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याद आया बचपन का स्वतंत्रता दिवस

महोदय

इस बार 15 अगस्त पर अत्यधिक उत्साह देखने को मिला, नगर -नगर में तिरंगे लहराते हुए अनेक रैलियां निकाली गई । युवाओं में राष्ट्रभक्ति का बीज अंकुरित होता दिखा, वर्षो बाद ऐसा वातावरण देखने को मिला।

यह सब देखकर,पढकर व सुनकर अपना बचपन याद आ गया । जब हम छोटे थे तो स्कूल-कालेज में स्वतंत्रता-दिवस व गणतंत्र-दिवस धूमधाम से मनाया जाता था। खेल होते थे , बैंड बजते थे , मार्च-पास्ट होता था और एन.सी.सी की परेड होती थी । कही कही स्कुलो में क्रांतिकारियों के जीवन से सम्बंधित नाटक व वीर रस के कवि सम्मलेन भी होते थे जिसके लिए कुछ दिन पूर्व तैयारियां की जाती थी । एक-दो दिन पहले से ही देशभक्ति के गीत गूंजने लगते थे। उत्सव के बाद स्कुल-कालिज में छात्र-छात्राओं के हाथों में मिठाइयां होती थी कुछ खाते थे और कुछ घर ले जाते थे । वे उमंग और उत्साह के दिन भूली-बिसरी यादें बन कर रह गयी।

यह परम्परा अभी भी कुछ स्कूलो में चली आ रही होगी , पर अधिकाँश विद्यालय अब “PUBLIC SCHOOL” बन गए है । वहां अब यह राष्ट्रीय पर्व “अवकाश” मनाता है पर बच्चों को पहले दिन इन पर्वो का संभवतः थोडा ज्ञान अवश्य करा देते है , पर यहां एक बात अवश्य कटोचती है कि इन पब्लिक स्कुलो में एन.सी.सी. या तो है ही नहीं या इसकी अनिवार्यता को हटा लिया गया ।

ये राष्ट्रीय पर्व विद्यालयों और महाविद्यालयों में अनिवार्य होने चाहिए साथ ही साथ एन.सी.सी को भी अनिवार्य करना चाहिए । बालक-बालिकाओ व युवाओं में राष्ट्र के लिये बलिदान हुए महान क्रांतिकारियों को स्मरण करने से उनसे प्रेरणा मिलती है और राष्ट्रीय भाव जागृत होने से मातृभूमि के प्रति समर्पण का आत्मबोध होता है। ये राष्ट्रीय पर्व व एन.सी.सी. राष्ट्र की सुरक्षा के साथ साथ अखंडता के लिए भी आवश्यक भूमिका निभायें तो कोई अतिशयोक्ति नहीं ।

विनोद कुमार सर्वोदय
गाज़ियाबाद

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