भारत हजारों सालों से हिंदू राष्ट्र था, है और रहेगा

भारतीय राष्ट्रभाव अतिप्राचीन है। इसका मूल आधार हिन्दू संस्कृति है। सम्प्रति हिन्दू राष्ट्र पर विमर्श है। हिन्दू संस्कृति के कारण यह हिन्दू राष्ट्र है। कुछ लोग भारत को हिन्दू राष्ट्र घोषित करने की मांग कर रहे हैं। उनका मंतव्य स्पष्ट नहीं है। राष्ट्र राजनैतिक इकाई नहीं है। यह सांस्कृतिक अनुभूति है। विश्व विराट यथार्थ है। हिन्दू संस्कृति में यह परिवार है। पृथ्वी ब्रह्माण्ड की एक इकाई है। हिन्दू संस्कृति में यह माता है। आकाश पिता हैं। नदियां जल प्रवाह हैं। लेकिन हिन्दू संस्कृति में माता हैं। हिन्दू संस्कृति में वनस्पतियां अग्नि, वायु जल भी देवता हैं। पूर्वजों में प्रकृति के प्रति आत्मीय भाव था। इसी संस्कृति से हिन्दू राष्ट्र बना। राष्ट्र और राज्य भिन्न भिन्न हैं।

पं. दीनदयाल उपाध्याय ने लिखा है, ‘‘संयुक्त राष्ट्र वस्तुतः राष्ट्रों का संगठन नहीं है। राष्ट्रों के प्रतिनिधि के नाते संयुक्त राष्ट्र संघ में राज्य ही प्रतिनिधित्व करते हैं। इसीलिए राज्य के विकारग्रस्त होते ही राष्ट्र अपने प्रतिनिधि बदल देता है। शासन पद्धति राज्य को राष्ट्र के हित में उपयोगी बनाने वाला तंत्र मात्र है। मगर कोई भी शासन पद्धति अपने राष्ट्र को नहीं बदल सकती। राष्ट्र स्थाई सत्ता है।”

हिन्दू राष्ट्र संस्कृति सत्य है। तर्क प्रतितर्क और वाद विवाद हिन्दू संस्कृति की विशेषता है। कुछ विद्वान हिन्दू को मुसलमानों द्वारा दिया गया शब्द मानते रहे हैं। यह सही नहीं है। हिन्दू शब्द का उल्लेख ईरानी ‘अवेस्ता‘ में है। ‘अवेस्ता‘ इस्लाम के उद्भव से सैकड़ों वर्ष पुराना है। डेरियस (522-486 ईसापूर्व) के शिलालेख में भी हिन्दू शब्द का उल्लेख है। सर्वोच्च न्यायालय ने 1966 के मुकदमे में हिन्दुत्व को जीवन पद्धति बताया था। 1976 के मुकदमे में सर्वोच्च न्यायालय ने हिन्दुत्व को संस्कृति बताया है। 1995 में भी सर्वोच्च न्यायपीठ ने हिन्दुत्व को पंथ मजहब नहीं जीवनशैली बताया।

हिन्दू राष्ट्र घोषित करने की मांग का अर्थ संभवतः हिन्दू राज्य से है। हिन्दू राष्ट्र से नहीं। हिन्दू संस्कृति प्राचीनतम है। ऋग्वेद, यजुर्वेद, अथर्ववेद से महाभारत रामायण और आज तक सांस्कृतिक निरंतरता है। माकर््सवादी विद्वान डी० डी० कोसम्बी ने ‘प्राचीन भारत की संस्कृति और सभ्यता‘ में लिखा है, ‘‘मिस्र की महान अफ्रीकी संस्कृति में वैसी निरंतरता देखने को नहीं मिलती जैसी हम भारत में पिछले 3000 या इससे भी अधिक वर्षों में देखते हैं। मिस्री और मेसोपोटामियाई संस्कृतियों का अतीत अरबी संस्कृति के पीछे नहीं जाता।‘‘ सांस्कृतिक निरंतरता महत्वपूर्ण है। प्राचीन काल से ही यहाँ राष्ट्र संस्था सांस्कृतिक प्रवाह में थी। अथर्ववेद (8.10) में सामाजिक सांस्कृतिक विकास के सूत्र हैं, ”पहले वह शक्ति विराट थी। अव्यवस्थित थी। फिर परिवार संस्था का निर्माण हुआ। परिवारों ने जीवन को सामूहिक बनाया। सामूहिक विचार विमर्श से सभा व समिति का विकास हुआ। फिर कहते हैं कि, ‘‘लोककल्याण के इच्छुक ऋषियों ने तप किया। दीक्षा आदि नियमों का पालन किया। इससे राष्ट्र तथा राष्ट्र के बल का जन्म हुआ – ततो राष्ट्रं बलं ओजश्च जातं।‘‘

