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चैनलों की हनीप्रीत ने तो झाँसी की रानी को भी पीछे छोड़ दिया

हनीप्रीत के नॉनस्टॉप ‘एक्सक्लूसिव’ टीवी कवरेज को देखकर लगा कि उसका नाम तो ‘टीआरपी’ होना चाहिए। क्योंकि ऐसे चरित्र, ऐसी बोगस कहानियां और बेफालतू की बातें टीवी चैनलकर्मियों को निठल्ला और दर्शकों को बेवकूफ बनने पर मजबूर कर रही हैं। बस एक हांका लग रहा है- हनीप्रीत।

दुराचार के आरोप में जेल में बंद फर्जी बाबा राम रहीम की कथित मुंहबोली बेटी और मुलजिम हनीप्रीत ने मानो टीवी चैनलों को पागल कर दिया है। इस देश के हिंदी टीवी चैनलों के सहिष्णु दर्शकों ने एक जमाने में प्रधानमंत्री मोदी को (रात-दिन) झेला। लेकिन चलो वो तो पीएम हैं, उनका भी कुछ हक और अपना फर्ज बनता है। मोदी का खुमार जैसे-तैसे उतरा तो योगी आदित्यनाथ निरीह दर्शकों की टीवी टाइम का नाइंटी परसेंट ले जाने लगे। योगी की बल्ले-बल्ले तब टूटी जब गोरखपुर में मासूम बच्चों की सरकारी अस्पताल में ऑक्सीजन न मिलने से मौतें हुईं। टीवी दर्शकों ने सोचा कि कम से कम अब तो टीवी चैनल जमीन पर लौटेंगे। देश में कहां, क्या और क्यों रहा है, बताएंगे। लेकिन तब तक चैनलों को बाबा राम रहीम के रूप में नई ‘ऑक्सीजन’ मिल गई थी। उस पर मास्क हनीप्रीत का था। यह मास्क चैनलों कर ऐसा चढ़ा है कि उतरते नहीं उतर रहा। जिस चैनल पर जाओ, हनीप्रीत ही नजर आती है। भले ही पुलिस उसे ढूंढ रही हो।

बाबा की इस बेबी ‘हनीप्रीत’ के बारे में देश को तब पता चला, जब राम रहीम को दो साध्वियों से बलात्कार के आरोप में लंबी जेल हुई। उस वक्त एक स्मार्ट सी‍ लड़की बाबा का बोरिया बिस्तर बगल में थामे दिखाई पड़ी। कहते हैं कि वो बाबा के जेल जाने तक साथ रही और फिर रफूचक्कर हो गई। चैनलों ने यक्ष प्रश्न खड़ा किया कि आखिर हनीप्रीत गई कहां? उसे धरती खा गई या आसमान निगल गया? रडार की तरह यह संकेत देने की कोशिशें भी हुई कि हनी का डेरा कहां-कहां हो सकता है। बताया गया कि हनी बाबा को उसकी किस्मत पर छोड़ मुंबई चली गई। फिर खबर आई कि वह बिहार में है। ताजा सूचना यह है कि वह नेपाल में भटक रही है। यानी हनीप्रीत का पता चलना ही इस वक्त देश की पहली जरूरत है। वह न मिलेगी तो टीवी की टीआरपी बैठ जाएगी। टीआरपी बैठ जाएगी तो टीवी बैठ जाएगा। टीवी बैठ जाएगा तो लोग घरों में बैठना बंद कर देंगे। पूरी अर्थव्यवस्था और समाज व्यवस्था बैठ जाएगी। पूरे भरतखंड में त्राहि माम होगा। इसलिए हे हनीप्रीत, तुम जहां कहीं भी हो, टीवी कैमरों की जद में आ जाओ! कोई चैनल तुम्हें ‍मिस नहीं करेगा!

