ताजा सामाचार

आप यहाँ है :

‘अवास्तविक’ निवेश के आगे दम तोड़ रहे हैं भारतीय व्यवसाय

मैं एक बनिया परिवार में बड़ा हुआ जहाँ व्यापार करने का मुख्य उद्देश्य केवल मुनाफ़ा कमाना ही होता हैं। भारत जैसे देश में हम अक्सर अपने रिश्तेदारों औरजानने वालों को भी व्यापार एक ही उद्देश्य के साथ करते हुए देखते जो हैं ‘मुनाफ़ा’। दरअसल ‘व्यापार’ शब्द एक ऐसे संगठन को दर्शाता है जो समाज के साथउत्पादों और सेवाओं का आदान प्रदान करते हैं और उसके बदले में कारोबार लाभ की ओर जाता हैं। यह वह तरीका है जिसमें पुराने समय में व्यापार आयोजितकिया जाता था और दुर्भाग्यवश, ज्यादातर लोग आज भी उसी ‘पुरानी’ भावना से ही व्यवसाय कर रहे हैं।

हालांकि, अब हम स्टार्ट-अप यानी नए छोटे उद्यम की उम्र में प्रवेश कर चुके हैं। संक्षेप में स्टार्ट-अप का उद्देश्य नए विचारों पर काम करना, नए उत्पादों कानिर्माण करना, प्रदर्शन देना, नई बाजार की जरूरतों को पूरा करना और मौजूदा लोगों को बेहतर मॉडल के साथ वही प्रोडक्ट देना प्राथमिकता होनी चाहिए लेकिननए स्टार्ट अप्स पहले दिन से ही अपने वित्त पोषण को क्रमबद्ध करने की ओर केंद्रित हो कर रह गए हैं। एक प्रासंगिक व्यावसायिक मॉडल और उस व्यावसायिकमॉडल को बेहतर तरीके से अमल में लाना, प्रौद्योगिकी में नयापन, एक अच्छा उत्पाद, ग्राहक संतुष्टि/बातचीत और सफल व्यावसायिक उद्यम बनाने के लिएयह सभी बातें अब जंग खा चुकी हैं। यह मान लेना की इस तरह से व्यवसाय लाभदायक होगा स्टार्ट-अप की दुनिया में एक घातक कदम हैं।

इसमें कोई संदेह नहीं है कि भारतीय बाजार में असाधारण क्षमता है। इसलिए बहु अरबपतियों के लिए यह एक पसंदीदा खेल का मैदान बन गया है जो उत्साहीरूप से समय-समय पर अपने संबंधित व्यावसायिक मॉडल के साथ भारतीय बाज़ार में प्रयोग करते रहते हैं। चीन और अमेरिका दो ऐसे सबसे बड़े खिलाड़ी हैंजिन्होंने जो काम खींच लिया है वही काम बाकी सभी को पकड़ने के लिए मजबूर कर दिया हैं। इन अवधारणाओं को बढ़ाने का काम मिडिया द्वारा भी खूब हुआ हैजिसकी वजह से भारतीय स्टार्ट-अप उत्सुक कम और भ्रमित होते ज्यादा दिखाई दे रहे हैं।

आज देश में एक बड़े पैमाने पर स्टार्ट-अप उद्योग हैं। यह एक चारों ओर से बंद सीमा रेखा के रूप में है जहाँ भारी भरकम निवेश करने वाले को भगवान के रूप मेंमान लिया जाता हैं। आमतौर पर जब हम दुनिया में बने होते हैं तो तब कोई भी भगवान को दोष नहीं देना चाहता। कोई भी उनके खिलाफ कुछ नहीं कहता है ,जोउन्होंने बनाया है। निवेशक भी इस समय वही भगवान है जो अपने पसंदिता अनुयायियों पर कृपा (उद्यम पूंजी के रूप में) बरसाते हैं।

जैसे ही हम विकास के चरणों से आगे बड़े थे, धर्म की खोज हुई जिसके आधार पर सभ्यताओं का निर्माण किया गया था और जैसे ही सभ्यताओं ने प्रगति कीविज्ञान व तकनीक ने उन्हें अभिभूत करना शुरू कर दिया। यही वह समय है जहां भारतीय स्टार्ट-अप उद्यम को यह महसूस करना चाहिए कि प्रगति केवलतथ्यों और तर्क के साथ ही की जा सकती है। इसके में कोई दो मत नहीं है की कभी-कभी अवास्तविक निधिकरण वास्तविक फंडिंग व्यवसायों और बाज़ार दोनोंको हानि पंहुचा देती हैं।

