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कैसे मारा गया बख्तियार? भारत में इस्लाम के फैलाव की पड़ताल

बिहार में नालंदा-विक्रमशिला तो बड़े नाम थे, जिन्हें आग के शोलों के हवाले करके बख्तियार खिलजी ने बंगाल का रुख किया और नबद्वीप को तबाह करने के बाद लखनौती पर कब्जा करके बैठ गया। वहाँ उसने अपने नाम के सिक्के ढाले।

उसके साथ आए लुटेरों के बीच बंगाल के पुरखों की विरासत पर बंदरबाँट शुरू हुई। इन सबने इस इलाके में पकी हुई ईंटों और पत्थरों के सदियों पुराने मंदिरों-महलों को तोड़कर मनमर्जी से मस्जिदें, मदरसे और खानकाहों के निर्माण शुरू कराए।
वर्तमान बिहारियों और बंगालियों (हिंदू-मुस्लिम दोनों) के पराजित और अपमानित पुरखों (हिंदू, जैन और बौद्ध) ने पहली बार जब अपनी आँखों के सामने यह देखा होगा तो अपनी रोजमर्रा की ज़िंदगी में शायद उन्हें अटपटा न लगा हो कि यह हो क्या रहा है? उन्हें बिल्कुल ही अंदाज़ा नहीं होगा कि अपने आसपास जाहिल विजेताओं के ये शुरुआती कब्ज़े आने वाली सदियों में इस पूरे इलाके की शक्ल किस तरह से बदलकर रख देंगे।
लूट में हासिल बंगाल और बिहार की बेहिसाब दौलत ने बख्तियार की भूख बेतहाशा बढ़ा दी थी। वह लखनौती में भी चैन से नहीं बैठा। उसके जासूसों ने तिब्बत, असम और उत्तर-पूर्व के नए इलाकों के बारे में जानकारियाँ जुटाकर उसे दीं।

एक घोड़े और चंद हथियारों के साथ अवध में नौकरी के लिए एक जाहिल भिखारी की तरह आया बख्तियार बंगाल की लूट के दम पर अब एक नई फौज खड़ी कर रहा था, जिसमें 10,000 सवार थे। ये सब स्थानीय लोग थे, जिनके लिए धर्मांतरण के साथ ही ‘जॉब’ के नए अवसर खुल रहे थे। मिनहाज़ सिराज ने इस इलाके में हुआ पहला धर्मांतरण दर्ज किया है–
“बंगाल से तिब्बत के बीच तीन जातियों के लोग पाए जाते हैं- कूच, मीच और तहारू। इनका रंग तुर्कीं लोगों जैसा है, लेकिन भाषा बिल्कुल अलग है। कूच और मीच जाति के एक प्रभावशाली नेता ने बख्तियार के कहने पर इस्लाम कुबूल कर लिया है। वह अली मीच के नाम से मशहूर है।”
धर्मांतरण का आत्मघाती असर कैसे शुरू हुआ, अब यह देखिए। मीच जाति के ‘अली’ बने इस शख्स का नाम इस्लाम कुबूल करने के पहले क्या था, यह ज्ञात नहीं है। अब यह नया मुसलमान अपना धर्म बदलवाने वाले मुहम्मद बख्तियार को आगे पहाड़ी इलाकों की फतह के लिए ‘लोकल गाइड’ बनने के लिए तैयार हो गया।

मिनहाज़ सिराज की ‘ग्राउंड रिपोर्ट’-
“वह बख्तियार को बुरघन कोट नाम के एक शहर तक लेकर गया। इस शहर के सामने एक बहुत बड़ी नदी है, जिसका नाम बंगमती (ब्रह्मपुत्र या तीस्ता) है। यह गंगा नदी से तीन गुना बड़ी और गहरी है। अली मीच इस्लामी सेना को उस नदी के चढ़ाव की ओर ले गया।
10 दिन में पहाड़ के बीच एक ऐसी जगह पर पहुँच गया, जहाँ कटे हुए पत्थरों का एक बहुत पुराना पुल बना था। इस पुल में बीस से तीस मोरियां थीं। दो सरदारों को इस्लामी सेना की वापसी तक उस पुल की हिफाजत के लिए छोड़कर रखा गया। इनमें से एक सरदार तुर्क था और दूसरा खिलजी। बख्तियार ने सेना सहित पुल पार कर लिया है।”