हमे हनीप्रीत के बारे में उतना कुछ बताया गया कि जितना तो वीरागंना रानी लक्ष्मीबाई के बारे में भी देश को नहीं मालूम। मसलन उसका असली नाम प्रियंका तनेजा है। वह बाबा के (अय्याशी के) डेरे में बचपन में ही आ गई थी और बाबा की नजरों में चढ़ गई थी। ऐसी चढ़ी कि बाबा ने उसे रिश्ते की ‘बेटी’ बना लिया। यह भी बताया‍ गया कि हनीप्रीत कोई मामूली युवती नहीं है। वह ‘सर्व गुण सम्पन्न’ अलौकिक नारी है। वह क्या नहीं करती? वह बाबा को रिझाती, बताती, सुझाती, सुलाती और चलाती है। वह बाबा की केयर टेकर और फिल्म मेकर भी है। वह बाबा के साथ एक्टिंग करती, नाचती, गीत लिखती और निर्देशन भी करती है। यह भी पता चला कि हनीप्रीत कैटरीना कैफ की तरह ‘जीरो फिगर’ पाना चाहती थी। वह डेरे की अघोषित सर्वेसर्वा थी। वह अपने नाम के आगे इंसा‍ ‍लिखती थी और इंसानों की मदद करने वाले भगवान से भी पंगा ले लेती थी। वह डेरे की ऐसी परी थी, जिसके इशारों पर वहां के सभी जिन्न नाचते थे। यही नहीं हनीप्रीत सदा मुस्कुराती ऐसी कली है, जिसके जीवन में मुरझाना लिखा ही नहीं है। इसी जोश में किसी चैनल ने हनी के पूर्व पति का वह बयान भी दिखाया कि उसकी पूर्व बीवी और बाबा में अवैध सम्बन्ध हैं। लेकिन यह बयान टीआरपीभंजक था। इसलिए उसे वहीं दफन कर दिया गया। मानो इतना ही काफी नहीं था। चैनलों ने हनीप्रीत श्रृंखला में एक सनसनीखेज खुलासा यह भी हुआ कि हनी की एक अहम डायरी भी मिली है। गोया यह डायरी ‍वर्जिनिया वुल्फ या एनी फ्रैंक की हो। उस डायरी में निकला क्या? चालू शायरी और बाबा के दम पर अमीर और डेरे की सत्ताधीश बनने के सपने।

टीवी चैनलों ने अपना कीमती टाइम बाबा और बेबी के रहस्यमय रिश्तों की व्याख्या में गंवाया। इस देश में अमूमन मुंहबोली बेटी को भी सगी बेटी जैसा ही पवित्र माना जाता है। लेकिन बाबा ने इस रिश्ते को भी ‘नया रूप’ दिया। जिसे बाबा बेटी बताता, उसी के साथ हरकतें कामिनी की तरह करता। लोकमानस इसे रासलीला मानता है। लेकिन चैनलों ने बाबा और बेबी के इस ‘अनोखे’ रिश्ते को इतने विविध कोणों से समझाने का उपक्रम किया कि लगा कि हमें कामसूत्र का कोई सॉफ्ट एडिशन बताया जा रहा हो। मसलन बाबा और बेबी के साथ डांस, चुहलबाजियां,शोखियां, इशारे, (आध्यात्मिक) प्रणय निवेदन, उत्तेजक वस्त्र विन्यास, भड़कीले सेट और एक दूसरे को ‘लव चार्जर’ बताने का महान संदेश। लव चार्जर बाबा और बेबी का एक रॉक सॉन्ग है, जिसे 43 लाख से ज्यादा लोगों ने देखा और अपनी ‘आध्यात्मिक जिज्ञासा’ शांत की।

मीडिया ने हमे यह बताने की कोशिश भी कि इस ‘लव चार्जर’ का असली टारगेट कौन है? आराध्य और आराध्या में क्या मधुर अंतर्सबंध है? यह अंतरंगता कितनी रहस्यमयी है? कितनी सघन और लीलामयी है? गनीमत है कि हिंदी के आदि कवि अमीर खुसरो के जमाने में टीवी चैनल नहीं थे। वरना वे भी देश की समस्याओं को लेकर यही सवाल करते- क्यों सखी भूख, बेकारी, अशिक्षा, गरीबी और बीफ? जवाब आता- ना सखि हनीप्रीत!

साभार- http://samachar4media.com से

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