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त्रावणकोर पाकिस्तान में शामिल होने से कैसे बचा

स्वतंत्रता से पहले जब भारत के बँटवारे और पाकिस्तान के रूप में एक नए मुल्क के निर्माण की बात की जा रही थी, तब कुछ ऐसी रियासतें थीं, जिनकी सीमा पाकिस्तान के साथ न जुड़ने के बाद भी वहाँ के हुक्मरान पाकिस्तान के साथ ही जाना चाहते थे। साथ ही, कुछ ऐसी रियासतें थीं, जो न तो भारत और न ही पाकिस्तान में शामिल होना चाहती थीं। सीधे शब्दों में कहें तो ये रियासतें स्वतंत्र रहना चाहती थीं। इन्हीं रियासतों में से एक थी त्रावणकोर रियासत।

त्रावणकोर केरल की राजधानी तिरुअनंतपुरम से करीब 180 किमी की दूरी पर स्थित है। भारत की स्वतंत्रता और उसमें देश की तमाम रियासतों के विलय के बारे में जब बात होती है तो कश्मीर, हैदराबाद और यहाँ तक कि जूनागढ़ जैसी छोटी रियासत के जिक्र के बीच त्रावणकोर कहीं न कहीं पीछे रह जाता है। इसका सबसे बड़ा कारण एक 25 वर्षीय युवक द्वारा त्रावणकोर के दीवान, सी पी रामास्वामी अय्यर की हत्या का प्रयास है।

अलग देश बनाना चाहते थे त्रावणकोर के दीवान
दरअसल, त्रावणकोर के दीवान सी पी रामास्वामी अय्यर जिन्हें सामान्यतः सीपी के नाम से जाना जाता था, वह भारतीय गणतंत्र में शामिल नहीं होना चाहते थे। अर्थात, उनकी महत्वाकांक्षा एक अलग देश बनाने की थी। इसके लिए उन्होंने मोहम्मद अली जिन्ना के साथ एक संधि भी कर रखी थी।

इतिहासकार ऐसा मानते हैं कि सीपी को डर था कि भारत जवाबी कार्रवाई करते हुए त्रावणकोर पर आर्थिक प्रतिबंध लगा सकता है। इसलिए, उन्होंने कवर के तौर पर जिन्ना से व्यापारिक समझौता की बात की थी।

भारतीय नेताओं की इज्जत नहीं करते थे दीवान सीपी रामास्वामी
22 जुलाई, 1947 को भारत के अंतिम वायसराय लॉर्ड माउंटबेटन ने सीपी के साथ हुई की मीटिंग के बाद कहा था, “सीपी के मन में भारतीय नेताओं के लिए एक भी इज्जत नहीं है। सीपी ने माउंटबेटन को कहा था कि गाँधी ‘सेक्स का बावला (Sex Maniac)’ हैं जो युवा लड़कियों से हाथ नहीं हटा सकते और जवाहरलाल नेहरू ‘अस्थिर’ हैं।”

अलग देश बनाने की थी मंशा
गौरतलब है कि, 18 फरवरी 1947 को ब्रिटिश प्रधानमंत्री क्लेमेंट एटली भारत को सत्ता हस्तांतरित करने की घोषणा कर चुके थे। इसके बाद, 3 जून को भारत और पाकिस्तान को सत्ता हस्तांतरण के प्रस्तावों को सार्वजनिक किया गया था। इस प्रस्ताव में करीब 500 रियासतों को मुक्त छोड़ दिया गया था।

इसका सीधा अर्थ यह था कि ये रियासतें न तो भारत का हिस्सा हैं और न ही पाकिस्तान का। हालाँकि, इस प्रस्ताव में यह जोड़ा गया था कि इन रियासतों से अब ‘मुकुट की सर्वोच्चता’ समाप्त हो जाएगी यानी इन रियासतों में भी अब राजतंत्र नहीं रह जाएगा।