बख्तियार ने बंगाल पर कब्ज़ा कर लिया है, यह खबरें आज के असम (तब कामरूप) के तत्कालीन हिंदू राजाओं तक पहुँचीं। मगर वे सिर्फ हालातों पर नज़र बनाए रहे, क्योंकि अब लखनौती जाकर करने को कुछ बचा नहीं था।

अगर नबद्वीप के राजा या आम लोग पहले से सतर्क होते और कोई मदद कामरूप से मांगते तो मुमकिन है कि नालंदा को तबाह करके नबद्वीप की तरफ बढ़ रहे बख्तियार का सामना बंगाल की सोने जैसी जमीन पर एक संयुक्त हिंदू सेना से हुआ होता।
नबद्वीप वालों ने धोखे से ऐसे किसी हमले की कभी कल्पना ही नहीं होगी, इसलिए उनकी तात्कालिक तैयारी भी नहीं थी और एक झूठी अफवाह के साथ सिर्फ 18 सवारों को लेकर नबद्वीप में दाखिल हुए बख्तियार ने वहाँ के राजा को भूखा भागने पर मजबूर कर दिया।

वह खुली डकैती थी। कोई चुनौती देकर राज्य के सामने आया नहीं था। जंग की कोई वजह ही नहीं थी। बस खूनी लुटेरों का एक झुंड हथियार छुपाकर महल तक पहुँचा और कत्लेआम शुरू कर दिया।

राजा की फौज कहीं बाहर तैनात होगी भी ताे उस तक राजा के पलायन के बाद महल, खजाने, औरतों, बच्चों पर बख्तियार के कब्ज़े की एक अदद ब्रेकिंग न्यूज ही पहुँची होगी और जब वे वहाँ आए होंगे तो महल में हुए खूनखराबे के निशान बाहर से अंदर तक देख पाए होंगे। जल्दी ही नबद्वीप के बेसुध नागरिकों ने नया झंडा महल पर फहराते हुए देखा होगा, जहां बख्तियार के हथियारबंद गुर्गे पहरे पर होंगे। एक खौफ बिहार के बाद बंगाल में भी कायम हो गया था।

महान् पृथ्वीराज चौहान दो बार मोहम्मद गोरी को जंग में हराकर छोड़ चुके थे। शायद उनकी कल्पना में भी नहीं होगा कि अगर उनकी जगह गोरी को पहली बार ही फतह मिलती तो उनका क्या हाल होता? चौहान की दरियादिली जल्दी ही तीसरी लड़ाई के मैदान तक दोनों को ले आई और फिर क्या हुआ, यह हम दिल्ली से लेकर लखनौती और अब उत्तर-पूर्व के पहाड़ों में तेजी से फैल रहे उस महारोग को देख ही रहे हैं।

दिल्ली के पतन की खबरों ने बिहार को कोई सबक नहीं सिखाया। वहाँ बौद्ध विश्वविद्यालयों में 600 सालों से भारत अपनी नई पीढ़ी को गढ़ रहा था। एक ऐसी पीढ़ी जिसमें हिंसा की जगह शांति के पाठ ऊपर थे। लालच की जगह त्याग के सबक पहले थे। बुद्ध की शिक्षाएँ मानव को महामानव बनाने की थीं। लेकिन अब दिल्ली की तरफ से ‘अति मानव’ झपट रहे थे।
बिहार-बंगाल के रिकॉर्ड में बख्तियार खिलजी पहला नामजद झपट्‌टेमार है। इन शैतानी ताकतों से उनकी ही भाषा में निपटने के कोई उपाय नालंदा-विक्रमशिला की लाखों पांडुलिपियों में दर्ज नहीं ही होंगे! वहाँ तो गौतम बुद्ध की करुणा और शांति हर तरफ महक रही थी, जिसे बख्तियार ने राख और धुएं के दमघोंटू बवंडर में बदल दिया।
अब आप तिब्बत की तरफ पहाड़ों तक जा पहुँचे बख्तियार के आसपास ध्यान दीजिए। वह जिस पुल को पार कर रहा है, वह कटे हुए पत्थरों से बना है। उसमें 20 से अधिक मोरियाँ हैं। ब्रह्मपुत्र या तीस्ता जैसी तेज बहाव वाली बड़ी पहाड़ी नदी पर ऐसा पुल 800 साल पहले बनाने की तकनीक और हुनर बंगालियों के पुरखों (आज के बंगाली मुसलमानों के पुरखे यही हिंदू और बौद्ध थे) के पास था, जिससे 10,000 की एक फौज अपने हाथी-घोड़ों और भारी-भरकम साजो-सामान के साथ पार कर रही है।

