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कैसी होगी कोरोना के बाद की हमारी ज़िंदगी

एक संगीत प्रस्तुति में पंडित भीमसेन जोशी गए। वहाँ उन्होंने शुरुआत में सुबह का एक राग गाया। राग के ख़त्म होते ही उन्होंने बिना रूके एक दूसरी बंदिश शुरू कर दी। बंदिश थी – ‘सोच समझ नादान’। लोगों को लगा कि ये उनकी पुरानी रचना है तो इसे वे वैसे ही गाएंगे। लेकिन जैसे-जैसे वे आगे बढ़ते गए लोगों ने महसूस किया कि आज वे कुछ और कर रहे हैं… वे मुखड़े पर आए –“जिस नगर में दया धर्म नहीं, उस नगरी में रहना चाहें…सोच समझ नादान” जिस नगरी में दया धर्म नहीं…उन्होंने इस पंक्ति को इतना विकृत कर लोगों के सामने गाया कि जैसे वे बार-बार लोगों को अहसास करा रहे थे कि जहाँ दया-धर्म नहीं तुम वहाँ रहना चाहते हो…सोचो!

“इस तरह वे अपना प्रतिरोध व्यक्त कर रहे थे। साहित्य में प्रतिरोध के स्वर होते हैं। अन्याय, शोषण और दमन के खिलाफ़ आवाज़ साहित्य उठाता है। गीत भी क्रान्तिकारी होते हैं लेकिन जहाँ तक शास्त्रीय संगीत की बात है, वो हमें इस दुनिया से किसी और अलौकिक दुनिया में ले जाता है। जहाँ सुकून मिलता है, शांति मिलती है। आनंद का अनुभव होता है। इसलिए संगीत में प्रतिरोध की गुंजाइश कम होती है। लेकिन, बहुत सारे कलाकारों ने संगीत को एक प्रतिरोध के हथियार की तरह इस्तेमाल किया है। ऐसा सामान्यत: नहीं होता, लेकिन कभी-कभी ऐसा हुआ है।“

यह कहना है प्रोफ़ोसर संजय कुमार का जिन्होंने राजकमल प्रकाशन समूह के फ़ेसबुक लाइव कार्यक्रम से जुड़कर मंगलवार की शाम ‘हिन्दुस्तानी संगीत: परंपरा और परिवर्तन’ विषय पर लोगों से बात कर कई रोचक बातें साझा कीं।

भविष्य को लेकर संशय हम सभी के मन में हैं। कोरोना के इस भयावह समय के बाद ‘नया सामान्य’ कैसा होगा। एकतरफ़ देश में कोरोना के मरीज़ बढ़ रहे हैं वहीं ‘इसके साथ जीना होगा’ की बात भी कही जा रही है। सभी को पता है कि यह इससे पहले की सभी बीमारियों से बहुत ज्यादा खतरनाक और अलग है। ऐसे में कई सवाल रोज़ हमारे आसपास से निकलकर सामने आ रहे हैं…संगीत के क्षेत्र में इसपर बात करते हुए प्रोफ़ेसर संजय कुमार ने कहा, “आने वाले समय में हम शायद दुनिया को प्री-कोरोना और पोस्ट-कोरोना की नज़र से देखेंगे। हमारे जीने की शैली बहुत बदल चुकी होगी। जाहिर है जब जीवन पर असर पड़ेगा तो संगीत पर भी असर पड़ेगा। संगीत के परिदृश्य में भी बदलाव आएगा। लेकिन ऐसे परिवर्तन पहले भी हो चुके हैं और हिन्दुस्तानी संगीत में परिवर्तन की परंपरा रही है।“

राजकमल प्रकाशन के फ़ेसबुक लाइव से जुड़कर संजय कुमार ने कई रोचक एवं ऐतिहासिक उदाहरणों से बताया कि परंपरा में एक प्रकार की गतिशीलता होती है। यह गतिशीलता आती है परिवर्तन से। यही परंपरा को जीवंत बनाता है। संगीत की परंपरा इसी परिवर्तन को अपने भीतर आत्मसात कर नई तरह से सामने आती है।

राजकमल प्रकाशन से इतिहासकार सुधीर चन्द्र और संजय कुमार की किताब ‘सुर संसार- सुधीर-संजय संवाद’ जल्द ही प्रकाशित होकर पाठकों के समक्ष होगी।

राजकमल प्रकाशन समूह के फ़ेसबुक लाइव के जरिए कई तरह के विषयों पर लाइव चर्चाएं होती हैं। लाइव बातचीत में इतिहास के उदाहरणों और वर्तमान में उम्मीद की रोशनी लेकर साहित्य प्रेमी और लेखक भविष्य के सवालों और संशयों की जांच पड़ताल करते दिखाई देती है। लॉकडाउन के दौरान इन लाइव कार्यक्रमों ने किताबों के जरिए लोगों का संबल बनाए रखने में सकारात्मक भूमिका निभाई है।

इसी सिलसिले में लेखक प्रज्ञा पाठक ने राजकमल प्रकाशन फ़ेसबुक लाइव के जरिए स्त्रियों के अधिकारों की पैरोकार, राजनेता एवं लेखक उमा नेहरू के विषय में लोगों से कई रोचक जानकारियां साझा कीं। प्रज्ञा पाठक ने बताया कि उमा नेहरू ने अपने समय के सवालों का न केवल डटकर मुक़ाबला किया बल्कि मिसालें भी पैदा कीं।