एक नए स्टार्ट-अप का मकसद कुछ ही समय में करोड़ो रूपए की कंपनी बनना नहीं होना चाहिए। हालाँकि इस अभिलाषा की सबसे बड़ी जनक वॉलमार्ट औरफ्लिपकार्ट का समझौता बन कर उभरा हैं जिसकी वजह से छोटे नए उद्यम उन आकांशाओ की और अग्रसर होते दिखाई दे रहे है जिनकी सचाई बेहद हीनिराशाजनक हैं। उन्होंने ने ऐसा कर दिया ! हम भी कर सकते हैं ? क्या हमे सही में ऐसा करना चाहिए ? सच्चाई बेहद ही कड़वी हैं। वो हर विचार जो हमारेदिमाग में आता है जरूरी नहीं की वो सफल हो। असल में ऐसे कई स्टार्ट-अप्स एक महीने तक बने रहने के लिए भी मशक्कत कर रहे हैं। हालाँकि वास्तविकतायह है की इनमें से अधिक्तर स्टार्ट-अप्स की जरुरत भी नहीं हैं।

बात करते है सबसे ज्यादा सर्फिंग में रहने वाले ‘फ्लिपकार्ट’ की। फ्लिपकार्ट के पास हर महीने लगभग 1 करोड़ भुगतान करने वाले ग्राहक आते हैं और वह प्रतिमाह 136 करोड़ रूपए का भारी नुकसान उठाते हैं। संचालन और भारी निवेश के कई वर्षों के बाद भी प्रत्येक ग्राहक पर 136 रूपए खर्च करते हैं। फ्लिपकार्ट कासचांलन यानी ऑपरेशन्स से कुल राजस्व 2,790.2 करोड़ रुपये था जो वित्तीय वर्ष मार्च 2018 के आते-आते 1160.6 करोड़ रूपए के घाटे में तब्दील हो गया।आलम यह है की फ्लिपकार्ट हर एक 2.7 रूपए की लेन-देन पर 1 रूपए का नुक्सान झेलता हैं।

इसी प्रकार ‘ओयो’ को वित्तीय वर्ष 2018 में 330.97 करोड़ रुपये की आर्थिक क्षति पहुंची हैं। वर्तमान में ओयो देश भर के 230 शहरों में 8500 होटल और 70,000 हज़ार से अधिक कमरों को संचालित करने का दावा करता हैं। इस हिसाब से ओयो साल भर में एक कमरे पर 47,500 रु. का घाटा उठाता हैं।

यदि आप अत्यधिक पूंजी निवेश से शुरू की गए गए स्टार्ट-अप्स की ओर गहराई से सोचेंगे तो सच्चाई बेहद ही चौंकाने वाली है। दरअसल जो आकड़े दिखाई देतेवह वास्तव में बेहद ही उलझाने वाले हैं और यह किसी बनिया व्यापारी या किसी भी भारतीय पारंपरिक व्यापारी के लिए अस्वीकार्य हैं। लेकिन स्टार्ट-अप्स के इसयुग में यह तरीका भी धर्म की तरह आँख मूंद कर अपनाया जा रहा हैं ख़ासतौर पर तब जब भारी निवेश रूपी कंपनियां हर वर्ष फ्लिपकार्ट जैसी कंपनियों पर 2000 हज़ार करोड़ रूपए की उद्यम पूँजी (वेंचर कैपिटल) जैसी आर्थिक सहायता उपलब्ध करा रहे हैं।

उदाहरण के तौर पर एक बेहद ही दिलचस्प बात यह है की आज कल के स्टार्ट-अप्स बिलकुल धार्मिक ग्रंथो की तरह व्यवहार करने लगे हैं। केवल मुट्ठी भर लोग हीस्टार्ट-अप की नब्ज़ को समझ पाए है। लेकिन जब इसका आकर्षण जब छोटे वर्ग के साधारण व्यापारियों के सामने गया और उन्होंने सीमित समझ के साथसमझने की कोशिश की तो तस्वीर अलग ही बन कर उभरी जिसका परिणाम दूर-दूर मेल नहीं खाता हैं। आप अक्सर ‘टर्नओवर’ या ‘राजस्व’ सुनते हैं। इन नंबरोंको आसानी से गलत समझा जा सकता है। जैसे की हमारे घर के पास में यदि कोई प्रॉपर्टी डीलर साल में चार करोड़ रूपए के फ्लैट बेचता है तो उस हिसाब से वहचार करोड़ रूपए के क़ारोबार का दावा कर सकता हैं लेकिन हकीकत में, वह जो वास्तविक व्यवसाय करता है वह सिर्फ उसका कमीशन यानी दलाली होगा, जोसंभवतः लगभग 4 लाख रूपए हो सकता हैं।

