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सऊदी अरब में महिलाओं को वोट देने का अधिकार!

सऊदी अरब का नाम कानों में सुनाई पड़ते ही हमारी आंखों के सामने एक ऐसा देश आकर खड़ा हो जाता है जहां केवल रेगिस्तान ही रेगिस्तान है। उस रेत के ढेर पर खड़ा एक अरब है जिसके हाथों में ऊंट की नकेल है, जिसके पीछे ऊंटों की एक लम्बी कतार है। वहां का राजा अपनी कट्टरता के लिए जग प्रसिद्ध है लेकिन खनिज तेल का उसके पास एक बड़ा खजाना है, इसलिए विश्व का हर देश उसका मोहताज है। वहां का राजा इस्लामी देशों का शहंशाह कहलाता है क्योंकि वह सबसे बड़े आस्था स्थल मक्का मदीना का मालिक है। प्रतिवर्ष लाखों मुसलमान हज यात्रा पर जाकर धन्य हो जाते हैं। इस्लामी देश ही नहीं विश्व की समस्त बड़ी हस्तियां उसके ईद-गिर्द चक्कर काटती रहती हैं।

वहां धरती की कोई कमी नहीं है लेकिन रेत का समुद्र होने के कारण हरियाली केवल नगरों के आस-पास देखी जा सकती है। महिलाएं सड़कों पर दिखाई नहीं देतीं, जो भी दिखलाई पड़ती हैं ऊपर से नीचे तक पर्दे में लिपटी दिखलाई पड़ती हैं। वे कार नहीं चला सकतीं और एक मर्यादित आयु तक मदरसे में जाकर मजहबी शिक्षा प्राप्त कर सकती हैं। महिला जगत पर जितने प्रतिबंध हो सकते हैं वे सब आपको वहां दिखलाई पड़ेंगे। लोकतंत्र की चिडि़या वहां नहीं चहकती और महिला शिक्षण के नाम पर आज भी वहां कोई गतिविधि नहीं दिखलाई पड़ती। लेकिन पिछले दिनों यह समाचार पढ़ने को मिला कि वहां के कट्टरवादी राजा ने अपने देश की महिलाओं को वोट देने का अधिकार दे दिया है। लेकिन जब वहां लोकतंत्र ही नहीं है तो वोट देने का क्या अर्थ है? जो भी स्थिति है, उसके उपरांत भी सऊदी महिलाओं को मताधिकार मिल जाना इस्लामी दुनिया में एक बड़ी क्रांति है। राजा शाही होने के कारण लोकतंत्र नाम की चिडि़या तो वहां नहीं चहचहाती लेकिन अपने नगर की पंचायत अथवा कोई इसी प्रकार की लोकतांत्रिक संस्था होगी तो वहां की स्त्री शक्ति को सऊदी शहंशाह ने वोट दोने का अधिकार दे दिया है। वोट का नाम उस देश में सुनने को मिला है जहां किसी शाला की एक छोटी बच्ची ने शाला का निरीक्षण करने आए अधिकारी के सामने सवाल पूछने पर यह कह दिया कि मुझे इस कविता से प्रेम है। प्रेम का शब्द उसके मुंह से सुनते ही शिक्षक और शाला का निरीक्षण करने आए अधिकारी ने उस छोटी सी मासूम बच्ची को शाला से निकाल दिया था। निरीक्षक महोदय ने उस बच्ची के मुंह से प्रेम शब्द सुनकर ही दंड स्वरूप उसे शाला से खारिज कर दिया था।

अब उसी अरबी समाज की महिलाओं को यदि मतदान करने का अधिकार मिल गया है तो फिर यह चमत्कार ही कहलाएगा! दुनिया में जिस प्रकार से मीडिया में क्रांति आई है उसका यह नतीजा है कि अब उसी मक्का-मदीना के देश में वहां महिलाएं मतदान कर सकेंगी। सऊदी महिलाओं को यह संदेश मिल गया है कि वे अब आगे से अपने नगर की पंचायतों और पालिकाओं के चुनाव में मतदान कर सकेंगी। 21वीं सदी में सांस ले रहे असंख्य लोगों में यह संदेश गया है कि आज नहीं तो कल सऊदी राजा को लोकतंत्र की सच्चाई का भान होगा, इतना ही नहीं वे अपनी पुरुष जनता के साथ-साथ, महिला आबादी को भी लोकतंत्र का सुफल देने में पीछे मुड़कर नहीं देखेंगे। सऊदी में आए इस सामाजिक बदलाव के कारण इस्लामी जगत की चेतना कट्टरवादियों के लिए एक चुनौती बन गई है। इस आदेश से यह बात पक्की हो गई है कि मक्का-मदीना, ताइफ और रियाद जैसे बड़े शहरों की नगरपालिका अथवा महानगर पालिका में होने वाले अगले चुनावों में वहां के अखबारों की रपट के अनुसार सऊदी में जब हज यात्रा समाप्त हो जाएगी उसके पश्चात वहां होने वाले चुनावों में महिलाएं अपने मत का पहली बार उपयोग कर सकेंगी। लेकिन सरकारी विज्ञप्ति में यह भी स्पष्ट कर दिया गया कि महिलाएं वोट तो दे सकेंगी लेकिन स्वयं उम्मीदवार नहीं बन सकतीं। इस स्थिति पर वहां के दैनिक गजट का कहना है कि इस घड़ी तो महिलाओं की विजय आधी अधूरी ही कहलाएगी।

