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ऋषि दयानन्द की दृष्टि में शिक्षक/अध्यापक/आचार्य की योग्यता व गुण

दयानन्द ने आचार्य, गुरु अथवा पण्डित आदि शब्द अध्यापक के लिए समान अर्थ में प्रयुक्त किये हैं। इनके अनेक स्थलों पर अर्थ व परिभाषाएं भी प्रस्तुत की हैं, जो कि द्रष्टव्य हैं:
–जो विद्यार्थियों को अत्यन्त प्रेम से धर्म युक्त व्यवहार की शिक्षा व विद्यावान् बनाने के लिए तन मन और धन से प्रयत्न करे उसको आचार्य कहते हैं। – व्यवहारभानु।
-जो श्रेष्ठ आचार को ग्रहण कराके सब विद्याओं को पढ़ा देवे, उसको आचार्य कहते हैं। – आर्योद्देश्यरत्नमाला।

-जो सांगोपांग वेद विद्याओं का अध्यापक, सत्याचार का ग्रहण और मिथ्याचार का त्याग करावे वह आचार्य कहता है। – स्वमन्तन्यामन्तव्यप्रकाश।

इन परिभाषाओं को देखने से स्पष्ट है कि अध्यापक में दो प्रकार के गुण व योग्यताएँ होनी अपेक्षित हैं। एक वह पूर्ण विद्वान् हो, अपने विषय का पण्डित हो तथा साथ ही उसमें चरित्रगत व मानवीय गुण भी हों। दयानन्द ने अन्य स्थान पर भी अध्यापक और अध्यापिका कैसे होने चाहिएं, इस विषय प्रकाश डाला है :
– जिसको आत्मज्ञान हो, जो निकम्मा व आलसी कभी न रहे, सुख-दुःख हानि-लाभ, मानापमान, निन्दास्तुति में हर्ष शोक कभी न करे, धर्म ही में नित्य निश्चित रहे, जिनके मन को उत्तम-उत्तम पदार्थ अर्थात् विषय सम्बन्धी वस्तुएँ आकृष्ट न कर सके, वही पण्डित कहाता है।
– जो कठिन विषय को भी शीघ्र जान सके। बहुत काल पर्यन्त शास्त्रों को पढ़े, सुने और विचारे। जो कुछ जाने उसे परोपकार में प्रयुक्त करे। अपने स्वार्थ के लिए कोई काम न करे, बिना पूछे व बिना योग्य समय जाने दूसरे के अर्थ में सम्मति न दे, वही प्रथम प्रज्ञान पण्डित को होना चाहिए।

– जिसकी वाणी सब विद्याओं और प्रश्नोत्तरों के करने में अति निपुण हो, जो विचित्र शास्त्रों के प्रकरणों का वक्ता, यथायोग्य तर्क और स्मृतिमान् ग्रन्थों के यथार्थ अर्थ का शीघ्र वक्ता हो, वही पण्डित कहाता है।

आज जब शिक्षक के गुणों की चर्चा की जाती है तब यह कहा जाता है कि शिक्षक के लिए अपने विषय का पण्डित होना बहुत आवश्यक है। किन्तु उसके चरित्रगत व मानवीय गुणों की सर्वथा उपेक्षा कर दी जाती है। अध्यापक की नियुक्ति करते हुए केवल परीक्षा में प्राप्त उसके परिणाम को ही दृष्टि में रखा जाता है, उसके किसी मानवीय गुण को नहीं; जबकि आज भी शिक्षक से यह आशा की जाती है कि वह मानवीय गुणों से युक्त हो। भाषणों में और लेखों में अध्यापक को राष्ट्र का निर्माता कहकर उसमें अनेक गुण कल्पित किये जाते हैं, पर व्यवहार में अध्यापक में इन गुणों का अभाव पाया जाता है।

आज का अध्यापक केवल अपनी कक्षा में व्याख्यान देकर अपना कर्तव्य पूरा कर लेता है, पर कक्षा के बाहर छात्र क्या करता है, इससे उसका कोई सम्बन्ध नहीं होता। पर दयानन्द के अध्यापक को इस बात की चिन्ता है कि उसके पढ़ाए ज्ञान का उसका शिष्य क्या उपयोग करता है ? उसका अपने शिष्य से जीवन भर का सम्बन्ध हो जाता है। दयानन्द लिखते हैं कि परम धन्य वे मनुष्य हैं जो अपने आत्मा के समान सुख में सुख और दुःख में दुःख अन्य मनुष्यों को जानकर धार्मिकता को कदापि नहीं छोड़ते — इत्यादि उत्तम व्यवहार आचार्य लोग नित्य करते जाएँ।’ शिक्षक को सम्बोधित करते हुए कहा कि जैसी शिक्षा करे वैसी चोरी-जारी, आलस्य, प्रमाद, मादकद्रव्य, मिथ्या-भाषण, हिंसा, क्रूरता, ईर्ष्या, द्वेष, मोह आदि दोषों के छोड़ने और सत्याचार को ग्रहण करने की शिक्षा करे क्योंकि जिस पुरुष ने जिसके सामने एक बार चोरी-जारी, मिथ्या-भाषणादि कर्म किया उसकी प्रतिष्ठा उसके सामने सामने मृत्युपर्यन्त नहीं होती।

जैसी हानि प्रतिज्ञा मिथ्या करने वाले की होती है वैसी अन्य किसी की नहीं। इससे जिसके साथ जैसी प्रतिज्ञा करनी उसके साथ वैसी ही पूरी करनी चाहिए। ……किसी को अभिमान न करना चाहिए। छल, कपट व कृतघ्नता से अपना ही हृदय दुःखित होता है तो दूसरे की क्या कथा कहनी? …..जितना बोलना चाहिए उससे न्यून वा अधिक न बोले। –आदि अनेक बातें दयानन्द अध्यापक में चाहते हैं ताकि उनके इन गुणों से प्रभावित होकर उनका छात्र भी इन गुणों को अपने जीवन में अपनाए।
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स्रोत – जीवन के पांच स्तम्भ।
लेखक – डॉ प्रशान्त वेदालंकार।
प्रस्तुति – आर्य रमेश चन्द्र बावा।

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