डेढ़ बलिष्ठ का हैदराबादी वीर पंडित नरेंद्र जी

हैदराबाद में शेर के नाम से सुप्रसिद्ध, जिनके सम्बन्ध में पूछने पर हैदराबाद में बताया गया कि “ यह वही डेढ़ बलिष्ठ का नरेंद्र है, जिसने रियासत की नाक में दम कर रखा है|” पंडित नरेंद्र जी की महानता को दर्शाने के लिए इतने शब्द ही काफी हैं| पंडित नरेंद्र जी देश के गौरव की रक्षा के लिए अपना सब कुछ होम करने के लिए साधारणतया यह पंक्तियाँ गुनगुनाया करते थे:-

फुला फला रहे रब चमन मेरी उमीदों का,
जिगर का खून दे देकर ये बूटे मैंने पाले हैं|

हैदराबाद राज्य का इतिहास कोई लेखक जब भी कभी लिखने बैठता है तो उसे ऐसा लगता है कि यदि इसमें पंडित नरेंद्र जी का उल्लेख न किया गया हो तो यह इतिहास अधूरा ही है क्योंकि यह पंडित नरेंद्र जी ही थे, जिनके प्रयास तथा मेहनत के परिणाम स्वरूप न केवल वहां आर्य समाज ही मजबूत हुआ अपितु निजाम की हालत यह हो गई थी की वह पंडित जी के नाम के उल्लेख मात्र से ही घबरा जाया करता था| यद्यपि भारत के प्रथम प्रधान मंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू जी को पंडित के नाम से पुकारा जाता था किन्तु हैदराबाद में तो पंडित नरेंद्र जी की पहचान ही पंडित के नाम से थी|

पंडित जी का जन्म श्री केशव प्रसाद जी के यहाँ १० अप्रैल १९०७ ईस्वी को रामनवमी के दिन हुआ था| इस कारण विधर्मियों को आपने इस प्रकार छकाया जैसे श्री रामचंद्र जी ने राक्षसों को छकाया और रुलाया था| आप पंडित रामचंद्र देहलवी जी के प्रभाव से आर्य समाज में आये| इसके पश्चात् आर्य उपदेशक विद्यालय लाहौर में स्वामी स्वतान्त्रानंद जी के चरणों में बैठ कर वैदिक शिक्षा प्राप्त की| आपकी ओजस्वी लेखिनी तथा वाणी ने आपको लाहौर में रहते हुए ही जेल के दर्शन करवा दिए| इस प्रकार अपने जीवन में आपको जेल एक खिलौना के समान ही दिखाई देती थी|

हैदराबाद के निजाम के अत्याचार आर्यों और हिन्दुओं पर दिन प्रतिदिन बढ़ते ही जा रहे थे| आर्यों को तो निजाम उनके दैनिक क्रिया कलाप करने से भी रोकता था| यहाँ तक कि एक आर्य परिवार के निवास पर ओउम् का झंडा फहरा रहा था| इस झंडे को देखकर वहां की पुलिस झंडा उतरवाने आ पहुंची| झंडा न उतारने पर पिता पुत्र को गोली मार दी तथा घर को आग लगा कर चले गए| इस आग में पति पत्नी तथा उनका बेटा जीवित ही जला दिए गए|

इस प्रकार के अत्याचार न केवल पंडित नरेंद्र जी के लिए एक चुनौती के समान थे अपितु पंडित नरेंद्र जी स्वयं भी वहां के निजाम के सामने एक चुनौती बने हुए थे| अत: इस चुनौती का सामना करने के लिए आप निजाम के सामने अटल होकर एक चुनौती के समान खड़े हो गए| इस समय पंडित जी ने करो या मरो की नीति का अनुसरण करते हुए निजाम के सामने डट कर खड़े हो गए| इस प्रकार पंडित जी ने स्वामी दयानंद सरस्वती जी से मिली शिक्षाओं का यहाँ साक्षात् किया| स्वामी जी से ही आपने भी बलिदानी परम्परा को प्राप्त किया| फिर जो आर्य समाज उस समय लगातार अंग्रेज का सामना कर रहा था, हैदराबाद का निजाम उस आर्य समाज और इस के वीरों के लिए क्या चीज था?

