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कब तक मात खाओगे मियां…!

गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं-
भरुहाए नट भाँट के,चपरि चढ़े संग्राम।
कै वै भाजे आइहैं, कै बाँधे परिनाम।।

इसका अर्थ है कि- भाटों के भड़काने से जोश में आकर यदि नट(नाचने वाले) लोग लड़ने चले जाएं तो परिणाम स्वरूप या तो वे युद्ध के मैदान से भाग आयेंगे या फिर क़ैद कर लिए जाएंगे।
तात्पर्य यह कि जोश में आकर अनाधिकृत कार्य करने वाले या तो पछतावा करते हैं या फिर खिसीयानी बिल्ली की तरह खंबा नोचते हैं!! अंतरराष्ट्रीय समुदाय का कश्मीर मसले पर समर्थन हासिल करने के तमाम पैंतरे आजमाने के बाद भी जब कहीं से समर्थन नहीं मिला तो पड़ोसी देश के प्रधानमंत्री अब खिसीयानी बिल्ली की तरह खंबा ही तो नोच रहे हैं। अरे मियां! यह क्रिकेट नहीं, राजनीति है। क्रिकेट में ग्यारह खिलाड़ी जीतने के लिए अपना-अपना योगदान देते हैं, उसमें किसी का कम तो किसी का अधिक योगदान होता है, लेकिन वे सब अपने कप्तान के निर्देशों का पालन करते हैं। परंतु आपके सियासी मैदान में तो खिलाड़ी अपने कप्तान को अपनी ऊंगलियों पर नचा रहे हैं…और वह नाच रहा है!! इस तरह तो आप क्रिकेट में अपनी योग्यता और नेतृत्व क्षमता से प्राप्त प्रतिष्ठा को मिट्टी में मिला रहे हो मियां!!

आपके यहां तो आलम यह है कि आपका एक मंत्री पाव-पाव, आधा-आधा पाव के परमाणु बम जैसी हास्यास्पद बात, सार्वजनिक मंचों से उच्चारित कर अपना ज्ञान बघार रहा है !! पता नहीं किस चांडाल चौकड़ी से घिरे बैठे हैं आप, जो आपको भारत जैसे शक्तिशाली देश के खिलाफ युद्ध करने का हौसला देते हैं। कितनी बार मात खाओगे मियां…! अपना घर तो संभलता नहीं और चले हैं पड़ोसी के मसले में टांग अड़ाने…!

घरेलू मोर्चे पर कुछ जगह निराश करने वाले हमारे प्रधानमंत्री ने वैश्विक शक्तियों को जिस चतुराई पूर्वक साधा है, उसके आगे आपकी एक नहीं चलने वाली। अमेरिका में हुआ “हावड़ी मोदी” कार्यक्रम आपको “हाय रे मोदी” नजर आया होगा…! हमारे प्रधानमंत्री का जलवा देख कर कुछ तो सबक लो मियां ! “बोये पेड़ बबूल के, आम कहां से खाय।” यह कहावत तो सुनी ही होगी आपने ? जमाने भर के आतंकी संगठनों रूपी पेड़ को पाल पोस कर बड़ा करने वाला आपका देश , आज अपने ही बोये कांटो से परेशान हैं। भुकतो अपनी करनी का फल…! अब तो आपका यह दिवास्वप्न देखना बंद ही हो जाना चाहिए कि “कश्मीर हमारा है, और एक दिन हम इसे लेकर रहेंगे।”

अनुच्छेद 370 यूं ही नहीं हटा दी गई है… आज अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर आप की गुहार को अगर कोई तवज्जो नहीं दे रहा है तो इसका कारण है “पानी पहले पाल बांधना।” जो हमारे प्रमुख और उनकी टीम पिछले कई वर्षों से कर रहे थे। और आप, अपनी आतंकपरस्त सेना की कठपुतली बने रहे ! अब इस दुष्प्रचार से बाज आओ मियां ! और अपने घर को संभालो, कहीं ऐसा ना हो कि जो आपके पुरखों के छल कपट से हासिल है, वह भी हाथ से निकल जाए…! जिसकी आशंका गाहे-बगाहे आप खुद करते रहते हैं।

संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा घोषित 25 आतंकी संगठनों को पालने से अच्छा है आप अपने देश की भावी पीढ़ी के भविष्य की चिंता करें। वह पैसा जो आप संयुक्त राष्ट्र द्वारा प्रतिबंधित आतंकियों को पालने-पोसने और पेंशन देने में खर्च कर रहे हैं, उसे अपने देश के विकास कार्यों में लगाएं। और भारत के साथ अपने संबंधों को सूत-साँवल में लाएं…! भारतीय अल्पसंख्यकों की आवाज बनने की बजाय आप अपने देश के अल्पसंख्यक ही चिंता करें, जो आजादी के समय 23% थी जो आज घटकर 3% रह गई है। जबकि हमारे यहां अल्पसंख्यकों की निरंतर वृद्धि हुई है।
बदला लेने की सोच को स्वयं को बदलने की सोच में परिवर्तित करो मियां ! इसी में सबका भला है। क्योंकि यही एकमात्र सीधी रहा है।अगर सीधी राह को छोड़कर हम उबड़ खाबड़ मार्ग पर चलेंगे तो सिर्फ ठोकरें ही मिलेगी, जो आप लगातार खा रहे हैं…!

बेंजामिन फ्रैंकलीन का कथन है कि- “बुद्धिमान व्यक्ति को सलाह की कम आवश्यकता होती है और मूर्ख इसे आवश्यक नहीं समझते…!” अब आप क्या हैं… इसका आकलन आप ही करो मियां…!!

 

 

 

 

 

– कमलेश व्यास ‘कमल’

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