इस घोषणा के ठीक बाद 11 जून को ही, सीपी ने घोषणा करते हुए कहा इस प्रस्ताव के साथ, जिस दिन ब्रिटेन भारत की सत्ता छोड़ेगा त्रावणकोर एक स्वतंत्र देश बन जाएगा। सीपी की घोषणा के एक हफ्ते बाद यानी 18 जून को त्रावणकोर राजा चिथिरा थिरुनल बलराम वर्मा ने रात 8:45 पर त्रिवेंद्रम रेडियो स्टेशन अपनी ‘स्वतंत्रता’ की घोषणा की। इस घोषणा में उन्होंने कहा, “15 अगस्त, 1947 को त्रावणकोर पूरी तरह से अपनी स्वतंत्रता और संप्रभुता को फिर से हासिल कर लेगा।”

तैयार की थी पूरी प्लानिंग
ऐसा बिल्कुल नहीं था कि ब्रिटेन के प्रधानमंत्री एटली की घोषणा के तुरंत बाद ही त्रावणकोर के दीवान या राजा ने स्वतंत्र राष्ट्र का स्वप्न देखा था। बल्कि, इसकी पूरी तरह से प्लानिंग की गई थी।

मोहम्मद अली जिन्ना से लेकर अन्य बड़े देशों के साथ त्रावणकोर द्वारा गुप्त समझौते करना यह दर्शाता है कि सब कुछ सोच समझकर किया जा रहा था। यदि इसे यह कहा जाए कि त्रावणकोर ने खुद को एक बड़े शक्तिशाली देश के रूप में प्रस्तुत करने की योजना बनाई थी तो गलत नहीं होगा।

मोनाजाइट के दम पर उछल रहा था त्रावणकोर
यह सवाल हर किसी के मन में उठ रहा होगा कि त्रावणकोर खुद को बड़े शक्तिशाली देश के रूप में कैसे प्रस्तुत कर सकता था। जबकि, त्रावणकोर न तो आर्थिक रूप से सम्पन्न था और न ही उसका क्षेत्रफल इतना अधिक था। इसका सीधा सा जवाब है जवाब है त्रावणकोर के पास मोनाजाइट था।

मोनाजाइट एक ऐसा पदार्थ है जिसमें थोरियम पाया जाता है, जिसक उपयोग परमाणु बम बनाने में किया जाता है। 40 के दशक में ही मोनाजाइट को अमेरिका, सोवियत संघ (रूस) जैसे देशों द्वारा बहुत उपयोगी बता दिया गया था।

तत्कालीन स्थितियों में त्रावणकोर दुनिया में मोनाजाइट के सबसे बड़े आपूर्तिकर्ताओं में से एक था। सबसे बड़ी बात यह थी कि मोनाजाइट के दूसरे बड़े उत्पादक ब्राजील की तुलना में त्रावणकोर का मोनाजाइट कहीं अधिक बेहतर था।

वह ऐसा दौर था जब पूरी दुनिया परमाणु क्रांति की अंधी दौड़ में भागने को तैयार थी। त्रावणकोर के दीवान सीपी को यह आभास हो गया था कि वह दुनिया के सबसे ‘कीमती’ खजाने पर बैठे हुए हैं। वह जानता था कि दुनिया परमाणु क्रांति के दौर में प्रवेश कर रही है। अमेरिका द्वारा नागासाकी और हिरोशिमा में परमाणु हमला करने के बाद सीपी ने त्रावणकोर के राजा को पत्र लिखते हुए कहा था “अगर थोरियम का उपयोग परमाणु बम के निर्माण के लिए किया जाता है तो त्रावणकोर का स्थान पूरी दुनिया में ऊँचाई पर होगा।”

त्रावणकोर के दीवान ने नहीं की किसी की परवाह
हालाँकि, त्रावणकोर और वहाँ के दीवान सीपी की यह चाल सबके सामने आ गई। इसके बाद, अप्रैल 1947 में भारत की अंतरिम सरकार की एक कैबिनेट बैठक में कथित तौर पर जब नेहरू ने यह कहा कि वह त्रावणकोर पर हवाई हमले कर सकते हैं। तब सीपी ने भारतीय नेताओं की परवाह नहीं की। क्योंकि, उन्होंने यह मान लिया था कि जब तक उनके पास मोनाजाइट है, अंग्रेज उसकी बोली लगाते रहेंगे।