सन् १९३० ईस्वी को आर्य समाज ने हैदराबाद में नागरिक अधिकारों की प्राप्ति के लिए एक जबरदस्त लड़ाई वहां के शासक मुसलमान निजाम के साथ आरम्भ कर दी| इस मध्य ही देश की आर्य समाज का इतना सहयोग मिला कि सन् १९३१ में वहां आर्य प्रतिनिधि सभा की स्थापना भी कर दी गई| कुछ ही समय में यहाँ सत्याग्रह आन्दोलन चलाने के लिए भीषण शंखनाद हुआ| हैदराबाद ही नहीं देश भर के आर्यों ने सत्याग्रह करते हुए निजाम की जेलें भरनी आरम्भ कर दीं | दिन प्रतिदिन सत्याग्रहियों की संख्या बढ़ती ही चली जा रही थी| निजाम तो पंडित जी से पहले से ही भयभीत रहता था, अब तो पंडित जी को स्वाधीन रखने में वह अपने लिए बहुत बड़ा खतरा मानने लगा, इस कारण पंडित जी को हिरासत में ले लिया गया| हैदराबाद में कालापानी से भी कहीं अधिक भयभीत करने वाली तथा हैदराबाद में कालापानी के नाम से सुप्रसिद्ध मनान्नूर जेल भेजा गया, जो महबुबनगर के घने जंगलों है| जेल के नाम पर जंगल में पिंजरा रखा गया था, जिसमें पंडित जी को बंद करके छोड़ दिया गया| एक रात पंडित जी को अनुभव हुआ कि कोई जंगली जानवर पिंजरे से छेड़छाड़ कर रहा है| जब उन्होंने देखा तो पाया कि एक शेर पिंजरे की सींखचों में से जीभ निकाल कर उनके पैर को चाट रहा था| इस प्रकार की भयंकर जेल बनाई गई थी इन जंगलों में!

सत्याग्रहियों की निरंतर बढ़ रही संख्या के कारण निजाम की नाक में दम आ चुका था| १२००० सत्याग्रहियों की संख्या इस छोटे से राज्य की जेलों में समा नहीं पा रही थी तथा और सत्याग्रही भी लगातार आ रहे थे| इन सब सत्याग्रहियों की केवल भोजन की व्यवस्था में ही रियासत की अर्थ व्यवस्था गडबडाने लगी थी| एक प्रकार से अर्थ व्यवस्था की गिरावट के कारण निजाम की रीढ़ ही टूट चुकी थी| परिणाम स्वरूप निजाम ने सार्वदेशिक आर्य प्रतिनिधि सभा के इस सत्याग्रह आन्दोलन के सामने घुटने टेकते हुए आर्यों की सब मांगे मानते हुए सत्याग्रह समाप्त करने की प्रार्थना की| सब शर्तें तो मान लीं किन्तु उसने कहा कि वह पंडित नरेंद्र जी को नहीं छोड़ेगा| इस बात को सारवादेशिक सभा कैसे स्वीकार कर कर सकती थी? अत: सत्याग्रह डेढ़ महिना और लंबा खिंच गया| अंत में निजाम ने पंडित नरेंद्र जी को भी न केवल छोड़ने पर सहमती दी अपितु उन्हें छोड़ भी दिया गया| हाँ! जंगल की इस नाम मात्र की जेल में भी पंडित जी को बुरी तरह से पीटा जाता रहा और इस पिटाई के कारण उनका एक घुटना तोड़ दिया गया| यह घुटना पंडित जी को आजीवन परेशान करता रहा|

पंडित जी को तो छोड़ दिया गया किन्तु उनके परिजन, जो उस समय निजाम के पास कर्मचारी थे, ने निजाम के कोप से बचने के लिए नरेंद्र जी से अपने सब सम्बन्ध तोड़ लिए|( बहुत बाद में जाकर पुन: मिलने लगे) मैं जब १९६८ में भारत भ्रमण करते हुए प्रा राजेन्द्र जिज्ञासु तथा कालेज के चार अन्य विद्यार्थियों के साथ लगभग २५ मई १९६८ को हैदराबाद के आर्य प्रतिनिधि सभा के कार्यालय गया और उनसे मिला तो उन्होंने जो अनेक घटनाएँ अपने जीवन की हैदराबाद निजाम से सम्बंधित सुनाईं, उनमें से एक घटना इस प्रकार है:-

आर्य समाज के एक बहुत बड़े विद्वान् को एक क्षेत्र में प्रचार करने के लिए बुलाया गया| जब वह विद्वान् हैदराबाद में सभा कार्यालय पहुंचे तो नरेंद्र जी उन्हें एक बस में चढ़ा आये ताकि वह निर्धारित स्थान पर प्रचार के लिए पहुँच जावें और उन्हें बताया कि वह भी शीघ्र ही वहां के लिए रवाना होंगे| वह विद्वान् वहां गंतव्य स्थान पर पहुंचे ही थे कि एक कार उनके पास रुकी और इस कार में से पंडित जी बाहर निकले| पंडित जी को देखते ही वह विद्वान् बोल उठे “ वाह पंडित जी वाह, आप तो मजे से कार में आ गए और मुझे धक्के खाने के लिए बस पर बैठा दिया|
” पंडित जी उन्हें कार के पास ले गए ओर बोले कार में बैठें| इस प्रकार दोनों कार में बैठ गए| अब कार में फलों से भरी एक टोकरी रखी हुई थी| पंडित जी ने बड़ी सावधानी से कुछ फल उठाये तो नीचे के सामान को देखकर वह विद्वान् दंग रह गए| यह और कुछ नहीं हैदराबाद के निजाम के होश उड़ाने वाले बम थे| पंडित जी ने फिर से टोकरी को ढकते हुए कहा कि इस कारण आपको बस में बैठाया था ताकि मार्ग में कहीं हम पुलिस के हाथ चढ़ गए तो आपको कुछ न हो| इस पर वह विद्वान् चुप हो गए|