जिस दिन वे अपनी स्थानीय संस्थाओं का चुनाव लड़कर सदस्य ही नहीं बल्कि मेयर पद पर पहुंचेंगी, असली विजय तो तभी हो सकेगी। लेकिन सऊदी महिलाओं को लोकतंत्र की जिस पहली सीढ़ी पर चढ़ने में सफलता मिली है उसका स्वागत करते हुए सऊदी से बाहर रहने वाले नागरिक अपनी प्रसन्नता व्यक्त कर रहे हैं। उनके देश में तो यह आजादी नहीं है लेकिन बाहर बैठे सऊदी एक-दूसरे को बधाई देते हुए यह विश्वास व्यक्त कर रहे हैं कि अब सांसद बनने और चुनाव के माध्यम से सऊदी में सरकार बनाने के सपने साकार होंगे। अरबस्तान की भूमि पर पूर्ण लोकतंत्र स्थापित हो सकेगा या नहीं। लेकिन सऊदी के विदेश में रहने वाले नागरिकों के लिए अभी असली आजादी बहुत दूर है। पिछले दिनों छपी देश-विदेश के अखबारों की एक रपट में कहा गया था कि सोशल मीडिया की लोकप्रियता के कारण वहां के अखबारों की संख्या धड़ल्ले से कम हो रही है, इस आधार पर कहा जा सकता है कि सोशल मीडिया, विचार और समाचार की शक्ति बढ़ने से विचारों को भी प्रभावित कर रहे हैं। इस प्रकार की जानकारी निश्चित ही सऊदी में विचार स्वतंत्रता को एक नई दिशा देने वाली आशा को जागृत करती है। अभी तो इसकी अटकलें ही लगाई जा रही हैं। एक तो शिक्षा जगत में सऊदी का पिछड़ापन और दूसरी अमरीका जैसे देशों की यह रीति-नीति रही है कि किसी भी पिछड़े देश में सामाजिक क्रांति होना उनके हितों को नुकसान ही पहुंचाएगी। लेकिन जब सोया हुआ ड्रेगन चीन जाग गया और देखते-देखते उनकी ताकत का लोहा दुनिया मान गई तो फिर सऊदी अरब में भी क्रांति आ जाए तो कैसा आश्चर्य? इस परिवर्तन को लोकतंत्र का चमत्कार कहना ही होगा।

पिछले दिनों सऊदी अरब के अनेक नगरों में पंचायत और नगरपालिका स्तर के चुनाव सम्पन्न हुए जिसमें वहां सऊदी महिलाओं को पहली बार वोट देने का अधिकार दिया गया। उक्त समाचार पर अब भी लोगों को विश्वास नहीं हो रहा है लेकिन यह आज की सऊदी का यथार्थ है जिसे स्वीकार करना ही पड़ता है। इसे महिला जगत में आई क्रांति कहकर सऊदी सहित दुनिया के सभी बड़े देशों ने समाचार पत्रों की सुर्खी बनाया है। चूंकि अब तक सऊदी महिला अनेक राजनीतिक, सामाजिक और मानवीय अधिकारों से वंचित थी इसलिए निश्चित ही अंधकार में यह उजाले की एक प्रथम किरण समान है। देश और दुनिया को यह आश्चर्य है कि जिस सऊदी की सडकों पर कोई महिला कार नहीं चला सकती थी अब वहां महिला शासन और प्रशासन के गठन में भागीदार बनेगी तो निश्चित ही यह उनके लिए सबसे बड़ा क्रांति का पर्व ही कहलाएगा। जिन महिलाओं ने मतदाता के रूप में अपने नामों का पंजीकरण करवाना शुरु कर दिया है उनका कहना है कि अब वे न केवल मतदाता बनेंगी बल्कि उम्मीदवार बनकर चुनाव भी लडे़गी।
उन्हें यह वरदान स्वर्गीय राजा अब्दुल्ला ने 2011 में ही दे दिया था। लेकिन पिछले दो वर्षों के बाद संघर्ष का यह परिणाम आया है कि सऊदी महिलाएं मतदान भी करेंगी और चुनाव लड़कर अपने नगर की भाग्यविधाता भी बनेंगी। पिछले शाह अब्दुल्ला को वहां की जनता प्रगतिशील राजा कहकर पुकारती है। क्योंकि पिछले दो वर्षों में महिला जगत में जो परिवर्तन आए, वे पिछले एक हजार वर्ष में भी कभी नहीं आए। उनके समय से ही राजाशाही के अधिकारों की कटौती प्रारम्भ हो गई थी। इसलिए क्रांति के वाहक राजा अब्दुल्लाह के प्रति वहां की जनता और विशेषतया सऊदी महिलाएं उनकी आभारी रहेंगी। शाह अब्दुल्ला ने अपने परामर्शदाता मंडल में महिलाओं को स्थान देना प्रारम्भ किया था। उनका मानना था कि शिक्षा और स्वास्थ्य दो ऐसे क्षेत्र हैं जहां महिलाएं पुरुषों की तुलना में बेहतर काम कर सकती हैं। यह आश्चर्य की ही बात थी कि 2012 के लंदन में आयोजित ओलम्पिक खेलों में सऊदी महिलाओं को शामिल होने की आज्ञा प्रदान की गई। सऊदी महिलाओं ने अपने शरीर को सर से पांव तक ढककर इस विश्व स्पर्द्धा में भाग लिया था। अब सरकारी स्तर पर सऊदी महिलाएं सड़कों पर कार भी चला सकती हैं, लेकिन इसके बावजूद अभी यह दृश्य बहुत सामान्य नहीं बना है। उसके पीछे का कानून राजा का नहीं बल्कि वहां बैठे हुए फतवा देने वाले मजहबी मुल्लाओं और मौलवियों का है।

