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मल मास कैसे बना अधिक मास और पुरुषोत्तम मास, वैदिक ऋषियों की अनुपम खोज

धर्म ग्रंथों के अनुसार तीन वर्ष में एक बार पुरुषोत्तम मास आता है। इसे अधिक मास भी कहते है। पहले हम ये जान लेते है कि ज्योतिष् शास्त्र के अनुसार जिस मास में अमावस्या से अमावस्या के बीच में कोई संक्रांति न पड़े उसे अधिक मास कहते हैं। संक्रांति का अर्थ सूर्य का राशि परिवर्तन से है। सूर्य का एक राशि से दूसरी राशि में प्रवेश को ही संक्रांति कहते है। ज्योतिषीय गणना के अनुसार एक सौर वर्ष 365 दिन 6 घंटे 11 मिनट का होता है तथा एक चंद्र वर्ष 354 दिन 9 घंटे का माना जाता है। सौर वर्ष और चंद्र वर्ष की गणना को बराबर करने के लिए अधिक मास की उत्पत्ति हुई।

मलमास” हिंदू पंचांग के अनुसार प्रत्येक तीन वर्ष पर आने वाला अधिक मास !! इस वर्ष मलमास 16 मई से 13 जून तक है । अंग्रेजी कैलेंडर के हिसाब से 12 महीने होते हैं,लेकिन क्या आपको पता है कि हिंदुओं की मान्यता के अनुसार प्रत्येक तीन साल में एक साल 13 महीनों का होता है ? आपको यकीन भले न हो, लेकिन यह सच है। चलिए हम आपको बताते हैं इससे जुड़ी सच्चाई। हर तीसरे साल जो तेरहवां महीना आता है,उस महीने को मलमास कहा जाता है। अंग्रेजी में इस माह का जिक्र नहीं है, लेकिन हिंदुओं की मान्यता के अनुसार एक माह मलमास का होता है, इसे पुरुषोत्तम मास भी कहा जाता है।
इसका नाम पुरूषोत्तम मास पड़ने की कहानी भी रोचक है। मल मास ने क्षीर सागर में भगवान विष्णु के पास जा कर प्रार्थना की कि भगवान अगर मैं इतना ही बुरा हूं तो मुझे बनाया ही क्यों ? क्योंकि हर नक्षत्र,हर दिन,हर ग्रह का कोई न कोई स्वामी है परंतु मेरा कोई स्वामी न होने के कारण कोई भी इस मास में शुभ कार्य नही करता। तब भगवान ने वरदान दिया कि आज से तुम मेरे नाम ए जाने जाओगे अर्थात पुरुषोत्तम के नाम से तथा इस माह मे मेरी भक्ति करने वालों को असंख्य पुण्य की प्राप्ति होगी और भव सागर से मुक्ति पाएगा।

पुरुषोत्तम मास में पूजा पाठ का विशेष महत्व है। जो जातक पूर्ण श्रद्धा और विश्वास से उपवास,पूजा पाठ दान कर्म करता है। उसे पुण्य की प्राप्ति एवं कष्टों से मुक्ति मिलती है। इस वर्ष 16 मई से 13 जून तक सूर्य
संक्रांति न होने के कारण ज्येष्ठ अधिक मास बनता है। शास्त्रों के अनुसार मास प्रारंभ के समय भगवान विष्णु की आराधना लाल चंदन,लाल फूल और अक्षत सहित पूजन करना चाहिए। भगवान को घी,गुड और गेहूं के
आटे से मीठे पूवे बना कर कास्य पात्र में फल फूल दक्षिणा वस्त्र के साथ भोग लगा कर दान करना चाहिए।

धर्म ग्रंथों के अनुसार अधिक मास में शुभ कार्यों को वर्जित कहा गया है। जैसे नामकरण,गृह प्रवेश,जनेऊ संस्कार, मुंडन,विवाह,नव वधू प्रवेश,गाड़ी खरीदना, नीव पूजन आदि। इस माह में तामसिक भोजन से भी
बचना चाहिए जैसे मास मदिरा,लहसुन प्याज़ आदि।