इसी दौरान पंडित जी ने बताया कि अब न तो मेरा कोई व्यक्तिगत परिवार है और न ही जाति है| आर्य समाज ही मेरा परिवार है और आर्य ही मेरी जाति है| इतना ही नहीं आर्य प्रतिनिधि सभा हैदराबाद का यह कार्यालय ही अब उनका घर है| जीवन के अंतिम क्षणों तक पंडित जी इस कार्यालय में ही निवास करते रहे|

१९७५ ईस्वी को सार्वदेशिक आर्य महा सम्मलेन दिल्ली के रामलीला मैदान में हुआ| इस सम्मेलान की व्यवस्था का कार्य आप के कंधो पर दिया गया| इस सम्मलेन में दस लाख से भी अधिक लोग आये थे| उन सब के निवास, शोच, स्नान, भोजन आदि की तथा सम्मलेन स्थल पर लगी दुकानों और मंच की इतनी सुन्दर व्यवस्था की गई की देखने वाले देखते ही रह गए| इस प्रकार के प्रबंध पटू थे हमारे पंडित नरेंद्र जी|

आपने वैदिक आदर्श नाम से एक पत्रिका का भी सम्पादन किया| आपकी लिखी पुस्तक “दयानंद आजम” अत्यंत ही पठनीय पुस्तकों में से एक है| पंडित जी की संगठन तथा व्यवस्था के सम्बन्ध में अद्वीतीय सूझ थी| आपके सहयोग से जहाँ सार्वदेशिक महा सम्मेलन सफलता पुर्वक संपन्न हुआ, वहां आपने अन्य भी अनेक सम्मेलनों की सफलता में भी अपना योग दिया और इन सब को सफलता पूर्वक संपन्न भी किया|

छोटे से कद के पंडित जी सदा ही शांत तथा गंभीर रहते हुए चुपचाप इतना काम कर जाते थे कि किसी को पता ही नहीं चलता था| अपनी शांत वाणी रखते हुए इतनी विशाल योजना बना डालते थे कि इसे देखने वाले दंग रह जाते थे| सन् १९७५ ईस्वी में दिल्ली में आर्य महा सम्मलेन हुआ तो इस सम्मलेन में आपने स्वामी सत्य प्रकाश जी से संन्यास की दीक्षा ली और नाम बदलकर स्वामी सोमानंद जी हो गया| आपका देहांत २४ सितम्बर १९७८ ईस्वी को हैदराबाद में ही हुआ|

पंडित जी का देहांत हुए आज ४२ वर्ष हो गए हैं जब्ज्क्की हैदराबाद के सत्याग्रह आन्दोलन को हुए आज ९३ अर्श हो गए हैनं किन्तु हैदराबाद का उस क्षेत्र आज के मुसक्लाम लीग आज भी भी पंडित जी के नाम मात्र से ही भयभीत रहते हैं| इस का प्रमाण यह है की कुछ वर्ष पूर्व प्र. राजेन्द्र जिज्ञासु बस स्टैंड पर खड़े पंक्तिमे खड़े थे| महाराशतर में परमपरा है की पंक्तिमे होकर ही बस में चढ़ाना होता है किन्तु ज्यों ही बस आई पंक्ति में से सब मुसलमान निकल कर बस को लपक लिए| इस पर हमारे प्र. राजेन्द्र जिज्ञासू जी बड़े ऊँचे स्वर में ललकारते हुए बोले अरे! हटो! मैं पंडित नरेंद्र जी की सेना का सिपाही हूँ , देखता ह उन मुझे बस में चढाने से कौन रोकता है| पंडित नरेंद्र जीका नाम सुनते ही सब मुसलमान एक और को हट गए और परा. राजेन्द्र जिज्ञासु जी बड़े आराम से बस में चढ़ भी गे और उन्हने बैठने को सीट भिमिल गई|

आज अपंदी जी हमारे मध्य नहीं हैं किन्तु उनके आदर्श आज भी हमारे सामने हैं| यदि हम आज भी पंडित जी के जीवन से प्रेरणा लेकर उन्हीं की बताई विधि से उन्हीं के ही बताये मार्ग पर चलते हुए कार्य करें तो निश्चय ही हम आर्य समाज के लिए बहुत कुछ कर सकेंगे| बस इतना है कि अपने अहम को त्याग कर पदों से ऊपर उठकर कार्य करें| पद लौलुप्ता अर्थात् लौकेष, वित्तेष्णा से ऊपर रहें| जब कोई ऐषणा ही नहीं होगी तो स्वार्थ कभी भी बाधक नहीं बनेगा|

डॉ.अशोक आर्य
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