सऊदी अरब में शरीयत और सुन्नत का राज है। इसलिए मुल्ला मौलवी आम जनता को चैन से नहीं रहने देते। उनकी पकड़ इतनी मजबूत है कि वे अपने मौलवियों व उलेमाओं के सामने अपनी मन की बात नहीं रख सकते। उनका कहना है कि इस्लामी शरीयत के विरुद्ध कुछ भी नहीं किया जा सकता। धर्म राज होने से मौलाना ही सर्वोपरि हैं। इसलिए असली लड़ाई तो वहां की जनता को इन कठमुल्लाओं से लड़नी है। सऊदी की सड़कों पर कोई भी महिला अकेली नहीं जा सकती। उसे यदि जाना ही है तो उसका रक्त से जुड़ा कोई सगा सम्बंधी भी साथ होना चाहिए। पर्दे में रहकर भी उसका बाहर अकेले निकलना कठिन है। यह एक ऐसी कड़ी शर्त है जो हर परिवार को माननी पड़ती है। महिला यदि कार चला रही है तो पास ही उसका रक्त से जुड़ा कोई भी सगा सम्बंधी बैठा हुआ होना चाहिए। ड्राइविंग लाइसेंस पर यह शर्त लिखी जाती है। उलेमाओं का फतवा कानून के समान ही बाध्य करने वाला होता है।
सऊदी में महिलाएं स्टेडियम में जाकर फुटबाल अथवा क्रिकेट का खेल देखने नहीं जा सकती हैं। वहां के मुल्लाओं का कहना है कि वे फूटवाल के खेल को नहीं बल्कि खिलाड़ी पुरुषों की जंघाएं देखने को आती हैं। इस प्रकार की गंदी मानसिकता को भला कौन बर्दाश्त कर सकता है? सऊदी में महिलाओं को ‘ड्रेस कोड’ का बड़ी सख्ती से पालन करना पड़ता है। वे अपने शरीर पर चाहे जैसे वस्त्र धारण करें लेकिन उन्हें शरीर पर एक लम्बा कोट जैसा वस्त्र धारण करना होता है। ऐसा न करने वाली को कोडे़ मारे जाते हैं। इस दंड से किसी को मुक्ति नहीं। पाठक उस राजकुमारी के बारे में अवश्य ही जानते होंगे जिसके परपुरुष से सम्बंध स्थापित हो जाने के कारण उसका शिरच्छेद किया गया था। यह दंड हर शुक्रवार को दोपहर की नमाज के पश्चात सार्वजनिक स्थान पर दिया जाता है। उसमें कोड़े मारना और शिरच्छेद करना भी शामिल होता है। सऊदी कानून के अनुसार टीवी पर समाचार देने अथवा किसी प्रकार के विज्ञापन देते समय उस महिला को कपड़ों का एक निश्चित कोड अपनाना ही पड़ता है। उपरोक्त जानकारी हो जाने के पश्चात कोई भी व्यक्ति यह कह सकेगा कि जिस देश में महिलाओं के लिए इतने बंधन हों वहां मतदान का अधिकार किसी महिला को दे दिया जाना अपने आपमें एक बहुत बड़ा कदम और 21वीं शताब्दी का चमत्कार ही कहलाएगा।

साभार- साप्ताहिक पाञ्चजन्य से

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