हालाँकि अंतिम सवाल अभी भी वही है की किसी भी धर्म, विश्वास और इसकी नींव के खिलाफ कोई भी सच्चा प्रमाण नहीं है और यही मामला स्टार्ट-अपकंपनियों के साथ भी हैं। मैं पूरे विश्वास के साथ यह कह सकता हु की ‘अवास्तविक’ भारी निवेश भारतीय व्यवसायों के लिए घातक साबित हो रहा हैं और यहीनहीं यह प्रणाली भारतीय बाज़ार में उत्पादों या सेवाओं में परिवर्तन या नयापन को भी प्रभावित कर रही है जो लंबे समय तक भारतीय बाज़ारो के लिए हितकारीसाबित नहीं होगी। सम्भवत, कारण यह हो सकता है कि निवेशक डॉलर में निवेश कर रहे हैं और रिटर्न रुपये में हैं।

यदि कोई भी नई दुकान अपने हर नए ग्राहक को कुछ भी खरदीने पर 100 रूपए वापस कर रहा है और वह लंबे समय तक घाटा झेलने में सक्षम है तो यहस्वाभविक है की वह अपने आस-पास वाली दुकानों को बंद होने पर मजबूर कर रहा हैं। बेशक साधारण रूप से व्यवसाय करने वाले मध्य वर्ग के व्यापारी फिरकोई भी रणनीति क्यों न अपना ले लेकिन वह भारी भरकम निवेश करने वाली कंपनियों के आगे लंबे समय तक नहीं टिक पाएंगे। अगर उबर ने अरबों डॉलर कानिवेश किया है जिससे भारतीय ग्राहकों को ऐसी लागत पर सुविधा मिल रही है जो की अपनी गाड़ी के इस्तेमाल करने से भी कम हैं तो वह पहले से मौजूद किसीभी छोटी टैक्सी सेवा / कंपनी को मजबूरन बंद करवाने के ओर अग्रसर साबित हो सकता हैं। इसमें कोई दो मत नहीं है की वर्तमान स्थिति में भारतीय ग्राहकों केलिए उबर का इस्तेमाल करना फ़ायदेमंद साबित हो रहा है लेकिन तब क्या जब हवाईअड्डे जाने के लिए हमारे पास कोई अन्य टैक्सी नहीं होगी ? तब हमेंमजबूरन उबर का उपयोग करना होना होगा और वो भी उसी कीमत पर जिस पर वह चाहता हैं। हालांकि यह सिर्फ एक उदाहरण है की किस तरह एक बड़ी मछलीछोटी मछली को खा जाती है। ऐसे कई उदाहरण और होंगे जो पनप रहे होंगे। मैं दावे के साथ कह सकता हु की यह भारतीय कंपनियों के लिए नुक्सान भरा साबित होगा।

छोटे स्टार्ट-अप और व्यवसाय जो टिकाऊ और लाभदायक बनने की कोशिश कर रहे हैं उनके लिए बड़े निवेशकों से सामने टिकना सूखे कुएँ में से पानी निकालनेके बराबर होगा। भारत जहाँ अधिकाँश बाज़ारों में एकाधिकार (मोनोपोली) रोकने के लिए लगभग कोई कानून नहीं हैं और यदि है भी तो उनका परिपालन बेहद हीकमज़ोर रूप से होता हैं। यही कारण है कि भारतीय बाजार और मुख्य व्यापार अवास्तविक वित्त निवेश द्वारा समाप्त किये जा रहे हैं।

संपर्क

रचित जैन

For more visit: https://kb.youth4work.com/about-youth4work-817f5dba554e#.xk97mo6mw

विस्तृत जानकारी के लिए संपर्क करें
Nandita Tripathi, PR- Manager
+91-7290005623/ 9654113156
nandita@youth4work.com



सम्बंधित लेख
 

Back to Top