असम या कामरूप के राय को जब इस्लामी सेना के पार करने की खबर मिली तो उसने अपने भरोसेमंद नुमाइंदों के हाथों एक संदेश भेजा। बख्तियार के पास उन्होंने यह संदेश पढ़ा-तिब्बत पर इस वक्त हमला ठीक नहीं है। इस वक्त आप लौट जाएँ। पुख्ता तैयारी करें। मैं कामरूप का राय इस बात का वचन देता हूँ कि दूसरे साल अपनी सेना तैयार करके मुसलमानों की सेना से आगे बढ़कर उस इलाके को जिता दूँगा।

लेकिन बख्तियार को ऐसी किसी सलाह की ज़रूरत नहीं थी, जो उसे पीछे हटने को कहे। वह तिब्बत की तरफ तेज़ी से बढ़ता गया। उसे और अधिक मालामाल इलाकों की तलाश थी।

इस मुहिम में शामिल बख्तियार के एक बेहद करीबी सिपहसालार ने बाद में मिनहाज़ सिराज को मुश्किलों से भरी इस पहाड़ी मुहिम के ब्यौरे दिए। तिब्बती रास्ताें के ये आँखों देखे विवरण उस इलाके के हमारे महान पुरखों के रहन-सहन, तकनीकी हुनर और अचानक थोपे गए युद्ध की तात्कालिक तैयारी का बेहतरीन खाका खींचते हैं।
नदी पार करने के 15 दिन तक सेना पहाड़ी ऊँचे-नीचे और घुमावदार रास्तों को पार करती हुई, 16वें दिन तिब्बत पहुँची। वो इलाके पूरी तरह आबाद थे। लोग खेती करते थे। वे एक ऐसी जगह पहुँचे, जहाँ एक मज़बूत किला था।

जैसा कि अब तक हर जगह होता आया था, इस्लामी सेना ने पहुंचते ही लूटमार मचा दी। ताबड़तोड़ स्थानीय लोग अपने बचाव के लिए इकट्‌ठा हो गए और अब वे एक थोपी गई आमने-सामने की लड़ाई में दूसरा पक्ष थे, जिसे इन इस्लामी हमलावरों के बारे में कोई परिचय तक नहीं था। मिनहाज सिराज ने उस दिन का ब्यौरा इन शब्दों में दर्ज किया है–
“सुबह से शाम की नमाज तक जबर्दस्त युद्ध हुआ। इस्लामी सेना की बहुत बड़ी संख्या मारी गई। बहुत लोग जख्मी हो गए। दुश्मनों के पास बाँस के टुकड़ों के भाले थे। ढाल थे और वे कच्चे रेशम से बांधकर बनाए हुए रक्षा कवच पहने हुए बहादुरी से लड़ रहे थे। सब धनुष चलाने में माहिर और बड़ी-बड़ी कमानें संभाले हुए थे।”

बेफिक्र मुहम्मद बख्तियार को इस दूरदराज इलाके में ऐसे तगड़े जवाबी हमले का कतई अंदाज़ा नहीं था। वह अपनी आँखों के सामने हो रही इस्लामी सेना की फजीहत से परेशान हो गया। फौरन उसने अपने अमीरों से मशविरा किया। हालात को देखते हुए सबने एक ही राय दी कि इस वक्त लौटना ही मुनासिब है। दूसरे साल फिर हमला करना चाहिए।

कोई दूसरा रास्ता नहीं था। बुरी तरह मार खाकर जब वे बेदम होकर वापस हुए तो पूरे रास्ते में उनका इस्तकबाल भी गजब हुआ। वापसी के दो हफ्तों का हाल मिनहाज़ सिराज बता रहा है-
“15 दिन में एक सेर अनाज और घास का एक तिनका भी पशुओं और घोड़ों को नसीब नहीं हुआ। बची-खुची फौज के भूख से मर रहे लोग अपने घोड़े ही काट-काटकर खाने लगे।

जब लुटेरों का यह काफिला उसी पुल के पास आया तो पता चला पूरा पुल तोड़ दिया गया है। पुल की हिफाजत के लिए छोड़े गए वे तुर्क और खिलजी सरदार किसी बात पर आपस में लड़-भिड़ गए और वह जगह ही छोड़कर चले गए। इस मौके का फायदा उठाकर कामरूप के हिंदुओं ने आकर उस पुल को बर्बाद कर दिया।”

