगे।

लगभग उसी समय नामी विद्वान, सूफी और दिल्ली निजामुद्दीन दरगाह के प्रमुख ख्वाजा हसन निजामी ने कहा, ‘मुसलमान कौम ही भारत के अकेले बादशाह हैं। उन्होंने हिन्दुओं पर सैकड़ों वर्षों तक शासन किया और इसलिए उन का इस देश पर अक्षुण्ण अधिकार है। हिन्दू संसार में एक अल्पसंख्यक समुदाय हैं। उन्हें आपसी लड़ाइयों से ही फुरसत नहीं है। वे गाँधी में विश्वास करते हैं और गाय की पूजा करते हैं। वे दूसरे के यहाँ पानी पीकर अपवित्र हो जाते हैं। हिन्दू स्वायत्त शासन की न इच्छा-शक्ति रखते हैं और न उन के पास इस के लिए समय ही है। उन्हें आपसी लड़ाइयाँ ही लड़ने दें। दूसरे लोगों पर शासन करने की उन की क्षमता ही क्या है? मुसलमानों ने शासन किया है और मुसलमान ही शासन करेंगे।’

यह मानसिकता विभाजन के बाद भारत में भी नहीं बदली। एक बार सैयद शहाबुद्दीन ने धमकाया था कि अरब देशों से कह कर तेल की आपूर्ति बंद करा देंगे। फिर, यह ओवैसी वाली बात तो कई मुस्लिम नेता कहते रहे हैं कि ‘जरा पुलिस हटा लो तो हम दिखा देंगे।’

दुर्भाग्यवश, यह सब कोरी धमकी ही नहीं रही। स्वतंत्र भारत में कश्मीर से पूर्णतः और असम, केरल में अंशतः केवल हिन्दू ही मारे भगाए गए। एक भी मिसाल नहीं कि यहाँ किसी क्षेत्र से मुस्लिम समुदाय रूप में भगाए गए। अतः सिद्धांत व्यवहार, दोनों में मुस्लिम नेता ताकत की राजनीति करते रहे हैं। उन की कथनी, करनी, शैली सभी दिखाती है कि वे दुर्बल नहीं, दबंग हैं। यही ध्यातव्य है।

सौ साल पहले जब मुस्लिम नेताओं ने भारत में यह राजनीति शुरू की, तो विविध दुर्योग से वे सफल हुए और पाकिस्तान बनवा लिया गया। यहाँ हिन्दू नेता इतने भोले साबित हुए कि मुसलमानों को अपना अलग देश बना कर दे देने के बाद भी फिर उन्हें इच्छानुसार यहीं रहने की सुविधा व पूरी मजहबी आजादी भी दे दी!

उसी भारत को उन्हीं मुस्लिमों द्वारा दुनिया में बदनाम किया जाता है। क्या यह अहसानफरामोशी और दबंगई सदा चलती रह सकती है? अधिकांश मुस्लिम नेता मानते हैं, कि हाँ, चल सकती है। बल्कि यह उन का उसूल है कि हर कहीं इस्लामी राज बनाएं। इस के लिए उन का एक मात्र तर्क, वही ताकत का गुरूर है। उन के विद्वान और आलिम भी यही कहते हैं कि हिन्दू लोग बनिया दिमागी, भीरू, संकीर्ण होते हैं, इसलिए उन्हें हराकर मुसलमान फिर राज कर सकते हैं।

सारा खेल इस मानसिकता का है। वरना, मुस्लिम नेता जानते हैं कि चीन, रूस या सिंगापुर उन जैसे मुस्लिमों के साथ क्या करता है। चीन में अवैध मस्जिदें ढहा दी जाती है, बच्चों के नाम इस्लाम, कुरान, आदि रखने पर प्रतिबंध है, बुर्का पहनना मना है। फिर भी उसी चीन के लिए पाकिस्तानी नेता बिछे रहते है! भारत में भी सारे मुस्लिम प्रदर्शन अमेरिका, इजराइल के खिलाफ होते हैं। आज तक चीनी दूतावास पर कोई मुस्लिम प्रदर्शन होता नहीं दिखा। इस का मतलब क्या है?

