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कैसे बर्बाद हो रही है हमारी युवा पीढ़ी

भारत अपनी युवा आबादी को नाकाम बना रहा है। युवाओं को रोजगार और आगे बढऩे के मौके नहीं मिल पा रहे हैं। उन्हें अपनी किस्मत खुद संवारने के लिए जरूरी सुविधाएं भी मुहैया नहीं हो पा रही हैं। हमने इन युवाओं को एक जहरीला पर्यावरण दिया है, उन पर बोझ डालने वाली स्वास्थ्य देखभाल व्यवस्था दी है और एक ऐसी शिक्षा व्यवस्था दी है जो या तो महंगी या निष्प्रभावी है। इन सबके बाद हम उन्हें बाहर निकलने और दुनिया में परचम लहराने वाले उद्यमी या प्रभावी औद्योगिक श्रमशक्ति बनने को कहते हैं। क्या हम खुद से ही मजाक नहीं कर रहे हैं?

हरेक साल सर्दियों में दिल्ली की आबोहवा तीन महीनों तक सांस लेने के लिए दूभर हो जाती है। जब मैंने इस शहर का रुख किया था तो सर्दियों का लोग बेसब्री से इंतजार करते थे। उन जादुई महीनों में यह शहर सेरेंगेटी के कीचड़ भरे मैदानों या सहारा के रेतीले टीलों जैसा न होकर रहने लायक स्थान तो हो ही जाता था। लेकिन दुनिया की सबसे खराब हवा के साथ अब हमने दिल्ली की सर्दी को भी बरबाद करने का फैसला कर लिया है। डॉक्टरों का कहना है कि दिल्ली में पल-बढ़ रहे बच्चों के फेफड़ों को स्थायी नुकसान होने का खतरा है।

पिछले साल प्रकाशित अपने एक लेख में मैंने कहा था कि अच्छी हवा जैसे बाह्य तत्त्वों को अर्थशास्त्री अपने लेखा-जोखा में शामिल नहीं करते हैं। अगर विकास-केंद्रित अर्थव्यवस्थाएं हवा में फैले प्रदूषण को नजरअंदाज करती हैं तो फिर हमें सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में वृद्धि को केंद्र में रखने वाली अपनी नीति बदलने की जरूरत है। लेख के मुताबिक, फसलों के अवशिष्ट जलाने जैसी समस्या को दूर करने में आने वाली लागत को साफ तौर पर देखा जा सकता है और उससे आर्थिक ‘सक्षमता’ और जीडीपी में भी कमी आएगी। हवा में प्रदूषण फैलाने वाली वजहों को दूर करने से होने वाले लाभों को चिह्निïत कर पाना आसान नहीं है और जीडीपी में प्रत्यक्ष तौर पर उसके असर नजर नहीं भी आ सकते हैं।

यह तर्क अब भी समीचीन है। समूचा उत्तरी भारत एक बार फिर घने काले धुएं की चादर से ढक चुका है बल्कि बुनियादी सामाजिक ढांचे के प्रति हमारा रवैया राष्ट्रीय आय की गणना में इन पहलुओं को सीधे तौर पर शामिल न करने की प्रवृत्ति को नजरअंदाज करता है। अमेरिका के लोग फ्रांसीसी लोगों की तुलना में देर तक और कम उत्पादकता के साथ काम करते हैं। एक प्रासंगिक बिंदु यह है कि अमेरिकी लोग ब्रिटिश लोगों की तुलना में स्वास्थ्य देखभाल पर अधिक खर्च करते हैं। खर्च बढऩे से जीडीपी में अतिरिक्त योगदान होता है। ब्रिटेन में यह राष्ट्रीय आय का दसवां और अमेरिका में पांचवां हिस्सा है। इसके बावजूद एक अमेरिकी को ब्रिटिश नागरिक की तुलना में कमतर स्वास्थ्य सुविधा मिलती है। स्वास्थ्य देखभाल पर कम खर्च करने के बावजूद ब्रिटेन में जीवन प्रत्याशा अमेरिका के कुछ शीर्ष राज्यों के बराबर है। यह अमेरिका में स्वास्थ्य देखभाल प्रणाली के काफी हद तक निजी क्षेत्र द्वारा संचालित होने का असर है। अमेरिकी स्वास्थ्य प्रणाली महंगी होने के साथ ही इसमें गैरजरूरी महंगे उपचारों को भी शामिल किया जाता है। ब्रिटेन की राष्ट्रीय स्वास्थ्य सेवा के तहत कम लागत पर ही कोई स्वास्थ्य उत्पाद मिल जाता है। इसका मतलब है कि अगर ब्रिटेन आने वाले समय में अमेरिकी शैली वाली निजी क्षेत्र आधारित स्वास्थ्य प्रणाली लागू करने का फैसला करता है तो उसकी जीडीपी में जबरदस्त उछाल आ जाएगी। लेकिन उसके स्वास्थ्य नतीजे और जीवन स्तर में गिरावट आ जाएगी।