“उस दौर में जब हिन्दुस्तान अपनी आज़ादी के लिए संघर्ष कर रहा था, ऐसे में किसी और आंदोलन के बारे सोचना भी असंभव था। लेकिन, यह सच है कि बीसवीं शताब्दी के आरंभिक तीन दशक में भारत में स्त्री आंदोलन हुए थे। उस स्त्री आंदोलन की बहुत सारी बातें चौंकाने वाली थीं। उमा नेहरू ने उस आंदोलनों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। उन्होंने अपने समाज से ही अपने सवालों के जवाब ढूँढें और स्त्रियों को अपने अधिकारियों के प्रति जागरूक किया।“

प्रज्ञा ने कहा, “स्त्रियों के लिखे हुए का एक समाजशास्त्रीय पक्ष होता है। अगर हम उस समाजशास्त्रीय पक्ष को समझ पाएंगे तो हम उनके लेखन को भी समझ सकते हैं।“

उमा नेहरू पहली और दूसरी लोकसभी की सांसद की सदस्य थीं। उन्होंने संसद में स्त्रियों के अधिकार के साथ-साथ तमाम समाज के क्षेत्रों में स्त्रियों की भागीदारी का पुरजोर समर्थन किया था। वे नेहरू परिवार की पुत्रवधु थीं। प्रज्ञा पाठक की किताब ‘उमा नेहरू और स्त्रियों के अधिकार’ में उमा नेहरू के लेख संकलित है।

“जो चाबी मुझे खोलेगी, वह मेरे बारे में नहीं, अपने बारे में ज़्यादा बताएगी”

“फ़िलहाल जब हम एक-दूसरे से नहीं मिल सकते और आने वाले निकट भविष्य में भी ऐसा होना संभव नहीं दिख रहा, लाइव एक संभावना लेकर हमारे सामने है जिससे जुड़कर हम साहित्यिक बातें कर सकते हैं, एक-दूसरे से मिल सकते हैं।“

राजकमल प्रकाशन के फ़ेसबुक पेज से जुड़कर कवि आशुतोष दुबे ने अपनी बातें लोगों से साझा कीं तथा अपनी कवितओं का पाठ भी किया। कविताएं अपनी बात कहने का माध्यम है, यह बहुत जरूरी भी हैं। कविताएं बहुत दूर तक हमारे साथ होती हैं।

आशुतोष दुबे की कविता –

“जो दिखाई देता है / उसका अपना भी उजाला और अंधेरा होता है / कभी कभी अंधेरे में भी जाना पड़ता है/ उजालों की गठानें खोलने के लिए।“

उनकी एक और सुंदर कविता है –

“जाना ही हो / तो इस तरह जाना / कि विदा लेना बाकी रहे / न ली गयी विदा में इस तरह ज़रा सा / हमेशा के लिए रह जाना!”

कवि सुमन केशरी ने भी आभासी मंच से जुड़कर अपनी कई सुंदर कविताओं का पाठ किया। उन्होंने कहा, “इस समय में हमारे आसपास बहुत सारे लोग हैं जो अपनी जान दांव लगा कर हमारे लिए जीने की सुविधाएं उपलब्ध करवा रहे हैं। मैं उन सभी को प्रमाण करती हूँ।“

कविताओं का पाठ किया –

“मैं रहूंगी यहीं इसी धरती पर / भले ही रहूँ फूल राख की तरह इसी मिट्टी में में हिल-मिल / या फिर उग आउं पौधा बनकर अधजली, अतड़ी के किसी कोने में दबी बीज के कारण / यहीं कि हवा पानी के बल से पलते-बढ़ते पेड़ हो जाउं/ अनेक फूलों फलों बीजों वाला / लेकिन मैं रहूंगी यहीं इसी धरती पर…”

जाना हर भाषा में एक खौफनाक क्रिया है…

इस कठिन समय में सबसे ज्यादा बुरा है लोगों का जाना। एकांतवाश में हम उन्हें ठीक से विदा भी नहीं कर पा रहे। सोमवार को वरिष्ठ लेखक योगेन्द्र प्रताप सिंह के निधन ने हिन्दी साहित्य को थोड़ा और अकेला कर दिया। राजकमल प्रकाशन समूह के प्रबंध निदेशक अशोक महेश्वरी ने योगेन्द्र प्रताप सिंह को श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए कहा कि, “ वे छात्रों के बीच बहुत प्रचलित थे। हिंदी में पाठा- लोचन की परंपरा और भारतीय काव्यशास्त्र के गंभीर अध्येता थे। वह हिंदी विभाग, इलाहाबाद विश्वविद्यालय के अध्यक्ष रहे, हिंदुस्तानी एकेडेमी, इलाहाबाद की अध्यक्षता का पद भी उन्होंने संभाला था। उन्होंने उत्तर प्रदेश में सांस्कृतिक एवं साहित्यिक कार्यक्रमों को बहुत बढ़ावा दिया था।“ राजकमल प्रकाशन समूह की ओर से उन्हें सादर नमन।

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