साफ है कि जब पुल पार करके बख्तियार खिलजी आगे बढ़ा था तब स्थानीय हिंदू खामोश बैठकर इंतज़ार नहीं करते रहे थे। वे हालात पर नज़र बनाए हुए थे। उस पूरे एक महीने तक उन्होंने वापसी के मार्ग का सफाया करके रख दिया और आखिर में नदी के पुल को भी तोड़ डाला ताकि इन अजनबी हमलावर लुटेरों को पता चले कि बंगाल की ज़मीन कायरों की नहीं है।

यह शक्ति के उपासकों की सदियों पुरानी परंपरा वाला इलाका था। बौद्धों की शांति नालंदा वालों को ऐतिहासिक रूप से महंगी पड़ी थी। वे खत्म ही हो गए। लेकिन यहां ताकत और चालाकी का जवाब पूरी शांति के साथ दिया गया।

बख्तियार ने बीते सालों में अब तक की लगातार आदतन लूटमार, आगजनी, हमले और कत्लेआम में पहली बार यहाँ मुँह की खाई। एक दिन वह लुटी-पिटी हालत में अपनी हारी हुई और भूख से बिलबिलाती फौजी भीड़ के साथ उस तेज बहाव वाली नदी के किनारे पर खड़ा दिखाई दिया।
बलवेग वाली उस चौड़ी नदी को पार करने का कोई जरिया नहीं था, क्योंकि पुल को इस हालत में छोड़ा ही नहीं गया था कि कोई नदी पार सके। कहीं एक नौका तक नज़र नहीं आ रही थी। बख्तियार को उस पुल के आसपास एक मंदिर का पता चला, जो बहुत ऊँचा और खूबसूरत था। उसमें बड़ी तादाद में सोने-चांदी की मूर्तियाँ थीं। एक बहुत बड़ी मूर्ति थी, जो 3,000 मिसकाल (एक माशा 8 रत्ती) सोने की परत की बनी थी। बख्तियार की फौज इस मंदिर में दाखिल हुई और नदी पार करने के सामान को तलाशने लगी।
अब बंगाली हिंदुओं का एक और गौरतलब कारनामा देखिए। कामरूप का राय चौंकाने वाले रूप में सामने आता है, जिसने एक महीना पहले बख्तियार के पास अपने कुछ लोग भेजकर तिब्बत पर हमला न करने की बिन मांगी सलाह दी थी। यह खबर लगते ही कि बख्तियार खिलजी तिब्बत से हारकर लौटा है और मंदिर के पास डेरा डाला हुआ है, उस राय ने फौरन उस इलाके के हिंदुओं को मंदिर के पास इकट्‌ठा होने का हुक्म दिया।

चारों तरफ से हिंदुओं ने आकर मंदिर को घेर लिया और बांस के भालों को एक दूसरे से सटाकर ज़मीन में इस तरह गाड़ दिया कि वे लकड़ी की मज़बूत दीवार जैसे दिखाई देने लगे। पहले से ही पस्त इस्लामी सेना का जिहादी जज्बा यह नज़ारा देखकर हवा हो गया। मौत सिर पर नजर आई तो सबने बख्तियार को घेरकर कहा– “हम ऐसे ही बैठे रहे तो काफिर हमें कैद कर लेंगे। हम कैसे छुटकारा पाएँ?”

आखिरकार मुसलमान मंदिर से निकलकर मैदान में आए और नदी की तरफ बढ़ गए। चौकस हिंदुओं ने उनका नदी तक पीछा किया। थके-हारे और बदहवास लुटेरे नदी पर आकर रुक गए। पीछे से हिंदुओं को आता देख कुछ ने निकल भागने की आखिरी उम्मीद में अपने घोड़े नदी के तेज बहाव में उतार दिए।

