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लन्दन में उभरती हुई भारतीय मूल की पेंटर स्मिता सौंथालिया से बातचीत

इन दिनों लन्दन में जब से गरमी के मौसम की शुरूआत हुई है, सांस्कृतिक, कला, मनोरंजन की गतिविधियों की भी जैसे बाढ़ आ गयी है . एक से एक अनूठे तरीक़े से कला को आम आदमी तक जोड़ने की कोशिश की जाती है, जहां एक ओर गैलरियाँ सज जाती हैं वहीं जाने माने कलाकार अपने स्टूडियो के दरवाज़े भी कला प्रेमियों के लिए खोल देते हैं . कला के वार्षिक कुम्भ में हमारी मुलाक़ात भारत से चार वर्ष पूर्व लन्दन में आ कर बसी पेंटर स्मिता सौंथालिया से उनके नोर्थ हेरो स्थित स्टूडियो में हुई . ये चार वर्ष स्मिता के लिए काफ़ी महत्वपूर्ण रहे हैं . कुल मिला कर पच्चीस से भी अधिक प्रदर्शनियों में अपने हुनर को दिखाने का अवसर मिला है , जिसमें स्काईलार्क और आर्ट हाउस गैलरी जैसी जानी मानी दीर्घाएँ शामिल हैं. साथ ही उन्होंने टैलेंट आर्ट फ़ेयर , पैरालेक्स आर्ट फ़ेयर में हिस्सा लिया . भारतीय विद्या भवन में Inspiring Indian Women में भी आमंत्रित किया गया और नेहरू सेंटर में 2018 में आयोजित प्रदर्शनी में भी शामिल हो चुकी हैं .

स्मिता की परवरिश राँची में हुई थी . बचपन से ही कुछ न कुछ कलाकारी में रुचि थी , पहली पेंटिंग पाँचवीं कक्षा में बनाई उसका विषय वस्तु राधा कृष्ण थे .

मैं पूछता हूँ , “आख़िर आपने पेंटिंग करना क्यों और कैसे शुरू किया?”.
स्मिता बताती हैं ,”मुझे बचपन से ही कुछ भी पेंट करके बेहद सुखद अनुभूति होती थी .”

स्मिता को अपनी कला प्रतिभा का पहला स्वाद कालेज में मिला जब उनकी कलाकृतियाँ को राँची आर्ट एंड क्राफ़्ट फ़ेयर में सराहना मिली .

“कला का औपचारिक प्रशिक्षण ?”

“मैंने राँची में फ़ाइन आर्ट्स में डिप्लोमा किया . बाद में मैसूर सेव फ़ाइन आर्ट्स में मास्टर डिग्री ली .”

“व्यवसायिक कलाकार के रूप में कब काम करना शुरू किया “.

“प्रारम्भ में मैंने जो लगभग डेढ़ सौ पेंटिंग बड़े ही श्रम से बनाईं थीं उन्हें गिफ़्ट कर दिया. बाद में मैं अपने पति अक्षय के जाब के कारण सिंगापुर पहुँच गई तो वहाँ काफ़ी सारी पेंटिंग कला प्रेमियों के लिए कमीशन पर बनाईं . वहीं से गम्भीर व्यवसायिक पेंटिंग का सिलसिला शुरू किया. लन्दन आ कर मैंने हेचएंड में कला शिक्षक के रूप में कार्य करना शुरू किया और साथ ही व्यवसायिक कला के क्षेत्र में भी कदम रख दिया .”

“आप अपनी कलाकृतियों को कैसे परिभाषित कर सकती हैं ?”

“मेरा प्रयास रहता है कि मैं अपनी कलाकृतियाँ में रंगों के ज़रिए एक ख़ुशनुमा और सुकून क़िस्म का एहसास जगा सकूँ . मेरी पेंटिंग्स में इसका माध्यम तितली , चिड़ियाँ तो कभी पेड़ या फूल बन जाते हैं। मेरी पेंटिंग कहानियाँ भी समेटे हुए रहती हैं . इस बार की प्रदर्शनी के लिए मैंने पाँच पेंटिंग की एक शृंखला बनायी है जो स्त्री की क्रमिक यात्रा को दर्शाती हैं , इस में स्त्री के दुःख दर्द और साझे रिश्तों का चित्रण है . इसकी प्रेरणा में उड़ीसा की लोक कला परम्परा है . मेरी एक और शृंखला की कहानियाँ पेड़ के इर्दगिर्द रहती हैं , इसमें पक्षी और जानवर भी पात्र बन जाते हैं .”

“आगे की योजना ?”

“अभी तो मेरी कला यात्रा की शुरुआत ही हुई है . मैं चाहती हूँ कि मेरी कृतियों के माध्यम से भारतीय लोक संस्कृति की गूंज सात समंदर पार के का कला प्रेमियों के बीच पहुँचे . बस इसी के लिए जी जान से लगी हुई हूँ .“

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