भारत सार्वजनिक धन खर्च किए बगैर जीडीपी वृद्धि की तलाश में लगा हुआ है लेकिन वह अपनी मौजूदा स्वास्थ्य देखभाल प्रणाली में जरूरी सुधार किए बिना ही इसका विस्तार करने की कोशिश कर सकता है। सबको एकसमान स्वास्थ्य सेवा देने का वादा कर सत्ता में आई सरकार के भीतर सोच यही है कि स्वास्थ्य ढांचा मुहैया कराने में निजी प्रावधान के साथ सब्सिडी-आधारित जटिल बीमा प्रणाली से ही बात बनेगी। भारतीय कामगारों के लिहाज से यह किसी आपदा जैसी स्थिति होगी लेकिन आर्थिक आंकड़ों एवं जीडीपी विकास के संदर्भ में यह बढिय़ा दिख सकता है। (और इससे राजनीतिक संपर्क रखने वाले लोगों द्वारा बड़े पैमाने पर संचालित निजी अस्पतालों को फायदा होगा।) सरकार युवा भारतीयों की मानवीय पूंजी की कीमत पर अपनी भौतिक पूंजी की बचत कर पाएगी।

शिक्षा के मामले में भी इसी तरह का रवैया अपनाया जा रहा है। कम लागत वाली सार्वभौम एवं सर्वसुलभ शिक्षा मुहैया कराने के बजाय भारत खराब प्रदर्शन कर रहे सार्वजनिक स्कूलों और महंगे एवं असरहीन रूप से नियंत्रित निजी स्कूलों के भरोसे ही चल रहा है। बेहतर नतीजे देने वाले सार्वजनिक स्कूलों की जगह कोई भी नहीं ले सकता है। लेकिन यहां पर भी अक्षमता राजनीतिक मकसद के माकूल बैठती है और उससे जीडीपी में बढ़ोतरी ही होती है क्योंकि अभिभावक महंगे निजी स्कूलों के चंगुल में फंसने को मजबूर हैं। सरकार ने राजकोषीय जवाबदेही के संदर्भ में वाकई में बड़ा काम किया है। इसने भौतिक ढांचा खड़ा करने पर खर्च किया है लेकिन अगर इसने नियामकीय एवं कानूनी ढांचे पर अधिक जोर दिया होता तो निजी क्षेत्र से वह खर्च कराया जा सकता था। लेकिन सरकार ने मानवीय ढांचा और मानवीय पूंजी पर अधिक मानसिक ऊर्जा और धन नहीं लगाया है। अगर सरकार वाकई राजकोषीय उड़ान पथ के प्रति अपनी प्रतिबद्धता शिथिल करती है तो वह जीडीपी में गिरावट की भरपाई के लिए भौतिक ढांचे पर अधिक खर्च की दिशा में आगे बढऩे के लिए प्रेरित हो सकती है। लेकिन ऐसा करने से हम युवा भारतीयों को लगातार नाकाम करते रहेंगे। इसके बजाय सरकार को अब शिक्षा, कौशल-विकास, स्वास्थ्य देखभाल और पर्यावरण जैसे मुद्दों पर अधिक ध्यान देना चाहिए। स्वस्थ और सुशिक्षित युवा ही अपने लिए उस भविष्य का निर्माण कर सकते हैं जो उनकी सरकार दे पाने में नाकाम साबित हो रही है।

साभार- http://hindi.business-standard.com से

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