उसी समय शोर मच गया कि नदी में रास्ता मिल गया है। नदी के हर हिस्से से वाकिफ हिंदुओं ने उनका पीछा जारी रखा। बीच नदी में पानी गहरा था। बख्तियार के सभी फौजी डूबकर मर गए। खिलजी कबीले का यह दुर्दांत हमलावर सिर्फ 100 सवारों के साथ बमुश्किल नदी पार करने में कामयाब हो पाया। मगर अभी लखनौती दूर थी। उसकी मौत ही उसे पहाड़ों से टकराने के लिए लेकर आई थी। ऊँट पहाड़ के नीचे आ चुका था।
उस पार कूच और मीच जाति का वह ‘कन्वर्टेड’ अली मीच अपने रिश्तेदारों के साथ बख्तियार के इस्तकबाल के लिए पहुँचा। खिलजी की हालत बाद में यह हुई कि वह शर्म के मारे घोड़े पर नहीं बैठता था क्योंकि मारे गए लोगों के घर की औरतें और बच्चे घरों और गलियों में रोना-चिल्लाना मचा देते थे, उसे गालियाँ देते थे।

वह अफसोस करते हुए कहता रहता था कि ऐसा लगता है कि मेरे मालिक सुलतान गाजी पर कोई हादसा पेश आया है। इसी वजह से मेरी तकदीर खराब हो गई है। देवकोट नाम की जगह पर आकर बख्तियार बीमार पड़ गया।

तीन दिन वह सख्त बीमार पड़ा रहा। कोई उसके पास पहुँचा नहीं था। एक अमीर अली मर्दान खिलजी उसका हाल सुनकर कूनी नाम की जगह से आया। उसने बेदम लेटे हुए बख्तियार के पास पहुँचकर उसे चादर से ओढ़ा दिया और एक कटार से काम तमाम कर दिया।

बिहार और बंगाल लोगों को ये विवरण अपनी याददाश्त में शिलालेखों की तरह टांक लेने की ज़रूरत है। मेरा मानना है कि कुछ और याद हो न हो, अपना इतिहास कभी नहीं भूलना चाहिए। इतिहास के गौरवशाली अध्याय तो याद होने ही चाहिए, लेकिन जिन ताकतों ने हमारी हजारों साल की संचित संपदा लूटी, हमारे पुरखों के खून की नदियाँ बहाईं, उन्हें सदियाें तक जलील किया, औरतों-बच्चों को गुलाम बनाया और कब्ज़े से हासिल ताकत और तलवार के ज़ोर से बेकसूर पीढ़ियों पर मजहब की गुलामी लाद दी, उन्हें हम भूल कैसे सकते हैं‌?

इतिहास का सही स्मरण ही आपको वर्तमान में चौकन्ना रखेगा और भविष्य में वैसा न हो, इस तरफ सोचने के लिए मजबूर करेगा। अगर यह इतिहास याद रखा गया होता तो बख्तियार खिलजी इतिहास के एक दुर्दांत अपराधी की तरह सबके संज्ञान में होता। एक आज़ाद मुल्क में 72 साल बाद भी ‘बख्तियारपुर जंक्शन’ सबका स्वागत न कर रहा होता!

सदियों के फासले में इज़रायल से लगातार बेदखल हुए यहूदियों ने ओल्ड जेरूशलम में अपने महान पुरखों की हज़ारों साल पुरानी स्मृतियों को अपने दिल-दिमाग में पीढ़ियों तक खाेदकर ताजा रखा। यही वजह है कि वे अपने मामूली आकार के मुल्क में आज जहां हैं, वहाँ हैं। वे वहाँ होने की कुदरती काबिलियत रखते हैं।

उस मुहिम के बाद बख्तियार जिंदा लौटकर लखनौती नहीं आया। उसकी शर्मनाक हार की खबरें ही आईं। लेकिन लखनौती से लेकर नालंदा तक उसके शैतानी कारनामे सदियों की याददाश्त में दर्ज हो गए। उसके साथ आए उसके कबीले के दूसरे खिलजी सरदारों ने बंगाल पर पंजे गाड़कर रखे।
बख्तियार का अंत वैसा हुआ, जैसा बहुत पहले ही हो जाना चाहिए था। संगठित हिंदुओं ने पूरी तैयारी से उसे टक्कर दी, लेकिन पढ़ाए गए इतिहास में इनके ब्यौरे कहीं नहीं हैं। हम सिर्फ मुहम्मद बख्तियार खिलजी को ज्यादा जानते हैं। एक बख्तियार खत्म हो गया मगर बरबादी की यह कहानी कभी और कहीं खत्म नहीं हुई। हिंदुस्तान के कोने-कोने में बरबादी की दास्तानें भरी पड़ी हैं…
विजय मनोहर तिवारी के फेसबुक वाल से साभार

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