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साँपों की बारात में जीभों की लपालप छापें ई-मेल
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व्यंग्य |   रामस्वरूप रावतसरे |  सोमवार , 02 अगस्त 2010
तनसुख ने जब अखवार देखा तो वह दंग रह गया कि सारा विपक्ष एकजुट होकर लोक सभा में मंहगाई पर संसद को ठप्प किये हुए है। इधर सत्ता का सुख भोग रहे दल मंहगाई को कम करने के रास्ते नही निकाल रहे है वे रास्ते निकाल रहे है कि किस प्रकार विपक्ष को अनरगल बहस में उलझाकर रखा जावे और जनता में यह सन्देश जाने दिया जावे कि वे तो काम करना चाहते है पर विपक्ष नहीं चाहता।

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होली पर मोबाइल फोन कंपनियों का धमाका छापें ई-मेल
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व्यंग्य |   अविनाश वाचस्‍पति |  मंगलवार , 02 मार्च 2010
दूरसंचार कंपनियों ने होली के अवसर को अविस्‍मरणीय  बनाने के लिए तकनीकी सुविधायुक्‍त ऐसा तालमेल बिठाया है कि कहीं से भी कॉल प्राप्‍त होने पर सामान्‍य मोबाइल फोन से भी अटैंड करने पर तुरंत रंगों की एक बौछार फोन सुनने वाले के चेहरे पर रंगों की रंगभरी बारिश कर देगी जिससे चेहरा पूरी तरह होली के रंग में रंग जाएगा।

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दीपावली पर 'शुभ का मना' जैसी लगती है शुभकामना छापें ई-मेल
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व्यंग्य |   अविनाश वाचस्‍पति |  शुक्रवार , 16 अक्टूबर 2009
भारतवर्ष की राजधानी दिल्‍ली के कल्‍याणपुरी थाने में तैनात एक एस एच ओ ने किया अपना ही कल्‍याण और अपने ही खातों को किया रोशन – अपने नाम की रख ली लाज – है उसका नाम रोशनलाल।

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जाको राखे नकली मार सके न कोय छापें ई-मेल
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व्यंग्य |   सुनीता शानू |  सोमवार , 21 सितम्बर 2009
कल पड़ोसियों में बहुत जोरों से झगड़ा हो रहा था, पति बोला ये मेरी असली बीबी नही है, बीबी बोली तू मेरा असली पति नही हैं, कहते-कहते बात यहाँ तक बढ़ गई कि दोनो ने बेलन और डण्डे निकाल लिये और बिन टिकिट की तमाशाई शुरू।

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राजूयाना होली पर रंगकामनायें और काले रंग की किलकारी छापें ई-मेल
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व्यंग्य |   अविनाश वाचस्‍पति |  बुधवार , 11 मार्च 2009
चलो हम सब आनंदित होकर होली मना लें। होली की रंगीनियों में ही पनाह लें। जिस प्रकार आतंकवाद को काला रंग माना जाता रहा है, पड़ोसी की करतूतें भी सदा से काली ही रही हैं।

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गणतंत्र दिवस परेड में झांकियों की जरूरत अब नहीं है छापें ई-मेल
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व्यंग्य |   अविनाश वाचस्‍पति |  सोमवार , 26 जनवरी 2009
republic_day_parade.jpgआप इधर यह पढ़ रहे हैं उधर देश में गणतंत्र दिवस मनाया जा रहा है। इस बार परेड में दिल्‍ली की झांकी नहीं है पर दिल्‍ली में झांकियों की कमी नहीं है।

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पंचतंत्र की कथा आधुनिक संदर्भ में छापें ई-मेल
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व्यंग्य |   जगदीश जैन |  सोमवार , 17 नवम्बर 2008
panchatantra.jpgदंडक वन में पशुतन्त्र की स्थापना का कार्य प्रगति में था। लोमड़ी  शावक लूंगड़ बहुत ही महत्वकांक्षी था। वह निरंतर अपने को लीडर बनाने का प्रयास कर रहा था। लेकिन उसे कामयाबी नहीं मिली।

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आधुनिक संदर्भ में घाघ की कहावत छापें ई-मेल
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व्यंग्य |   जगदीश जैन |  बुधवार , 12 नवम्बर 2008
घाघ की कहावतें पढ़ रहा था। यकायक मन में विचार आया कि घाघ की कुछ कहावतों में संशोधन की आवश्यकता हैं।

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बम तू कहाँ नहीं... छापें ई-मेल
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व्यंग्य |   सुनीता शानू |  गुरुवार , 25 सितम्बर 2008
"बीबी जी कल से मै काम पर नही आ पाऊँगी", क्यों ? क्या हुआ! मैने कामवाली से पूछा' वह बोली, आप देख नही न रही हैं, रोज टी.वी.पर बतला रहे हैं, रोज धमाका होत है l

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