इस मास में किए जाने वाले कार्य है वार्षिक श्राद्ध,मृत्यु तुल्य कष्ट से मुक्ति पाने के लिए रुद्राभिषेक,गर्भधान संस्कार, दान जप,पुंसवन संस्कार व सीमांत संस्कार हो सकता है।

इस मास में पुरुषोत्तम मास में भूमि पर शयन करना चाहिए,सादा और सात्विक भोजन करना चाहिएं।

भागवत पुराण के 6 स्कंध में 15 अध्याय हैं। पहले पांच अध्याय में हिरण्यकश्यप की कथा आती है। उसने एक बार ब्रह्मा जी की कठोर तपस्या कर के उनसे ऐसा वरदान मांगा की आप की बनाई गई सृष्टि
के किसी महीने में न मरूँ,ऊपर मरूँ न नीचे मरूँ,बाहर मरू न अंदर मरुँ। ब्रह्मा जी ने खुश हो कर तथास्तु कह दिया।

उसी हिरण्यकशयप को मारने के लिए एवं भक्त प्रहलाद की रक्षा के लिए,नरसिंह अवतार ले कर इस अधिक मास में ही दुष्ट को संहार कर अधर्म का नाश किया था।

पौराणिक भारतीय ग्रंथ वायु पुराण के अनुसार मगध सम्राट बसु द्वारा बिहार के राजगीर में ‘वाजपेयी यज्ञ’ कराया गया था। उस यज्ञ में राजा बसु के पितामह ब्रह्मा सहित सभी देवी-देवता राजगीर पधारे थे। यज्ञ में पवित्र नदियों और तीर्थों के जल की जरूरत पड़ी थी। कहा जाता है कि ब्रह्मा के आह्वान पर ही अग्निकुंड से विभिन्न तीर्थों का जल प्रकट हुआ था। उस यज्ञ का अग्निकुंड ही आज का ब्रह्मकुंड (राजगीर,बिहार) है। उस यज्ञ में बड़ी संख्या में ऋषि-महर्षि भी आए थे।

राजगीर में इस अवसर पर भव्य मेला भी लगता है। इस माह में लाखों श्रद्धालु पवित्र नदियों प्राची,सरस्वती और वैतरणी के अलावा गर्म जलकुंडों,ब्रह्मकुंड,सप्तधारा,न्यासकुंड, मार्कंडेय कुंड,गंगा-यमुना कुंड,काशीधारा कुंड,अनंतऋषि कुंड,सूर्य-कुंड,राम-लक्ष्मण कुंड,सीता कुंड,गौरी कुंड और नानक कुंड में स्नान कर भगवान लक्ष्मी नारायण मंदिर में आराधना करते हैं। वर्ष भर इन कुंडों में निरंतर उष्ण जल गिरता रहता है। इस जल का श्रोत आज भी अज्ञात है।

पुरुषोत्तम मास,सर्वोत्तम मास में यहां अर्थ,धर्म,काम और मोक्ष की प्राप्ति की महिमा है।

किंवदंती है कि भगवान ब्रह्मा से राजा हिरण्यकश्यपु ने वरदान मांगा था कि रात-दिन,सुबह-शाम और उनके द्वारा बनाए गए बारह मास में से किसी भी मास में उसकी मौत न हो।

इस वरदान को देने के बाद जब ब्रह्मा को अपनी भूल का अहसास हुआ,तब वे भगवान विष्णु के पास गए। भगवान विष्णु ने विचारोपरांत हिरण्यकश्यपु के अंत के लिए तेरहवें महीने का निर्माण किया।धार्मिक मान्यता है कि इस अतिरिक्त एक महीने को मलमास या अधिक मास कहा जाता है।



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