संस्कृति के अनेक तत्व होते हैं। कला, गीत, संगीत आदि प्रमुख हैं। परम चेतना एक। अभिव्यक्तियाँ अनेक। रूप, रस, गंध, नाद के आनंद हैं। प्राचीन हिन्दू गीत संगीत की परंपरा प्राचीन है। सरगम विश्व का प्राचीनतम सुरमाप है। यहाँ 6 मुख्य राग हैं और 30 रागिनियाँ। हिन्दू विचारधारा के अनुसार प्रत्येक राग अर्धदेवता हैं। इसका विवाह 5 रागिनियों से हुआ। नृत्य और संगीत का उल्लेख महाभारत वनपर्व में है। इन्द्र ने अर्जुन से कहा ‘‘तुम नृत्य और गीत सीखो‘‘। वाद्य विद्या भी तुम्हें सीखनी चाहिए।” हिन्दू परंपरा में गायन, वादन और नर्तन आदि विधाएँ थीं। ऋग्वेद में इसके साक्ष्य हैं। सामवेद का अर्थ ही ज्ञान गान है। इसी सब से उत्कृष्ट सामूहिक संस्कृति का विकास हुआ।

ऋग्वेद में सांस्कृतिक सामूहिक जीवन के साक्ष्य हैं। कहते हैं, ”हम परस्पर विचार विमर्श करें। साथ साथ चलें। सब के मन समान हों। मंत्र समान हों। समितियां समान हों। हमारे पूर्वज भी ऐसा ही करते थे।‘‘ ऋषि अपने पूर्वजों की संस्कृति स्मरण करते हैं। अथर्ववेद में धरती माता हैं। हम सब पुत्र हैं – माता भूमि पुत्रों अहं पृथ्विभ्यः। अथर्ववेद के रचनाकाल में यहाँ अनेक विचार थे। विविधता में एकता थी, ‘जनं विभ्रति बहुधा विवाचसं/ नाना धर्माणां पृथ्वि यथाकसं। राष्ट्र सांस्कृतिक अवधारणा है। राष्ट्र गठन का आधार राजनैतिक कार्रवाई नहीं है। आत्मीयता से मानव समूह संगठित होते हैं। विचार विमर्श चलते हैं।

भारतीय चिंतन में ब्रह्माण्ड को एक जाना गया है। विविधता में एकता भारतीय संस्कृति की विशेषता है। भूमि जन और संस्कृति की त्रयी भावात्मक रूप में राष्ट्र होती है। साथ साथ रहते हुए भूमि के प्रति श्रद्धा विकसित होती है। संस्कृति नेतृत्व करती है और राष्ट्र बनता है। संस्कृति का मुख्य घटक भाषा है। संविधान (अनुच्छेद 51 क उपखण्ड च) में ‘सामासिक संस्कृति‘ शब्द प्रयोग हुआ है। सर्वोच्च न्यायालय ने 1994 में कहा है कि ‘‘सामासिक संस्कृति का आधार संस्कृत भाषा और साहित्य है। इस देश के लोगों में अनेक भिन्नताएं हैं। वे गर्व करते हैं कि वे एक सामान्य विरासत के सहभागी हैं। यह विरासत और कोई नहीं संस्कृत की विरासत है।‘‘