वही, ताकत का तर्क। जिन देशों को इस्लामी राजनीति के प्रति कोई मुगालता नहीं और वे उस के साथ वैसे ही पेश आते हैं जैसे आना चाहिए, उन के साथ मुस्लिम नेता आदर व अनदेखी का व्यवहार करते हैं। इस के उलट, जिन देशों ने अज्ञानवश तथा लोकतंत्र, मानवीयता की गलत समझ में इस्लामी ऊल-जूलूल को भी सिर पर बिठाया, उन्हें तबाह, परेशान करने का कोई मौका मुस्लिम नेता नहीं छोड़ते। दिल्ली से लेकर लंदन तक यही नजारा है।

तो क्या यह सदैव चलता रहेगा कि मुसलमानों को चीन से शिकायत नहीं, मगर भारत से है? क्या आज यहाँ कोई जिन्ना दंगे, ब्लैकमेल वाले ‘डायरेक्ट एक्शन’ की राजनीति से सफल हो सकता है? ये सवाल केवल भारत के संदर्भ में नहीं हैं।

मुस्लिम अपने को अंतर्राष्ट्रीय समुदाय मानते हैं। इसलिए, यहाँ और दुनिया भर में दशकों से लश्करे तोयबा, अल कायदा, इस्लामी स्टेट, आदि की भयंकर करतूतें उन्हें ‘ताकत’ का अहसास देती हैं। कि आज नहीं तो कल वे हावी होंगे। यहाँ भोले, सज्जन मुस्लिम लड़के भी ओसामा बिन लादेन पर गर्व करते थे। पर सोचें कि जिस समुदाय के पास दुनिया को हिंसा, धमकी और शिकायत के सिवा कुछ देने को न हो, वह ज्ञान-विज्ञान और सभ्यता-संस्कृति से संपन्न ‘काफिरों’ को हरा देगा? अधिकांश उलेमा मानते हैं कि हाँ, वे दुनिया को हराकर इस्लामी राज बना लेंगे।

हालाँकि विवेकशील मुसलमान समझे बिना नहीं रह सकते कि जिस ताकत का अहंकार मुस्लिम नेताओं को है, ठीक उस में भी वे सिफर हैं। आज लड़ाई छुरे, कट्टे या ट्रक से नहीं लड़ी जाती – उस से आप केवल निरीह लोगों को मार सकते हैं। पर संगठित युद्ध के सारे आधुनिक हथियार गैर-मुसलमानों ने विकसित किए हैं। यह उन की भलमनसाहत है कि अल कायदा, इस्लामी स्टेट और जिहादियों से निपटते हुए वे आम मुस्लिम नागरिकों की फिक्र करते हैं। कश्मीर में यही हो रहा है। वरना वैसे पत्थरबाज बहादुर चीन या रूस में भी दिखते! क्या इस का अर्थ नहीं समझना चाहिए?

यह भी स्मरण रहे कि इस्लाम को पूरी दुनिया में दो ही देशो में सत्ता लेकर भी छोड़नी पड़ी – स्पेन और भारत। हाल में भी लगभग एक लाख प्रशिक्षित पाकिस्तानी सेना ने भारत के सामने आत्मसमर्पण किया। केवल तेरह दिन की लड़ाई में, जिसे पाकिस्तान से शुरू किया था।

इसलिए आजम या ओवैसी की गैर-जिम्मेदार बयानबाजियों पर कोई कुछ नहीं कहता, तो इस से गलत अर्थ नहीं लेना चाहिए। यदि यह उन की ‘ताकत’ है, तो इस ने अब तक किस का हित किया? अनेक मुस्लिम भी वैसी बयानबाजी गलत मानते हैं। पर स्वतंत्रता-पूर्व भारत में भी ऐसे मुस्लिम बड़ी संख्या में थे। किन्तु उन की आवाज संगठित नहीं हो पाती और इसीलिए मुस्लिम समाज की दिशा वे नहीं तय करते। उन्हें यह कमी दूर करने पर सोचना चाहिए।

साभार-http://www.nayaindia.com से

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