‘ओ मनोरमा’ में प्रकाशित लेख के अनुसार, एक ओर जहाँ दीवान की महत्वाकांक्षा बढ़ती जा रही थी, वहीं दूसरी ओर उसके प्रति जनता का आक्रोश भी बढ़ता जा रहा था। जनता के इस आक्रोश का सबसे बड़ा कारण अक्टूबर 1946 में, पुन्नपरा-वायलार विद्रोह में सीपी द्वारा लगभग लोगों की निर्मम हत्या करवाया जाना था।

विद्रोहियों ने बनाई दीवान से बदला लेने की योजना
चूँकि त्रावणकोर के दीवान सी पी रामास्वामी अय्यर ने विद्रोह को क्रूरतापूर्ण तरीके से कुचल दिया था, इसलिए विद्रोहियों के एक गुट ने दीवान से बदला लेने का निश्चय किया और इसका काम सौंपा गया 25 वर्ष के एक युवक सी एस मणि को।

हुआ कुछ यूँ कि स्थानीय संगीत महाविद्यालय में एक कार्यक्रम आयोजित किया गया। वहाँ बिना पास के प्रवेश की अनुमति नहीं थी। लेकिन, सी एस मणि ने बेहद चालाकी से पास हासिल कर लिया था। इसके बाद, योजनाबद्ध तरीके से उसने कपड़ों के नीचे माचे (स्थानीय हथियार जिसका उपयोग छोटे पेड़ों को काटने में किया जाता है) व एक कुल्हाड़ी छिपा ली थी।

इस कार्यक्रम में दीवान सीपी भी पहुँचे और जैसे ही कार्यक्रम समाप्त हुआ, दीवान पुलिस को साथ में लेकर हॉल की तरफ निकल गए। मणि अब भी हॉल के बाईं छोर पर बैठा था, जहाँ से दीवान को बाहर निकलना था। दीवान के पास आते ही मणि अपनी जगह पर खड़ा हो गया।

इससे पहले कि मणि माचे निकालता उसे यह समझ में आ गया कि यह कपड़ों में कहीं फँस गया है। इसलिए, उसने कुल्हाड़ी निकाल ली और गुस्साए भेड़िए की तरह दीवान पर टूट पड़ा। इसके बाद, उसने अंधाधुंध तरीके से दीवान पर वार किए। हालाँकि, आसपास खड़े लोगों और वहाँ मौजूद पुलिस ने मणि को पकड़ने का प्रयास किया, लेकिन तभी लाइट चली गई और मणि भाग खड़ा हुआ।

दीवान के चेहरे और और गर्दन पर गहरे घाव हो गए थे। हालाँकि, उनकी जान बच गई थी। इसलिए, 28 जुलाई को जब वह थोड़ा ठीक हो गए तो उन्होंने राजा को अपने अस्पताल के बिस्तर से एक पत्र लिखा।

इस पत्र में दीवान ने कहा था कि केवल दो विकल्प हैं: भारत में शामिल हों या स्वतंत्रता की घोषणा करें। यदि त्रावणकोर के स्वतंत्र रहने का विकल्प चुनते हैं तो एक खूनी लड़ाई के लिए तैयार रहें क्योंकि छह महीने में गृहयुद्ध छिड़ जाएगा और साल के अंत से पहले कॉन्ग्रेस नेताओं की हत्या कर दी जाएगी।

दो दिन बाद, 30 जुलाई को त्रावणकोर के महाराजा ने वायसराय को विलय पत्र में अपनी स्वीकृति देते हुए टेलीग्राफ किया। वास्तव में, त्रावणकोर के राजा चिथुरा थिरुनल बलराम वर्मा और दीवान सीपी रामास्वामी अय्यर को यह समझ में आ गया था कि जब रियासत के सबसे सुरक्षित व्यक्ति पर इस तरह से जानलेवा हमला हो सकता है तो फिर रियासत में कोई भी सुरक्षित नहीं होगा। इस तरह से एक युवा सीएस मणि द्वारा दीवान की हत्या के प्रयास ने न केवल त्रावणकोर का भारत में विलय करवा दिया बल्कि केरल के इतिहास को भी बदल दिया।

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