राष्ट्र और नेशन एक नहीं हैं। नेशनलिज्म का जन्म नवीं दसवीं शताब्दी के आस पास हुआ। यूरोप का जागरण पुराना नहीं है। सोलहवीं शताब्दी में इटली के लोगों ने नए युग को ‘ल रिनास्विता‘ (पुनर्जन्म) कहना शुरू किया। अट्ठारवीं शताब्दी में फ्रांस के विद्वानों ने इसे रिनेसाँ कहा। इटली के लोगों ने सभ्यता के पुनर्जन्म की बात कही थी। उनके लिए सभ्यता नई हो कर जन्म ले रही थी। रोमन सभ्यता से फ्रांस और ब्रिटेन भी प्रभावित हुए थे। उन्होंने इटली की देखादेखी अपनी नई सभ्यता के युग को पुनर्जन्म कहना शुरू किया। पुनर्जागरण के बाद यूरोपीय शक्तियों ने अमेरिका, दक्षिण अफ्रीका और ऑस्ट्रेलिया के मूल निवासियों को पीड़ित किया। उपनिवेश बनाए। वे लगभग एक भौगोलिक क्षेत्र में थे। एक नेशन होने का भाव जगाया गया।

नेशनलिज्म में भूमि जन और राज्य व्यवस्था तीन घटक हैं। भारतीय राष्ट्रवाद में भूमि जन और संस्कृति तीन महत्वपूर्ण घटक हैं। राजव्यवस्था महत्वपूर्ण नहीं है। यहाँ हजारों छोटे खण्डों पर कई तरह की राजव्यवस्था थी। राजा थे। स्वाधीनता के समय 562 रियासतें थीं। लेकिन राष्ट्र एक था और है। इस राष्ट्रीय एकता की नीव हिन्दू पूर्वजों ऋषियों ने डाली थी। माकर््सवादी विचारक डॉ० रामविलास शर्मा ने लिखा है कि अथर्ववेद और महाभारत में अनेक पंथों के राष्ट्र का जैसा वर्णन है वैसा अन्यत्र नहीं मिलता। राष्ट्र निर्माण के लिए भारत को विश्व का मार्गदर्शक मानना चाहिए।” भारत वैदिककाल के पहले से ही हिन्दू राष्ट्र है।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबोले ने सही कहा है कि ”भारत पहले से ही हिन्दू राष्ट्र है। हिन्दू राष्ट्र सांस्कृतिक अवधारणा है। हम पिछले 100 वर्षों से कह रहे हैं कि भारत हिन्दू राष्ट्र है। इसे आर्यन, हिन्दू, सनातन राष्ट्र भी कहा जा सकता है।” राष्ट्र की मूलाधार संस्कृति को वैभवशाली बनाना चाहिए। सबके अधिकार समान हों। आजीविका और उपलब्धियों के अवसर समान है। न कोई अल्पसंख्यक है¨ और न विशेष सुविधाएं। इसी से हिन्दू राष्ट्र परमवैभवशाली होगा।

(लेखक उत्तर प्रदेश विधान संभा के अध्यक्ष रहे हैं। वे 1985 से लगातार उप्र विधानसभा के सदस्य निर्वाचित होते रहे. वर्ष 2010 में वो विधानपरिषद के सदस्य भी रहे. हृदय नारायण दीक्षित के लंबे राजनीतिक जीवन की शुरूआत 1964 से ही हो गई थी, जब वे राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ से जुड़े.वे भारतीय जनता पार्टी के संस्थापक सदस्यों में से एक रहे हैं. उन्होंने आपातकाल में भी कई आंदोलनों में हिस्सा लिया था जिसके लिए वे 18 महीने तक मीसा के तहत अलग अलग जेल में भी रहे.)

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